18 सितंबर 2014
गाँधी, नेहरु और लोहिया
श्री जवाहरलाल नेहरु गाँधी जी से बीस साल छोटे थे. और राम मनोहर लोहिया श्री नेहरु से इक्कीस साल छोटे थे. आयु का यह फ़र्क इस दृष्टि से महत्वपूर्ण था कि तीनो व्यक्ति, तीन विभिन्न ऐतिहासिक अवधियों में, भिन्न वातावरणों में जवान हुए थे, जिनका उनके व्यक्तित्व पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा.
गाँधी जी जवान हुए थे उन्नीसवीं सदी की आखिरी चौथाई में. राजनीतिक दृष्टि से यह अवधि भारत में शांती व व्यवस्था की अवधि थी. अंग्रेज़ी राज अच्छी तरह से जमा हुआ था, और उसके विरुद्ध विद्रोह की कोई कल्पना नहीं करता था. यह काल था धार्मिक, साँस्कृतिक पुनर्जागरण का. स्वामी दयानन्द का आर्यसमाज फ़ैल रहा था. स्वामी विवेकानन्द नें राष्ट्रीयता और सार्विकता को एक समेथित विचारधारा के रूप में प्रस्तुत किया था.
उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में बंगाल से ही राजा राममोहन राय ने वह परम्परा चलाई थी, जो ईस्ट इंडिया कम्पनी का हित साधन करने का साथ साथ इंगलिस्तान की बौद्धिक साँस्कृतिक परम्परा का प्रचार करती थी. दास जातियों में हमेशा ही एक ऐसा वर्ग होता है जिसके लिए प्रभु जाति की उन विशिष्ठताओं से बढ़ कर, जिनमें वह प्रभु जाति का स्रोत देखता है, दुनिया में और कुछ नहीं होता. सदी के उत्तरार्द्ध में इसके विपरीत विवेकानन्द ने यह लक्ष्य प्रस्तुत किया कि भारत आंतरिक जड़ता और पराधीनता, दोनो से मुक्ति प्राप्त करे. गाँधी इसी परम्परा की अगली कड़ी थे.
श्री नेहरू की किशोरावस्था इंगलिस्तान में गुज़री. युरोप में यह व्यापक सामाजिक हलचल और उथल पुथल का काल था. इस उथल पुथल की परिणति 1914 के महायुद्ध और 1917 की रूसी क्रांती में हुई. हिन्दुस्तान में भी इस अवधि में गंभीर राजनैतिक उथल पुथल शुरु हो गयी थी और तिलक उग्र राष्ट्रवाद के नेता के रूप में सामने आये. विशेषतः रूसी क्रांती के बाद मार्क्सवाद और साम्यवाद का प्रभाव भी युरोप से हिन्दुस्तान आया. 19वीं सदी के युरोपीय प्रभावों की भाँती यह प्रभाव भी नाना रूपों में आया, और इसके प्रतीक बने श्री नेहरू, जिन्होंने अपनी उग्र राष्ट्रीयता के साथ साथ अन्तरार्ष्ट्रीय दृष्टि से युवकों की नई पीढ़ी को बहुत अधिक प्रभावित किया.
राममनोहर लोहिया दोनों महायुद्ध के बीच की क्रांतीकारि अवधि में जवान हुए. तब ऐसा लगता था कि मनुष्य जाति एक क्रांतीकारी परिवर्तन के कगार पर खड़ी है, और शीघ्र ही समता और समृद्धि पर आधारित मनुष्य की एक नयी सभ्यता का उदय होगा. किशोरावस्था में, जर्मनी जाने से पहले, लोहिया को गाँधी और नेहरू, दोनो ने ही आकर्षित किया था. लेकिन गाँधी जी के प्रति उनके आकर्षण में श्रद्धा अधिक थी, शायद एक दूरी भी थी, जबकि श्री नेहरू के प्रति उनके आदर में सहजता और तात्कालिकता थी. नेहरू में वही गुण दिखायी देते थे जो लोहिया खुद अपने में देखना चाहते थे: निर्भीकता, बौद्धिक स्वतंत्रता, संवेदनशीलता और साथ ही एक व्यापक मानवीय दृष्टि.
लेकिन नेहरू और लोहिया की दृष्टि में एक बुनियादी फ़र्क था, जिसने वक्त बीतने पर उन्हें अलग ही नहीं किया, एक दूसरे का विरोधी बनाया. नेहरू युरोपीय सभ्यता के भक्त थे. स्वाधीनता इसलिए आवश्यक थी कि भारत युरोप की तरह अपना विकास कर सके. इस कारण, राज्य से भिन्न राष्ट्र का उनके लिए कोई मतलब नहीं था. इसके अतिरिक्त विश्व के भविष्य के लिए, जिसमें भारत का भविष्य भी शामिल है, युरोपीय सभ्यता की उस विरासत की रक्षा नेहरू को आवश्यक प्रतीत होती थी, जिसका प्रतीक इंगलिस्तान का उदारवाद है. नेहरू की उग्र राष्ट्रीयता और सामाजिक परिवर्तन की इच्छा समय बीतने के साथ युरोपीय सभ्यता के प्रति उनके लगाव के समक्ष गौण पड़ती गयी.
लोहिया जब जर्मनी से वापस आये, तो युरोपीय लोकतंत्र, समाजवाद और रूसी साम्यवाद के प्रति भी उनके मन में काफ़ी आदर था, यद्यपि वह कभी भी मार्क्सवादी नहीं रहे. उन्होंने 1929 के बाद युरोप में मंदी के प्रभाव को और फासिज़्म के उदय को प्रत्यक्ष देखा था. लेकिन शीघ्र ही युरोप से उन्हें निराशा हुई. स्पेन के गृहयुद्ध के समय युरोप के "लोकतांत्रिक" कहलाने वाले देश स्पेनी गणराज्य की हत्या का तमाशा देखते रहे और अप्रत्यक्ष रूप में इस हत्या में सहायक भी हुए. अबिसीनया और चीन पर हमले होने के समय भी यही अनुभव दोहराया गया. इसके अतिरिक्त लोहिया ने देखा कि इंगलिस्तान भारत को बाँटने और तोड़ने की हर मुमकिन और गंदे से गंदे तरीकों से कोशिश कर रहा था, ताकि साम्राज्य का यह रत्न उसे खोना न पड़े.
साम्यवाद के प्रति लोहिया का मोहभंग उस समय हुआ, जब स्टालिन ने बोलशेविक क्रांती के समय अपने पुराने साथियों का सफाया करना शुरु किया. फ़िर तो एक के बाद एक ऐसी घटनाएँ होती गयीं. 1938 में रूस ने हिटलर के साथ अनाक्रमण संधि कर ली. उसके बाद ही रूस ने फ़िनलैंड पर आक्रमण किया और 1939 में जब हिटलर की पलटन पश्चिम से पोलैंड में घुसी, तो पूर्व से रूसी लाल सेना ने भी आक्रमण किया. पोलैंड को रूस और जर्मनी ने बाँट लिया. इन घटनाओं के बाद लोहिया के लिए यह स्पष्ट हो गया कि रूस की क्रांती एक नयी मानवीय सभ्यता का पहला प्रयोग तो नहीं थी, और चाहे जो भी हो. जब युरोप के समाजवादी कहलाने वालों ने किसी भी दशा में अपने साम्राज्यों से हटना स्वीकार नहीं किया, बल्कि फ़ासिज़्म के हाथों अपनी पराजय की संभावना को अधिक स्वीकार्य पाया, तो युरोपीय सभ्यता से लोहिया की श्रद्धा बिल्कुल उठ गयी.
उस अविधि में, 1938 से 1942 के बीच गाँधी और नेहरू के साथ लोहिया के सम्बंध बदले. गाँधी "एक समय में एक कदम" पर विश्वास रखते थे और दूसरे महायुद्ध के आरम्भ में उनका कम से कम नैतिक समर्थन इंगलिस्तान-फ्राँस के पक्ष में था. लेकिन गाँधी जी ने भी जब देखा कि अंग्रेज़ किसी भी दशा में भारत छोड़ने को तैयार नहीं थे, तो उनका एक एक कदम अनिवार्य ही उनको निष्कर्षों की ओर ले गया जिन पर लोहिया पहुँचे थे. इसके विपरीत, लोहिया ने पाया कि सारे प्रमाणों के बावजूद नेहरू का मन युरोपीय सभ्यता, खास तौर पर इंगलिस्तान के प्रति अपने मोह को छोड़ने लिए तैयार नहीं था. किसी समय के उग्रपंथी नेहरू अब किसी भी प्रकार अंग्रेज़ों से समझौता कर लेना चाहते थे. उन्होंने बराबर इस बात की चेष्ठा की कि कांग्रेस अंग्रेज़ी सरकार से कोई समझौता कर ले. युद्धकाल में अंग्रेज़ी राज के विरुद्ध कोई संघर्ष छेड़ने के नेहरू बिल्कुल विरुद्ध थे.
यह इतिहास का एक व्यंग है कि जो व्यक्ति 1942 के विद्रोह को शुरु करने के पक्ष में नहीं था, विद्रोह का राजनैतिक लाभ सबसे अधिक उसी ने उठाया. 1942 के विद्रोह में युवा राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं का एक विशाल समूह पैदा हो गया था. उन्होंने डाकखाने जलाये थे, रेल पटरियाँ उखाड़ी थीं, तेलीफ़ोन के तार काटे थे. गाँधीजी ने इनकी निन्दा नहीं की, लेकिन गाँधीजी के लिए इनसे एकात्म होना कठिन था. उनकी अहिँसा इसमें बाधक थी. दूसरी ओर गाँधीजी ने जो रचनात्मक कार्यक्रम रखा, उसमें इन उग्रपंथी युवकों की कोई खास दिलचस्पी नहीं थी. ऐसी हालत में श्री नेहरू जब 1945 में रिहा हुए तो जेल से निकलते ही उन्होंने बयान दिया कि अरुणा आसिफ़ अली और उनके साथियों ने जो कुछ किया है, वह व्यर्थ नहीं जायेगा.
यह एक दिलचस्प बात है कि श्री नेहरु ने अरुणा आसिफअली का नाम तो लिया, जो 1942 के पहले राजनीति में सक्रिय ही नहीं थीं, लेकिन अपने पुराने मित्रों, जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया का नहीं, जो उस समय जेल में ही थे. इतना ही नहीं, श्री नेहरु ने शीघ्र बाद ही आज़ाद हिन्द फौज के अफ़सरों की रिहाई के लिए तो बड़ा नाटकीय आन्दोलन चलाया - जबकि पहले उन्होंने कहा था कि सुभाष बोस की फौज अगर भारत में आई तो स्वयं उसके विरुद्ध लड़ेंगे - लेकिन लोहिया और जयप्रकाश की रिहाई के लिए नहीं बोले. अंग्रेजों के साथ समझौता वार्ता शुरु हो गयी और ये दोनों आगरा जेल में ही बन्द रहे.
और 1946 में लोहिया जब रिहा हुए तो श्री नेहरु सरकार में जाने की तैयारी कर रहे थे. इसके बाद तो लोहिया को बार बार यह अनुभव हुआ कि नेहरु को अब जनशक्ति और जन-आंदोलन पर भरोसा नहीं रहा. रिहा होने के दो महीने बाद ही लोहिया फ़िर गोआ में गिरफ्तार हुए तो गाँधी जी उन्हें पूरा समर्थन मिला और श्री नेहरु का चिढ़ भरा विरोध. इसके बाद एक साल तक गाँधीजी राष्ट्र को टूटने से बचाने के लिए नोआखली, कलकत्ता, बिहार और दिल्ली में घूमते हुए जानों की बाजी लगाते रहे. लोहिया ने पहले तो नये संघर्ष की तैयारी के लिए लोगों को आंदोलित करने की चेष्ठा की (गाँधी जी के समर्थन से), फ़िर गाँधी जी के काम के निर्णायक महत्व को समझ कर उन्हीं के साथ लगे रहे, विभाजन के पहले के संकटपूर्ण महीनों में भी, और विभाजन के बाद भी.
पर श्री नेहरु इस बीच सरकार बनाने की सौदेबाज़ी में लगे थे. उस वक्त का एक बड़ा ही दिलचस्प किस्सा मुझे याद है. अंतरिम सरकार जब बनी तो उसमें एक पारसी उद्योगपति श्री सी. एच. भाभा को भी शामिल किया गया था. उन दिनों अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के एक नेहरु समर्थक सदस्य लाहौर में समाजवादियों को बराबर यह समझाने की कोशिश करते रहे कि श्री नेहरु ने अपनी स्वीकृति इस भ्रम में दे दी कि प्रसिद्ध वैज्ञानिक श्री जे. एस. भाभा को लेने की बात है. इस तरह पारसी पूँजीपतियों के साथ श्री नेहरु के सम्बंध भी सुधर गये और बदनामी गई सरदार पटेल के सर. इस तरह के हथकंडे बाद में श्री नेहरु ने जाने कितनी बार अपनाये.
श्री नेहरु के साथ राजनैतिक अलगाव का वक्त लोहिया के लिए बहुत कुछ तो 1946 में ही आ गया था. श्री नेहरु उस समय कांग्रेस अध्यक्ष भी थे. उन्होंने प्रस्ताव रखा कि लोहिया कांग्रेस के महामंत्री का पद स्वीकारें. लम्बी बातचीत में लोहिया ने तीन बातें कहींः "कांग्रेस अध्यक्ष सरकार में शामिल न हो. मंत्री लोग कार्यकारिणी में न लिये जायें. और संगठन को सरकार की सुहानूभूतिपूर्ण आलोचना का अधिकार हो." नेहरु ने पहली बात सिद्धांत के रूप में मानी, लेकिन उसे अपने ऊपर लागू करना स्वीकार नहीं किया. अन्य दोनो बातें उन्होंने अस्वीकार कर दीं. बात टूट गयी.
उन्हीं दिनों लोहिया ने देखा कि सरकार में जाते ही श्री नेहरु को नौकरशाही के अफसरों में बड़े गुण और असाधारण प्रतिभा दिखाई देने लगी थी. उसमें भी विशेष गुण-प्रतिभा समपन्न ब्राह्मण थे, सबसे अधिक कशमीरी ब्राह्मण. मोह भंग की परिणति उस समय हुई जब श्री नेहरु ने सर गिरजाशंकर वाजपेयी को अपना महासचिव नियुक्त किया और उन्हें विदेश विभाग के अन्य मंत्रियों से भी ऊँचा दर्ज़ा दिया. वही गिरिजाशंकर वाजपेयी थे, जिन्होंने जेल में कस्तूरबा की मृत्यू के समय बड़ी बेशर्मी से अमरीका में अंग्रेज़ी सरकार की ओर से प्रचार किया था. कुछ दिनों बाद ही संसद में श्री नेहरु ने श्री वाजपेयी की ऐसी तारीफ़ की, जैसी शायद ही किसी अन्य व्यक्ति की उनके जीवनकाल में की हो. इसके बाद लोहिया और नेहरु एक दूसरे के विरुद्ध खड़े थे.
लेकिन 1946 की स्थिति में एक विचित्र विरोधाभास था. जिस समय लोहिया ने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया था, 1933-34 में, उसके पहले तक राष्ट्रीय आन्दोलन में गाँधी, नेहरु और लोहिया, तीनों की ही पीढ़ियाँ सक्रिय थीं. पुरानी पीढ़ी में लाला लाजपतराय, हकीम अजमल खाँ, श्री मोतीलाल नेहरु और पंडित मदनमोहन मालवीय थे. बीच की पीढ़ी में श्री नेहरु, राजाजी, सरदार पटेल, श्री गोविन्द वल्लभ पंत आदि थे, जिनके हाथ में अब संगठन का नेतृत्व था. लोहिया की अपनी पीढ़ी में वामपक्षी भी थे और दक्षिणपक्षी भी. वामपक्षी युवकों में बौद्धिक प्रतिभा तो थी, लेकिन संगठन की शक्ति नहीं थी. 1942 के विद्रोह के समय गाँधी जी अलावा उनकी पीढ़ी का कोई अन्य नेता सक्रिय नहीं था. मालवीयजी जीवित तो थे लेकिन रोग-शैया पर पड़े थे. बीच की पीढ़ी वाले, संगठन के वास्तविक नेता कुछ करने के पहले ही या केवल प्रतीकात्मक कार्यवाही करने पर गिरफ्तार कर लिए गये. प्रारम्भिक विस्फोट में छात्रों ने प्रमुख भाग लिया और बाद में विद्रोह का नेतृत्व किया, युवक नेताओं की उस पीढ़ी ने, जिसके हाथ में संगठन की शक्ति नहीं थी.
फलस्वरूप 1946-47 में लोहिया की राष्ट्रीय नेता के रूप में प्रतिष्ठा थी. उनकी सभाओं में भीड़ होती थी. उनके बयान अखबारों में छपते थे. (उस समय जयप्रकाश नारायण की सभाओं में और अधिक भीड़ होती थी. उनके बयान और अधिक छपते थे) लेकिन उनके पीछे संगठित शक्ति बहुत कम थी. कांग्रेस के एक अंग के रूप में, समाजवादियों को अपनी शक्ति वास्तविकता से बहुत अधिक लगती थी. कांग्रेस का संगठन दूसरे लोगों ने खड़ा किया था. और हर हाल में, जहाँ समाजवादियों ने उसमें प्रमुख भाग लिया था, जैसे संयुक्त प्रान्त (उत्तर प्रदेश) में, वहाँ का संगठन कांग्रेस का था. गाँव का किसान कांग्रेस का नाम और तिरंगा झंडा ही जानता था. सोशलिस्ट पार्टी के नाम और झंडे से वह परिचित नहीं था.
1947 में देश के विभाजन के समय और उसके बाद, गाँधीजी की हत्या होने तक लोहिया की राजनीति लगभग पूरी तरह गाँधीजी के साथ जुड़ी हुई थी. दूसरे कुछ लोग कांग्रेस से निकलने को आतुर थे और शेखचिल्लियों की तरह ख्याली पुलाव पका रहे थे. वे समझते थे कि गाँधी जी जैसे व्यक्ति के नेतृत्व में, जिस काम को करने में कांग्रेस को कई दशक लगे थे, उसे वह कुछ महीनों में ही कर लेंगे. इसके अलावा अधिकांश समाजवादी नेता इतिहास द्वारा प्रस्तुत अवसरों की परीक्षाओं में कम-ज़्यादा सफल तो हुए थे, लेकिन मूलतः यह सब दूसरे दर्ज़े के नेता थे, जो अपने से बड़े किसी नेता का मुंह देखने के आदि थे. इनमें से किसी में भी इतनी आंतरिक शक्ति न थी कि अकेले नई ज़मीन तोड़ कर रास्ता बनाने की तकलीफ़ उठा सके. लोहिया में यह शक्ति थी. लोहिया ने दो ही नेता माने थे. उनमें से गाँधीजी की मृत्यू हो गई थी. और नेहरु से लोहिया न केवल पूरी तरह निराश हो चुके थे, बल्कि उन्हें विश्वास हो गया था कि नया हिन्दुस्तान बनाने की चेष्टा करने वाले लोग नेहरु की शक्ति से लड़े और ....
(... आलेख के यह हिस्सा पूरा नहीं है)
"... से एकरूप और प्रतिनिधि नहीं बनने देगी, उसका तुम कैसे समर्थन करोगे?" गाँधी कहते जा रहे थे और लोहिया के लिए ऐसा संकोचमय क्षण पहले नहीं आया था. गाँधी का हाथ लोहिया के कन्धे पर था, चाह कर भी भाग न सकते थे. खामोशी से सुनने के सिवा कोई चारा न था. गाँधी ने अन्त में पूछाः "तुम्हें कुछ कहना नहीं है." लोहिया चुप. गाँधी ने फ़िर पूछाः "तुम्हें क्या कुछ भी नहीं कहना है?" लोहिया फ़िर चुप. तब गाँधी बोलेः "अब देखो तुम मुझे बोलने से रोकना चाहते हो क्या?" तब लोहिया का मुंह खुलाः "ऐसा कुछ नहीं. आप जारी रखिये." तब गाँधी ने दूसरा रुख लियाः "मैं केवल तुम्हारे सार्वजनिक जीवन से समबन्धित हूँ, ऐसा मानते हो क्या?" अब लोहिया ने कहाः "मैं ऐसी सीमाएँ नहीं मानता. आकाश के नीचे जो भी चीज़ें हैं, उनके सम्बन्ध में कुछ भी आप को मुझसे कहने की आज़ादी है आप को." यह बहस एकतरफा ही रही. गाँधी 40-45 मिनट तक बोलते रहे. तब लोहिया ने कहाः "मैं आज आपको जवाब नहीं देता, पर जल्दी ही दूँगा."
और दो महीने बाद लोहिया ने सिगरेट पीना छोड़ दिया और जब इसकी खबर गाँधी को दी तो गाँधी केवल मुस्कुरा पड़े थे.
और जब गाँधी की हत्या हुई, तो क्षोभ, चिढ़, उद्वेग से लोहिया के कोलाहलपूर्ण मन में एक हाहाकार रह रह कर उठताः "गांधी ने सारी ज़िन्दगी भर अहिंसा का प्रचार किया, लेकिन उनकी मृत्यू हिंसा से हुई? कैसी विपरीत घटना है. कहीं यह घटना भारत के अधःपतन की शुरुआत तो नहीं?"
और सोचते सोचते लोहिया का चित्त बड़े भयानक क्षोभ से ढक गया था. वह बरबस कह उठेः "क्यों आपने मेरे साथ और हिन्दुस्तान की जनता के साथ ऐसी दगाबाज़ी की? क्यों आप इतनी जल्दी चले गये?" और गांधी से दग़ाबाज़ी का प्रतिशोध लेने के लिए लोहिया ने फ़िर से सिगरेट पीना शुरु कर दिया. यह कितना निष्पाप दर्द है! लेकिन गुरु से प्रतिशोध भी कैसा? दोबारा सिगरेट ज़्यादा दिन नहीं चली.
अब तो दूसरे भी मानने लगे हैं कि गांधी के सूत्रों को एकमात्र लोहिया ने ही जीवित रखा है.
***
इलाहाबाद में ही एक दिन अचानक बैठे बैठे, ठीक ठाक से बातें करते करते लोहिया एकाएक उद्विग्न हो उठे थे. एकांत पा कर मुझसे पूछाः "क्यों, तुम तो पढ़े लिखे आदमी हो न! ज़रा बताओ कि जब बुद्ध और आम्रपाली की भेंट हुई होगी, तो ऐसा क्या हुआ होगा कि आम्रपाली ने सर्वस्व बुद्ध पर निछावर कर दिया और बुद्ध ने भी उसे स्वीकार लिया?"
मैं हतप्रभ! कैसा प्रश्न! कैसा प्रश्नकर्ता! मैं सकुचाया तो बोलेः "नहीं, ऐसी ऐसी बातों को साधारण ढंग से पढ़ कर भूल मत जाया करो. सोचा करो कि इतिहास की इन घटनाओं के पीछे क्या रहता है!"
फ़िर एक दिन पूछाः "विवेकानन्द कन्याकुमारी में किधर मुँह करके बैठे होंगे? स्वदेश भूमि की ओर या समुद्र की ओर?"
ऐसे ही एक क्षण वे चित्रकूट में उस रास्ते वन की ओर कुछ ढूँढ़ने चल पड़े थे, जिधर से राम दक्षिण गये थे.
लोहिया के कुछ भावुक क्षण होते थे - राजनीति से दूर, पर इतिहास के गर्भ में जब वे डूबते थे, तो दूसरे ही लोहिया होते थे.
आज लोहिया नहीं हैं. शिखर पर पहुँचने के पूर्व ही जीवन खण्डित हो गया उनका. और साथ ही खण्डित हो गया विद्रोही जन मानस के निर्माण का प्रक्रिया क्रम भी!
हम जैसे उनके अनुचरों की व्यथा कौन समझे? हम उनके स्नेह से अधिक, उनकी डाँट, झिड़क और खीझ याद आती है. किसमें है इतनी हिम्मत, जो अब हमें फ़िर उस प्यार से झिड़के!
टिप्पणीः ओमप्रकाश दीपक का यह आलेख "लहर" पत्रिका के मार्च-अप्रैल 1968 के अंक में छपा था.
20 मई 2012
एक कमज़ोर आदमी का कमज़ोर सच
यह लेख मेरे लिए एक निजि चुनौती बन गया है. पिछले कई हफ्ते से मैं कोशिश कर रहा हूँ कि इसे अपने दिमाग में कोई शक्ल दूँ, और लिख डालूँ. कितनी बार बैठा और कलम खुली रही, लेकिन उठा तो कागज़ सादे के सादे थे. दो बार जबरदस्ती लिखना शुरु किया, तीन चार सौ शब्दो के बाद लिख नहीं पाया. हर बार ऐसा लगता है जैसे मैं खुद अपनी मुट्ठी से फिसलता जा रहा हूँ. यह एक अजीब किस्म का अनुभव है, जो खुद मुझे भी शायद पहली बार हो रहा है. कम से कम इसका एहसास मुझे पहली बार हो रहा है. मुमकिन है पहले भी मेरे साथ ऐसा हुआ हो और मुझे पता न चला हो, क्योंकि उस वक्त बौद्धिक अनुशासन की जरूरत न पड़ी हो.
मेरे दिमाग को कभी कभी ग्रहण लग जाता है, यह मैं जानता हूँ. कम से कम दो ऐसे अवसरों के कटु अनुभव तो मेरे सम्पादक मित्रों को भी हैं. मेरे घर की दीवारों को चीर कर एक आवाज आ रही है. हर आधे जुमले के बाद एक जोर की हिचकी, जैसी हिन्दी फ़िल्मों में कभी कभी नशे के धुत्त शराबी लेते हैं, लेकिन उसके आगे पीछे चीखती हुई जवान मर्द की आवाज - मेरी मां दोनो आखों से अन्धी है, दोनो पैरो से कमजोर है. आत्मा कलप रही है. काया कल्प रही है. एक कमीज पैजामा चाहिये. मेरा भाई अन्धा है दोनो आँखों से और दोनो पावों से लँगड़ा है.
आवाज दूर चली गयी है, अब सिर्फ रह रह कर हिचकी सुनई देती है. और मैं सोचता रहता हूँ कि यह चीख झूठी है. लेकिन मेरा सर भन्ना गया है. मेरे दिमाग को कभी कभी ग्रहण लग जाता है. किसी एक हिस्से में विवेक, यानि वह जो तर्कों और तथ्यों को छानने का काम करता है, काम करना बन्द कर देता है, कुछ अर्से के लिए. शायद इसीलिए मैं अभी तक पागल नहीं हुआ हूँ. लेकिन अपने आप का खुद अपनी मुट्ठी से फिसल जाना, उसमें कोई तनाव नहीं है, कोई आवेग नहीं है. जाने एक हल्की सी उदासी है. बल्कि शायद उदासी कहना भी गलत है. खालीपन है, नहीं खालीपन भी नहीं है बल्कि जाने कैसी कैसी बातें याद आती हैं जिनका इतिहास से कोई मतलब नहीं है. या शायद है.
मेरे जी में आया है कि सरताज से मेरी फिर मुलाकात हो (ग्यारह साल पहले, यही दिन थे अगस्त सितम्बर के, वह हैदराबाद की सबसे खूबसूरत और कमसिन तवायफ़ थी, अठारह बीस साल की) और पूछूँ कि अब तुम्हारे कितने बच्चे हैं. तब एक लड़का था, और उसकी मां, नूर के छह, सातवां पेट में था. सरताज को उसकी मां डाक्टर बनाना चाहती थी. लड़का होती तो मुमकिन है बन जाती. लड़की थी इसलिए तवायफ़ ही बनी.
वो तस्वीरें अब भी शायद कहीं हों, लेकिन ज़्यादा मुमकिन है कि और तमाम जाने क्या कुछ के साथ जल गयीं हों, जिनको देख कर शायद मैं खुद भी अपने को पहचान न पाऊँ. मैंने खास ढंग से दाढ़ी बढ़ा रखी थी, बाल छोटे छोटे कटा रखे थे, तहमत कमीज़ के ऊपर नीली वास्कट पहन रखी थी. जलन्धर स्टेशन पर एक मुसलमान बुजुर्ग को मुझसे आधे घँटे बात करने के बाद भी शायद शक नहीं हुआ था कि मुसलमान नहीं हूँ. मेरे अपने दोस्त आवाज़ सुने बिना मुझे नहीं पहचान पाते थे.
मेरे देखते देखते ज़मीन पर बैठी हुई एक जवान औरत गिरी थी और बेहोश हो गयी थी. पुलिस की लाठियों की मार से बेहोश हुईं बीस औरतें पहले से खाटों पर पड़ी थीं. रात मस्जिद की सभा में मैंने झूठी कसम खायी थी कि ज़मीन्दार के ज़ुल्म के खिलाफ लड़ाई जब तक जीती नहीं जाती, मैं उन्हें छोड़ कर नहीं जाऊँगा. दो हफ्ते बाद ही मैं चला गया था, फ़िर लौट कर नहीं गया.
उसके साल भर पहले वैसी ही एक लड़ाई में मैंने भी मार खायी थी, पुलिस थाने में. और उसी में मुझे एक नया नाम मिला था दीपक. लेकिन सिद्दीक साहब मुझे ओम प्रकाश ही कहते थे, दीपक तो तुम्हें कोई शमा ही कहेगी. गिरफ़्तारी देने जाने लगे थे तो लिपट गये थे कि अब जाने कितने दिनों बाद फ़िर मुलाकात हो. फ़िर मुलाकात नहीं हुई. रावलपिण्डी में मर गये, गरीबी और भूख से. उस आखिरी मुलाकात में कह रहे थे, जल्दी ही हमारा एक कुनबा हो जायेगा, समाजवादियों का, जो हिन्दू या मुसलमान होने से पहले समाजवादी होंगे.
रात ग्यारह बारह बजे तक सभा होती और बारह बजे मोहसिन मुझे पकड़ कर ले जाता और हमारे साथ ही सभा से लौटी उसकी बीबी मेरे लिए चाय बनाती. पाँच बजे सोता, सात बजे उठ जाता, बीस बरस का था. गजब की उम्र होती है, बस एक बार ही आती है ज़िन्दगी में, वरना जाने क्या हो जाये. "चाय और सिगरेट बस यही देखता हूँ, खाते कब क्या हो, कुछ पता नहीं. क्यों अपनी उम्र घटा रहे हो?" "लम्बी उम्र ले कर भी क्या करना है?" "हां तुम्हें तो कुछ नहीं, हीरा तो हमारा खो जायेगा."
नहीं, नहीं, यह सब झूठ है, सब झूठ है. फ़िर इलाहाबाद में पढ़ा था कि बंटवारे के बाद जेल से लोग छूटे उनमें चार सौ मुसलमान थे. सारे पड़ोसी उन चार सौ परिवारों को सीमा तक छोड़ कर आये. बस वही एक जगह थी पूर्वी पंजाब में जहाँ दंगा नहीं हुआ था. मैं चला गया था तो यूसुफ गया था मेरी जगह. प्रसोपा के पहले सम्मेलन (इलाहाबाद) में आया था और रुंधे हुए गले से बोला था अब हम तो यहां परदेसी हो गये हैं. और अभी दो साल पहले मुबारक सागर इलाज के लिए दिल्ली आये थे तो बोले थे - यूसुफ तो अयूब का मुखबिर हो गया था, उसी ने तो हम सबको पकड़वाया.
दीपक मेरे नाम के साथ जुड़ गया, "दीपक होराँ" से दीपक साहब, फ़िर दीपक जी या सिर्फ दीपक. लेकिन उन दिनों जब मैं एक जुलाहा युवक था, तो मेरा नाम क्या था? किसी और तो क्या याद होगा, खुद मुझे ही याद नहीं है. क्यों याद नहीं है? मैं अपने को तसल्ली देता हूँ कि याद रहता तो मैं सचमुच पागल हो जाता. अभी मेरा दिमाग इतना काबू में है कि मुझे याद है दिसम्बर 1946 में जयप्रकाश जी लाहौर गये थे. एक खास बैठक हुई थी, जिसमें मैं भी था और बात हुई थी कि एक गुप्त संगठन जल्दी से जल्दी बनाना चाहिये, शायद जल्दी ही फ़िर अंग्रेज़ी राज से लड़ना हो और इस बार 1942 की गलतियाँ दोहरायी न जायें. फरवरी 1947 में काग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का सम्मेलन हुआ था और सारी बहस इसको ले कर हो रही थी कि क्रांती के बाद संक्रमण काल की व्यवस्था कैसी होनी चाहिये, और इस पर की समाजवादी कांग्रेस के अन्दर रहे या बाहर निकल आयें.
किसी को अन्दाज़ नहीं था, लोहिया सम्मेलन के अध्यक्ष थे, उनको भी नहीं कि तीन महीने बाद हिन्दुस्तान के बँटवारे का फैसला हो जायेगा और सम्मेलन में बैठे हुए लोग भी बँट कर एक दूसरे के लिए परदेसी हो जायेंगे. रावलपिन्डी से चला था और बिना किसी से मिले इलाहाबाद चला गया था. टीन का एक छोटा सा सूटकेस और पांव में रबड़ की चप्पलें. मैं तो शर्णार्थी भी नहीं था, बेगाना था, खुद अपने शहर में भी परदेसी. मैं जिस देश का था, वह देश ही खत्म हो गया था.
पिछले साल बंगलादेश के मुक्ति संग्राम के दौरान मेरा मन बराबर वहीं था, और मैं बराबर कोई तरीका निकाल कर उधर जाने की कोशिश करता था, इसमें मुझको कोंचने वाला मेरे मन के अन्दर भी कोई था, जो शायद चाहता था कि वहीं मौत आ जाये और मेरी ज़िन्दगी मुसलसल झूठ बनने से बच जाये. लेकिन मौत नहीं आयी, मैं बेगाना का बेगाना ही हूँ, परदेसी का परदेसी ही हूँ.
लोग पूछते हैं कि क्या बंगलादेश भारत का दोस्त रहेगा? लोग कहते हैं कि क्या पाकिस्तान के साथ क्या शांति होगी? और मैं चुप रह जाता हूँ. या अखबारी तर्क गढ़ गढ़ कर झूठ बोलता हूँ. लेकिन मेरे मन में एक अजीब सा अहसास उभरता है कि मैं और ये एक ही दुनिया में नहीं रहते. इनकी दुनिया ही अलग है और मैं अकेला हूँ, सबसे बेगाना, सब जगह परदेसी. खुद अपने घर में बेगाना हूँ क्योंकि मेरे बच्चे उस राज्य में पैदा हुए हैं जिसका नाम भारत यानि इण्डिया है. और मेरी पत्नी के लिए झेलम एक नदी का नाम है जो श्रीनगर से गुजरती है और पाकिस्तान में बह कर सिन्धु से मिल जाती है, और एक जिले का नाम है जो पाकिस्तान में है, जहां उसके दादा परदादा रहते थे.
कभी कभी एक बिजली सी कौंध जाती है. पिछली दिस्मबर में जब लड़ाई शुरु हुई थी, तो कमला ने अखबार देखा था और उसके अन्दर से जाने कौन बोल उठा था कि मुझे लगता है कि जैसे मेरे मायके और ससुराल में लड़ाई हो रही है. मुमकिन है कि वह केवल क्षण भर का सत्य रहा हो लेकिन मुझे लगा था जैसे हिन्दुस्तान के इतिहास का बहुत बड़ा सच वह उस एक वाक्य में बोल गयी थी.
लोहिया ने एक बार लिखा था कि उन्हें भारत माता शब्द अच्छा नहीं लगता - भारत बाला या भारत कन्या के रूप में वे इस देश को देखते हैं या देखना चाहते हैं.
भारतबाला. भारतबाला. इस रूप की कल्पना करने की कोशिश करता हूँ तो कमला की बात का दर्द असहनीय लगने लगता है. भारतबाला.
कानपुर से दिल्ली पहुँचे थे तो अखबार पढ़ा था कि लाहौर में दंगा हो गया. हिन्दुस्तान का बँटवारा नोआखाली से नहीं हुआ, बिहार से नहीं हुआ. हिन्दुस्तान का बँटवारा अमृतसर, लाहौर, रावलपिन्डी और मुलतान में हुआ. लाहौर में एक जलूस निकला था जिसमें कांग्रेस के झँडे वाली नीचे वाली हरी पट्टी फाड़ कर निकाल दी गयी थी. मुलतान में डा. सैफूद्दीन किबलू, तब पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष, को मुसलमान दंगाईयों ने मार कर अधमरा कर दिया था. और पंजाब कांग्रेस की कार्य समिति ने प्रस्ताव किया था कि पंजाब को दो हिस्सों में बाँट दिया जाय, पश्चिमी पंजाब और पूर्वी पंजाब. और, और तो बहुत कुछ लिखा गया है. मैं उसमें क्या जोड़ूं, सिवाय इसके कि मैं शरीर और मन से निःश्क्त, निस्तेज, खाली हो कर लौट गया था. लेकिन जिन्दगी में "लौटना" कभी मुमकिन नहीं होता. मुझे कुछ हैरत अब भी होती है कि मेरा दिमाग काम करता रहा. शायद सिर्फ इसलिए काम करता रहा कि एक सवाल उठ खड़ा हुआ था, क्यों?
एक साल तक मैं इस सवाल का जवाब मार्क्स, एजेल्स और लेनिन की किताबों में खोजता रहा था. गांव वालों की नजर में या तो साधू था या सनकी.
तड़ तड़ तड़ तड़. लाहौर की एक तिमंजली इमारत में ऊपर परकोठे की बन्द खिड़की के शीशे से लग कर रात दो बजे तक मैं कर्फ्यू लगे उस शहर की सूनी सड़कों को देखता रहा था आखिरी बार. कार्डाइट के विस्फौट की एक खास आवाज होती है. जिसने राइफल चलने की आवाज नहीं सुनी वह उसे पहचान नहीं सकता. जिसने एक बार सुनी है, वह उसे भूल नहीं सकता. कान में आवाज आती है, किधर से आयी समझें, इससे पहले एक जीता जागता जिस्म जमीन पर गिर कर तड़पने लगता है, और जमीन पहले लाल फ़िर कत्थई होने लगती है.
सूरज की रोशनी की तरह कृपाण चमकती है, या तिरछे फ़ल का छुरा कौंधता है या चाकू. पेट में, पीठ में, सीने में, गले में. नहीं वह मैं लिख नहीं सकता. कोई मंटो ही लिख सकता है. मैंने शराब के नशे में डूबना नहीं सीखा. कभी पी तो अन्दर कोई किसी कठोर पिता की तरह अन्कुश लगाता रहा. हाथी को अपने माथे पर अंकुश की चुभन कैसी लगती होगी? कम से कम मैं तो उससे मुक्त हो कर बदमस्त नहीं हो सका. मुझमें एक कदम भी चलने की ताब नहीं रह गयी, तब भी शायद इतना ही हुआ कि दिमाग के एक बड़े हिस्से पर ग्रहण लग गया.
सिर्फ इकत्तीस जनवरी 1948 की सुबह दो आदमियों ने आ कर खबर दी थी, और फ़िर गांव में अकेला बैटरी से चलने वाला रेडियो सुना था - गांधी जी को किसी ने गोली मार दी थी, तो बाल नोच लिये थे. बदहवास पहली बस से शहर भागा था, वही आखिरी बस थी तीन दिनों तक, जैसे शहर में मुझे कुछ वापस मिल जायेगा. मिला था रेडियो पर रोती हुई आवाज़ों का हजूम.
लोहिया ने मरने से पहले गांधी की याद से एक सवाल पूछा था - आप बटवारे के पहले क्यों नहीं मर गये, छः महीने बाद क्यों मरे? उसके बहुत पहले से खुद अपने आप से पूछते रहे थे, उस दिन मैं जेल में क्यों नहीं था? कमजोर सच, झूठ से भी बुरा होता है. सचमुच कमजोर सच, झूठ से भी बुरा होता है.
लुई माउण्ट बैटन ने गांधी जी को ताना मारा था, हिन्दुस्तान की जनता अब आप के साथ नहीं मेरे साथ है. वह झूठ था लेकिन ताकतवर झूठ था और इसलिए अब तक सच बना हुआ है. ढाका में मैंने कमाल हुसैन से कहा था, यह जहर जो हमारी नसों में भरा हुआ है, यह कैसे जायेगा? पलटन किसी भी नौकरशाही का सबसे संगठित, अनुशासित, आज्ञाकारी और कुशल अंग होती है. 9 महीने तक पाकिस्तानी पलटन और उसके स्थानीय सहायक, अर्ध सैनिक संगठन, बंगला देश में वह सब कुछ करते रहे जो सिर्फ पागल, जंगली, राक्षसी भीड़ें किया करती हैं. कहां से आया यह जहर? कैसे मिटेगा?
लेकिन पाकिस्तानी पलटन ही क्यों? भारत में पिछले पच्चीस सालों से यही होता चला आ रहा है, छोटे पैमाने पर. जमशेदपुरा, राँची, बनारस, इलाहाबाद, मेरठ, इन्दौर, जबलपुर, सागर, भिवंडी, अहमदाबाद, जलगांव, अभी अभी अलिगढ़, फीरोज़ाबाद. गांधी के खून से भी वह जहर नहीं मिटा. और वह एक बूढ़ा, बहुत बड़ा आदमी, वह भी तो पिछले पच्चीस सालों से हर जगह के लिए परदेसी है. वंशीधर शुक्ल की अवधी में एक कविता है, "हुईगा स्वतंत्र भारत हमार". उसकी अंतिम पंक्ति है, "परतंत्र भये अब्दुल गफार".
गांधी शताब्दी के वर्ष में वह भारत आये थे, तो एक बार भ्रम हुआ था, मेरा देश अभी है. लेकिन उनको मिला था अहमदाबाद से उठता हुआ धुँआ. कार्डाइट के अलावा और भी गंध होती है. इंसान के जलते हुए जिस्म की गंध. इन्सान की सड़ती हुई लाश की गंध. अच्छे बुरे का फैसला मैं नहीं कर सकता, लेकिन मेरे दिमाग को ग्रहण लग जाता है. उस अंधेरे को चीरने की कोशिश करने की भी हिम्मत नहीं पड़ती.
लुई माउण्टबैटन का झूठ अब भी झूठ है, और अब भी ताकतवर है. "इण्डिया" यानि भारत के शासक वर्ग की पूरी ताकत उस झूठ के पीछे है. और अब उसकी रजत जयन्ती मानयी जा रही है. मेरे अन्दर कोई ठठा कर हँसता है. रोना बुरा होता है, गो रोया नहीं हूँ, ऐसा नहीं. लेकिन यह हँसी. रोना शायद इससे बेहतर होता. देश के खत्म होने की रजत जयन्ती मनायी जा रही है. बंटवारे की रजत जयन्ती मनायी जा रही है. पच्चीस साल से हमारे खून में घुलते जहर की रजत जयन्ती मनायी जा रही है.
जी में आता है इन्दिरा गांधी को 26 सितम्बर 1942 की याद दिलाऊं. मैं आज तक समझ नहीं पाया कि इन्दिरा गांधी को उस दिन की याद क्यों नहीं आती, बार बार वानर सेना की बात क्यों करती हैं वे. मुझे वह दिन नहीं भूलता. एक खूबसूरत तेजस्वी युवती जिसे पुलिस बार बार पकड़ कर गाड़ी में ढकेलती और वह बार बार उनकी पकड़ से छिटक कर निकल आती. बुलडाग से चेहरे वाला शहर मजिस्टर एन्थोनी झल्लाया एक तरफ खड़ा था. क्या उनके मन में कहीं छिपी कोई अपराध भावना है कि एक साल की सजा के बावजूद ब्रितानी राज ने उनको एक या दो महीने से ज्यादा जेल में रखना जरूरी नहीं समझा था, और उसके बाद फ़िर उन्होंने कुछ नहीं किया? जबकि और कितने लोग थे जो लड़ते रहे थे, आखिर तक लड़ते रहे थे. मैं जानता नहीं. दरअसल मैं यह भी नहीं जानता कि रिहाई के बाद वे क्या करती रहीं. लेकिन इतना तो समझता ही हूँ कि कुछ किया होता तो अब तक छुपा न रहता. लेकिन वह सिर्फ एक दिन भी रहा हो, तो याद करने का दिन ही है.
उस लड़ाई की याद को 15 अगस्त की शर्म के साथ जोड़ दिया गया है जो गांधी जी पर "पण्डित माऊण्टबैटन" की जीत का दिन है. न सन्कल्प का दिन है, न क्रांती का दिन है. 9 अगस्त 1942 के बाद हिन्दुस्तान की जनता उठ खड़ी हुई थी, उस घड़ी हिन्दुस्तान ने आखिरी तौर पर ब्रितानी राज को अस्वीकार कर दिया था. 15 अगस्त 1947 के बाद हिन्दुस्तानी कौम का एक बड़ा हिस्सा वक्ती तौर पर राक्षसी हो गया था.
हिन्दुस्तानी कौम को क्या उसका देश वापस मिलेगा? कहीं एक उम्मीद मन में है कि मिलेगा. कहीं एक डर भी है कि महज दिल बहलाने को ख्याल अच्छा है. इसलिए कि खून में जहर तो बढ़ रहा है और उसे मिटाने की कोशिश कोई नहीं कर रहा. शहर में बड़े बड़े इश्तिहार लगे हें, "सिन्ध के एक लाख हिन्दू शरणार्थियों को जबरदस्ती पाकिस्तान मत भेजो". कोई यह आवाज़ क्यों नहीं उठाता कि वे लोग अपने घरों में फ़िर से बसाये जायें, इनकी समपत्ति उन्हें वापस मिले, निर्भय हो कर यह रह सकें, इसकी गारण्टी भारत सरकार ले, चाहे इसके लिए एक बार फ़िर पाकिस्तान से लड़ना पड़े.
गैर बंगाली मुसलमानों को बंगला देश से मत आने दो और हिन्दू शरणार्थियों को पाकिस्तान मत भेजो, दोनों बातें एक ही दिमाग से निकलीं हैं जिसमें हिन्दुस्तान का कोई नक्शा नहीं है. इसी दिमाग से बंगलादेश से आवाज उठ रही है कि इस्लाम खतरे में है. यही दिमाग यह स्वीकार नहीं करता कि कि जहर सिर्फ पाकिस्तान में ही नहीं है, भारत में भी है. यही दिमाग भारत से भाग कर पाकिस्तान में शरण लेने वाले हर मुसलमान को सांप समझता है. पाकिस्तान में यही दिमाग भारत में शरण लेने वाले हर हिन्दू को सांप समझता है. यही दिमाग पूरी कौम के खून में घुल रहे जहर से इन्कार करता है, कि जहर तो सिर्फ मुसलमानों में है या जहर तो सिर्फ हिन्दुओं में है. फ़िर एक जबरदस्त बेगानेपन का अहसास मन में उभरता है. 9 अगस्त 1942 का दिमाग तो कहेगा कि भारत को हिन्दू मुसलमान दोनो के लिए ऐसी शरणस्थली बनाओ जहां वे निर्भय हो कर रह सकें. वह दिमाग फ़िर आग्रह करेगा कि फ़िर पाकिस्तान व बंगलादेश भी ऐसी ही शरणस्थली बनें. तो फ़िर बंटवारा अपने आप खत्म होने लगेगा. यह दिमाग नहीं होगा तो हर क्रांती अवरुद्ध हो जायेगी. हर शिखर वार्ता अगर बंटवारे को और मजबूत बनाने वाली नहीं तो बाँझ साबित होगी. खून में जहर बढ़ता चला जायेगा, बढ़ता ही चला जायेगा. यह दिमाग नहीं होगा तो हर बड़ी ताकत सतरंज के मोहरों की तरह भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश का इस्तेमाल करेगी. 15 अगस्त के दिमाग को बढ़ावा देगी. एक बड़ी और ताकतवर कौम की जगह तीन छोटे छोटे कमजोर राज्यों का इस्तेमाल आसान होता है.
इतना कुछ लिखने के बाद भी लगता है कि आखिर मैं क्यों लिख रहा हूँ, किसके लिए लिख रहा हूँ? एक कमजोर सच को कह देने भर से क्या, जबकि वह बहुत कुछ शायद मेरा निजि सच है? इसलिए मैं चाहता हूँ कि अपने को बाँधू और अपनी बात को संगठित करूँ. अनुभव को तर्क और विश्लेषण में बदलूँ. लेकिन आज नहीं कर पाऊँगा. मुमकिन है कि कल कर सकूँ, या परसों या हफ्ते बाद, या महीने बाद. कोशिश करूँगा. इससे ज्यादा नहीं कह सकता, कौन जाने फ़िर अपने को बांधने की कोशिश करूँ और फ़िर अपनी ही मुट्ठी से फिसल जाऊँ.
सुनील दीपक की आलेख के बारे में टिप्पणियाँ
ओम ने यह आलेख अपनी मृत्यु से करीब तीन वर्ष पहले लिखा था. आलेख कुछ इस तरह लिखा गया है कि इसमें तारीखें और जगहें समझना आसान नहीं. 1972 की दिल्ली का राजेन्द्र नगर, 1961 का हैदराबाद, 1971 का ढाका, 1946-47 का लाहौर और रावलपिण्डी, 1942 का इलाहाबाद, सब कुछ घुला मिला सा है इस आलेख में.
कुछ भावुकता भी अधिक है. शायद "चौरंगी वार्ता" के लिए वह "जन" के सम्पादक और दिनमान जैसी पत्रिका में लेखने के नाते बड़े लेखक समझे जाते थे जिसकी वजह से उस समय उनके आलेख में स्पष्टता लाने के लिए सुधार किये बिना ही उसे छाप दिया था?
आलेख के प्रारम्भ में जिन भिखारियों की बात करते हैं, वे मुझे भी याद हैं, वे कुष्ठ रोगी युगल था जो दिल्ली के राजेन्द्रनगर में भीख माँगते थे. जिसमें पत्नी अपने पति को हाथगाड़ी पर बिठा कर धक्का देती हुई जोर जोर से रोती हुई भीख माँगती थी.
मुझे इस आलेख में 1946-47 के लाहौर और रावलपिण्डी वाले हिस्से सबसे अधिक अच्छे लगे, जब वह मुसलमान जुलाहा बन कर वहाँ समाजवादी काँग्रेस की तरफ़ से जनआन्दोलन बनाने का सपना देखते थे. इसी संदर्भ में जब वह झेलम नाम की बात करते हैं तो मुझे लगा कि इस नाम का अपने जीवन में किसी गुप्त अर्थ का इशारा दे रहे थे.
आलेख में उन्होंने 1942 में इलाहाबाद में इन्दिरा गांधी की गिरफ़्तारी की बात भी की है. उस समय वह इन्दिरा गांधी की उम्र 25 वर्ष थी. और उस समय वह केवल 15 वर्ष के थे और इलाहाबाद में पढ़ाई छोड़ कर, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में पहले कदम ले रहे थे. तीस साल बाद उसके बारे में लिखते हुए शायद उनकी यादाश्त उतनी तेज नहीं थी. आज हम विकीपीडिया की सहायता से यह जानते हैं कि इन्दिरा गाँधी को 11 मई 1942 में हिरासत में लिया गया था, तब उनके विवाह को कुछ दिन ही हुए थे. और एक दो महीना नहीं, वह आठ मास तक नैनी जेल में रही थीं. शायद उनकी उस जेल यात्रा में जाने का कारण, अपने पिता से अपने फ़िरोज गांधी से हुए विवाह के कारण होने वाले मन मुटाव से जुड़ा था? जेल से रिहा होने के कुछ महीनों बाद उनके पेट में राजीव गांधी आ गये थे, जिससे यह समझ में आता है कि उसके बाद उन्होंने क्यों भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में उस तरह से भाग नहीं लिया था. मैंने अपने पिता को हमेशा इन्दिरा गांधी के विरुद्ध बोलते हुए ही सुना था, इसलिए इस आलेख में उनका इन्दिरा गांधी को "सुन्दर व तेजस्वनी युवती" कहना कुछ अनोखा सा लगा.
भारत के विभाजन में कुछ भारत में रहने वाले इस तरह के हिन्दू लोग थे जो शायद पाकिस्तान में रहना पसंद करते या पाकिस्तानी हिस्से में रहने वाले इस तरह के समाजवादी मुसलमान थे जो कि भारत में रहना पसंद करते, इस बारे में पहले नहीं सोचा था, जो इस आलेख को पढ़ कर लगा. लेकिन शायद आज उनकी तरह अविभाजित भारत का सपना देखने वाले या यह सोचने वाले कि भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश में हिन्दू, मुसलमान और अन्य धर्मों के लोग हर देश में बिना असुरक्षा के रह सकेंगे, अविश्वासनीय सपना सा लगता है. मेरे विचार में आज भारत और पाकिस्तान के बारे में उनकी तरह सोचने वाला कोई विरला ही होगा और अधिकतर लोग उनकी बात को समझ तक नहीं पायेंगे.
पिता के पुराने आलेख लिखना मेरे लिए उनको जानने समझने का तरीका है, बस दिक्कत यही है कि उनसे उनके विचारों के बारे में अब बहस नहीं हो सकती!
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30 अक्टूबर 2011
उपेन्द्र नाथ अश्क
उपेन्द्र नाथ अश्क हिन्दी के सुप्रसिद्ध लेखकों में गिने जाते हैं. कुछ दिन पहले अपने पिता के कागज़ों में से मुझे उनका एक पत्र मिला, जिसे उन्होंने 20 फरवरी 1962 में लिखा था. तब वह 5 ख़ुसराबाग़ रोड, इलाहाबाद 3 में रहते थे. इस पत्र में वह अपने लेखन की बात भी करते हैं. प्रस्तुत है उनका यह पत्रः
प्रियवर दीपक जी,
आप का 30 जनवरी 1962 का कृपापत्र समय से ही मिल गया, पर आपने उस पर पता नहीं लिखा. और पित्ती साहब का वह पत्र जिस में उन्होंने आप का पता दिया था, मुझे मिला नहीं. आज सहसा जब कागज़ों में ही वह पत्र मिल गया तो मैं उसमें से पता देख कर आपको पत्र लिख रहा हूँ. अब कभी आप का बेपते का पत्र आया और मैं उत्तर न दे सका तो मुझे दोष न दीजियेगा. मेरे यहाँ बड़ी अव्यवस्था है. एक बार की गुमी हुई पुस्तक या चिट्ठी फ़िर नहीं मिलती.
मैं आप से सहमत नहीं कि हमारे यहाँ किसी को संस्मरण लिखने नहीं आते. मैं आजकल संकेत (उर्दू) की छपाई में लगा हूँ उसमें दो संस्मरण इतने अच्छे हैं कि पाँच छै बार पढ़ने पर भी फ़िर पढ़ने का मन होता है. एक इसमत चग़ताई ने अपने भाई अज़ीमबेग चग़ताई पर लिखा है और दूसरा साहिर ने देवेन्द्र सत्यार्थी पर लिखा है.
कौशल्या द्वारा भेजी गयी पुस्तक में भी बेदी, कृष्ण, मार्कण्डेय, सुधीन्द्र रस्तोगी तथा कौशल्या के संस्मरण बहुत अच्छे हैं. यों नज़र अपनी अपनी, पसन्द अपनी.
यह जान कर आश्चर्य हुआ कि आज से बीस साल पहले आप की कहानी छपी थी. शायद राजनीतिक कार्यों में फँसे रहने के कारण आप इधर ध्यान नहीं दे सके. मैं इसे हिन्दी का दुर्भाग्य ही कहूँगा. अजीब बात यह है कि आप की कोई भी कहानी मेरी नज़र से नहीं गुज़री. यद्यापि मैं प्रायः सब पत्र पत्रिकाएँ देखता हूँ. कभी कभी जब मैं अत्याधिक व्यस्त होता हूँ तो नहीं देख पाता. तो भी कभी जब आप संग्रह रूप में उन्हें प्रस्तुत करें, मैं देखना चाहूँगा.
नयी कविता अधिकांश झूठी हैं. लेकिन अच्छी कविता सदा ही कम परिभाषा (?) में रहती है ढेरों साहित्य लिखा जाता है. उच्च कोटि का अव्यक्त कम परिमाषा (?) में निकलता है, यही बात कविता पर लागू होती है. मैंने "सड़कों में ढले साये" की भूमिका में व्यंग विनोद शैली में काफ़ी पते की बातें कहीं हैं, पर उन बातों पर विचार करने के बदले लोग चिढ़ गये और गाली गलौज पर उतर आये. बहरहाल कभी पढ़ियेगा तो ज़रूर राय दीजियेगा.
"पँलग" की कहानियों पर इधर बड़ी ले दे मची है. मैं तो समझता हूँ कि वर्षों बाद मैंने कुछ बहुत अच्छी कहानियाँलिखी हैं और मैं उनसे सन्तुष्ट भी हूँ. लेकिन लेखक की राय कोई महत्व नहीं रखती. आप पढ़ें तो ज़रूर राय दें. मैं प्रतीक्षा करूँगा.
मैं इधर "सन्केत" (उर्दू) के सिलसिले में व्यस्त हूँ. 600 पृष्ठों का संकलन है. अभी चार छै कार्य शेष हैं. छप जाये तो जान छूटे. बहुत थक गया हूँ.
इधर बीमारी ही में मैंने अपने बृहत उपन्यास "गिरती दीवारें" का दूसरा भाग "शहर में घूमता आइना" के नाम से पूरा किया है. यह साल तो उसी के revision में लगेगा. फ़रवरी 1963 में ही उसे प्रकाशित करूँगा. तब एक प्रति आप के अवलोकनार्थ भेजूँगा.
सखाऊ (?)
उपेन्द्र नाथ अश्क
टिप्पणीः जैसा कि आप नीचे चिट्ठी के अंतिम पृष्ठ की तस्वीर से देख सकते हैं, वैसे तो अश्क जी की हस्तलिपि साफ़ थी लेकिन मात्रा लिखने का तरीका कुछ विशिष्ठ थी और कुछ शब्द समझने में मुझे कठिनाई हुई. जहाँ मुझे शब्द समझने में दिक्कत हुई वहाँ (?) का निशान लगाया है.
सुनील दीपक
30 जुलाई 2011
अपना परिचय
ओम प्रकाश दीपक का परिचय
जन्मः २७ जनवरी १९२७, इलाहाबाद
लम्बी ख़ानाबदोशी के बाद अक्टूबर नवम्बर १९६१ से दिल्ली में. पिछले बीस पच्चीस सालों में प्रूफ़रीडरी से ले कर संपादगी तक की - संपादकी के बाद प्रूफ़रीडरी, इस क्रम से भी. अगस्त १९४२ में पन्द्रह साल की उम्र में पहली गिरफ़्तारी के कुछ दिनों बाद से ही समाजवादी आन्दोलन से सम्बद्ध रहा हूँ. ज़िन्दगी में राम मनोहर लोहिया से जितना सीखा उतना किसी और से नहीं. लिखना बहुत अनियमित रहा. दिल्ली आने के बाद से ज़रूर बहुत कुछ नियमित लिख रहा हूँ. अनुवाद किए, स्वतन्त्र पत्रकारिता भी की, सड़कें भी नापीं. आजकल "जन" का संपादन कर रहा हूँ.
१९४९ में उस लड़की से भेंट हुई थी जिसने दो साल बाद पत्नी के रूप में मेरी ज़िन्दगी में हिस्सा बँटाने का जोखिम भरा सफ़र शुरु किया. अभी तो सफ़र चल ही रहा है. एक बेटा है, दो बेटियाँ.
इस परिचय को उनके हाथ की लिखायी में पढ़िये.
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29 जुलाई 2011
छिटपुट
आज कमला का एक पत्र और आया है. पैसे मिल गये थे. हाल तकरीबन अच्छा ही है. लिखा है कि दिल्ली जा रही हूँ. अगर टैक्स देना पड़ा तो माता जी को अपने पैसों में से ही देना पड़ेगा. डेढ़ सौ कर्ज़ भी लिया माता जी ने और सब इधर उधर में ही निकल गया. मई में गुड्डे का मुंडन करना होगा. पता नहीं मानवी के पैसे उसके लिए मिलेंगे या नहीं.
पत्र में कमला ने मेरी उस डायरी का भी ज़िक्र किया है जो मैंने लखनऊ में लिखा था. तब से अब बहुत कुछ बदल गया है. जीवन में वह तनाव नहीं है, न अच्छा, न बुरा. जो जीवन की अनिवार्य आवश्यकताएँ हैं, उसकी क़दर शायद मैंने अधिक सीख ली है और उससे अधिक की मांग करना कमला ने बन्द कर दिया है. हम दोनो में कुछ दिमागी प्रौढ़ता भी आ गयी है. सम्बन्धों की बात क्या करूँ? चमक कम है, स्थायित्व ज़्यादा है. चमक भी शायद इसलिए कम है कि कि फुर्सत ही नहीं है. मैं अलग फँसा हूँ और मुझसे भी ज़्यादा वह फँसी हुई है, घर के झँझटों में. चमक कहाँ से आये. लेकिन इस एक साल के अन्दर अगर उसका स्वास्थ्य ठीक हो जाये और पैसों का दिन रात का रोना ख़तन हो तो चमक भी फ़िर आ जायेगी, यह निश्चित ही है.
और कोई विषेश बात नहीं है. इंदुमति की पुस्तिका पहले तैयार करनी है. उसके बाद रिपोर्ट. साप्ताहिकी का काम सो संभवतः कल खंतम हो जायेगा.
बड़ी बहन जी और कशपी को ख़त लिखे थे, आज भेज भी दिये हैं.
हैदराबाद, 7 फरवरी 1957
कमला का एक पत्र कल दिल्ली से आया. ठीक ही है सब जवाब भी कल रात को भेज दिया था. बद्री आज दफ्तर आये थे, लेकिन मैंने कोई बात नहीं की, तबियत भी नहीं है कि करूँ. फ़िर किसी समय भेंट हुई तो जितेन्द्र सिंह, लक्ष्मीकांत और लक्ष्मीनारायण लाल वगैरह की शिकायत पहुँचा दूँगा. देखूँ क्या कहते हैं. भारती को चिट्ठी लिखनी चाहिये. याद रहा तो लिखूँगा.
रमा को आज लोकनाथ ने टेलीफ़ोन किया था. उसके पहले एक टेलीफोन रीवा से आया था. विधानसभा में निशान "पंजा" दे दिया है और रमा को "पेड़". लोकनाथ आज दिल्ली जा रहा है. यह जो सिलसिला चुनाव कमिश्नर ने निकाला है यह तो पार्टी पद्धिति के ही विरुद्ध है. देखें क्या होता है.
इन्दिरा गाँधी ने प्र.सो.पा. पर जो आरोप लगाया था, वह वापस ले लिया है, नेहरू के कहने पर. कुछ टीका करना व्यर्थ है. सिहोरा की रिपोर्ट लिखनी आज शुरु की है.
भविष्य का सिलसिला कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि क्या होगा. गोस्वामी ने आज कुछ काम देने को कहा है, पचीस तीस रुपये का. चलो यही सही.
इन्दुमति को भी एक पत्र आज भेजा है. पुस्तिका के बारे में. उसमें भी डाक्टर साहब से डाँट खानी पड़ेगी शायद.
और क्या लिखूँ, दिमाग खाली सा ही है. वह कहानी जो अंग्रेजी में लिखनी शुरु की है, पूरी करनी है. कल से कुछ चिट्ठी पत्री भी शुरु करनी है.
हैदराबाद, 8 फरवरी 1957
आज सुबह कृष्ण कुमार का पत्र आया है. गोपी ने उसे पैसे नहीं दिये और वह चुनाव नहीं लड़ सका. उसे उत्तर भी आज भेज दिया है, देखें क्या जवाब देता है.
सोच रहा हूँ कि किन्हीं विदेशी पत्रिकाओं के लिये अगर कुछ लिखूँ तो काफ़ी पैसा मिले. सुरेन्द्र से भी इस पर बात की है. वह खुद कुछ लिखने की सोच रहा है. कल अगर USIS की लायब्रेरी से जा कर कुछ पते ले आऊँ तो परसों एक लेख लिख डालूँ और एक आध को भेज दूँ. अगर एक भी छप जाये तो काफ़ी पैसे मिल जायें. Books Abroad के लिए Asian Writers Conference पर भी कुछ लिख कर भेज सकता हूँ. या Harper's Magazine भी कुछ काम की हो.
(ओम की डायरी से)
09 जुलाई 2011
ओम की डायरी
कई सालों के बाद फ़िर जर्नल लिखना शुरु कर रहा हूँ. इस बीच में कितना कुछ हो चुका है. पार्टी टूटी, नयी पार्टी बनी. "संघर्ष" तो मैंने शायद पिछली डायरी लिखने के समय ही छोड़ दिया था, लखनऊ भी छूटा. इलाहाबाद जाते ही मकान भी बिक गया, फ़िर गोपा मर गई. दस महीने लीडर प्रेस में प्रूफ़ पढ़ने के बाद उसे भी छोड़ा, छः महीने "आदमी" निकालने की चेष्टा करता रहा, फ़िर जुलाई छप्पन से यहाँ हैदराबाद में हूँ. पिछली बातों पर नज़र क्या डालूँ, नये साल से ही शुरु करना अच्छा होगा. मन में तो न जाने क्या क्या है. सब लिख भी नहीं सकूँगा.
सम्मेलन में जाने से पहले नव हिन्द वालों के लिए एक किताब लिखी, और मिले कुल डेढ़ सौ रुपये जबकि रायल्टी का हिसाब होता तो छः सौ बनते. कुछ अनुमान इसी से लग जाता है कि यह दुनिया क्या है, किस वातावरण में हूँ. मेरे जैसों की जगह कहाँ है, कुछ यही समझ में नहीं आता. यहाँ भी काम नहीं चलता. सब मिला कर पिछले सात महीनों में सात सौ रुपये पार्टी के और पांच सौ रुपये ऊपर से, कुल बारह सौ रुपये मिले हैं जिसमें से आठ सौ रुपये तो कमला को भेजे, 400 खुद खर्च किये और दो सौ का कर्ज़ है. मतलब हुआ कि दो सौ रुपये से कम में काम नहीं चल सकता. लेकिन दो सौ रुपये आयें कहाँ से? दफ्तर से सौ मिलते हैं, विपिन के आने पर बात करूँगा, तब शायद डेढ़ सौ कर दें. लेकिन 50 रुपये महीने की तो फ़िर भी कमी रहेगी ही. मार्च तक तो छोड़ कर जाना भी मुमकिन नहीं. समस्या यह है कि मार्च तक भी काम कैसे चलेगा. और छोड़ कर जाऊँगा भी कहाँ? सोच रहा हूँ कि कुछ विदेशी पत्रिकाओं के लिए कुछ लिखा करूँ. लेकिन एक तो कोई सिलसिला नहीं. दूसरे, अगर कोई छापे भी तो सम्पर्क बनाते कुछ समय लगेगा. ख़ैर कोशिश तो करूँगा ही, देखो क्या होता है.
इस बार इलाहाबाद की यात्रा सुखद से अधिक दुखद रही. जो हाल है घर का, उसने मन पर विचित्र सा बोझ छोड़ दिया है. माता जी अब थक गयीं हैं, उन्हें अब आराम की ज़रूरत है. लेकिन अगर वे काम छोड़ दें, तो वह आमदनी भी बन्द हो जाये. कमला सुबह छः बजे से ले कर रात तक जुटी रहती है, फ़िर भी उसे न मानसिक शान्ती है, न शारीरिक सुख सुविधा. गुड्डा बेचारा अलग परेशान रहता है. मुनियाँ से उसे कोई ईर्ष्या नहीं होती, लेकिन वह प्यार का, ध्यान का भूखा रहता है. दूसरी ओर माता जी और कमला के भावनात्माक तनाव के बीच, उसकी दुर्दशा हो जाती है. हिन्दुस्तान के ज़्यादातर घरों की हालत कहीं बुरी है, इससे कैसे संतोष मिले. उन्हें तो चेतना नहीं है. शारीरिक दुख वे उठाते हैं, लेकिन मन में उसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती. अपने साथ तो शरीर का दुख गौण और मन का दुख प्रधान है. भौतिक जीवन में भी सफ़ाई से रहना हमने सीखा है, इस कारण और भी कष्ट होते हैं. सफ़ाई से रहने के लिए पैसा चाहिये.
उस दिन गुड्डे को मैंने पीटा, वह मुझे बहुत दिन तक नहीं भूलेगा. गलती हमारी थी, उसे ले कर जाना ही नहीं चाहिये था. उसके वे शब्द, "मारो नहीं" न जाने कब तक मेरे कानों में गूँजते रहेंगे. कैसी क्रूरता है जीवन में. कैसी विडम्बना है. उसे बुखार में छोड़ कर आया था. न जाने कैसा है अब. कमला ने अभी तक पत्र नहीं भेजा.
(ओम प्रकाश दीपक की डायरी से)
06 फ़रवरी 2011
उलझने
(कमला दीपक की डायरी से)
ज़िन्दगी में कुछ इस तरह उलझी रही कि उस समय सुख की कद्र नहीं कर पायी और आज बार बार अतीत को याद करके लगता है कि मेरे पास कुछ ऐसा था जिसे मैं संभाल कर नहीं रख पायी. उस हीरे की कीमत लगा नहीं पाई थी. ज़िन्दगी के अन्य झमेलों में उलझी कहीं और ही भटकती रही. वह सब अब आयु के साथ इस पड़ाव में बहुत याद आ रहा है. इधर बहुत दिनों से तुम्हे देखा भी नहीं.
फ़रीदा ख़ानुम्म की गज़ल "आज जाने की ज़िद न करो, यू ही पहलू में बैठे रहो, जान जाती है जब उठ के जाते हो तुम" की पंक्तियाँ दिमाग में घूमती हैं. फ़ैज़ को भी इधर बहुत दिनो से नहीं सुना. शायद वह कैसेट गुड्डे के पास है.
12 जून 2001 दिल्ली
इधर समय कुछ ऐसे गया कि कुछ पता ही नहीं चला. पिछले वर्ष मई 2000 में लिखा था, उसके बाद तुम्हारी लेखन सामग्री इकट्ठी करने में जुट गयी. पिंकी के पास से फरवरी 2000 में दिल्ली लौट आयी थी. चार वर्ष पूर्व कोहाट की ज़मीन बेच कर अलकनंदा में घर खरीदा था, स्वयं वहां रह नहीं पायी, लेकिन सामान सब वहीं रखा है. अधिक समय पिंकी के वास विदेश में निकल जाता है. यहाँ आ कर विनी के घर रह जाती हूँ. घर पास ही है, बीच बीच में जाती रहती हूँ.
इधर एक इच्छा हो रही है कि अब कुछ समय कहीं अलग से शान्त और सुनसान जगह पर व्यतीत करूँ. पिछले कई वर्षों में शरीर और मन दोनो से थक गयी हूँ. अड़सठ वर्ष की होने को आयी हूँ. मानसिक उथलपथल से छुटकारा नहीं मिल रहा है. अकेले परेशानियां सुलझाते सुलझाते थक गयी हूँ मैं, तुम सब मेरे भरोसे छोड़ कर लम्बी नींद सो गये.
1 सितंबर 2001, दिल्ली
तुम्हारा उपन्यास "कुछ ज़िंदगियाँ बेमतब" छप कर आ गया है. नन्द किशोर आचार्य ने भूमिका बहुत अच्छी लिखी है, छपाई भी अच्छी हुई है.
कभी कभी सोचती हूँ कि आदमी सम्पत्ति से नहीं स्वतंत्रता से सम्राट होता है. मेरे पास मैं हूँ और इससे बड़ी कोई सम्पदा नहीं है. मैं सोच नहीं पाती कि मेरे पास क्या नहीं है जो किसी सम्राट के पास है. सौंदर्य देखने के लिए आँखें हैं, हृदय है और प्रार्थना में प्रवेश करने की क्षमता है. पर फ़िर भी तुम्हारी कमी अखरती है.
शादी एक दूसरे के लिए सुविधानुसार एक साथ जीने के लिए की थी और एक दूसरे का ख्याल, एक दूसरे की ज़रुरत को समझा. कभी शिकायत का अवसर नहीं दिया. कई बार तर्क वितर्क हुए लेकिन उस स्थिति में अच्छी तरह समझौता किया. शिकायतें थीं लेकिन कभी की नहीं तुमसे. तुम भी ज़रुरत के समय मेरे साथ रहे. साथ रहने व निर्णय एक दूसरे की इज़्ज़त के साथ एक दूसरे के लिए किया. सो अभी भी वैसा ही लगता है कि तुम्हारा एहसास तो हमेसा साथ रहेगा. तुमने तो बच्चों का कुछ देखा नहीं, मैं अच्छा बुरा सब देख रही हूँ तुम्हारे अंशों का.
(माँ की डायरी से)
23 अगस्त 2010
स्मृतियों के दंश
(कमला दीपक की डायरी से)
आज न जाने क्यों स्मृतियां चीटियों की तरह लहुलुहान मन को चाटने लगी हैं. उम्र की इस पड़ाव पर पीड़ाएँ आप छुपा सकते हैं, चेहरे के कसाव या जुबान की खामोशी में, लेकिन उसका प्रभाव शरीर या मन पर पड़ने से कब रुक पाता है?
अन्तराल कितने वर्षों का आ गया है, तेईस वर्ष बीत गये. क्या कुछ हुआ, गुज़रा सबके अपने अपने दायरों में, कौन कितना रीता, कितना बदला, इस सब का हिसाब कैसे लगायें? अब लगता है कि अपने बाल उम्र में नहीं, सचमुच धूप में सफ़ेद किये मैंने. ठूँठ की ठूँठ ही रह गयी, खड़ी स्थिर और सब कुछ चलता नहीं, दौड़ता रहा, जैसे स्वयं ही नियती ने सब निश्चित कर दिया हो.
माँ के जीवन की सार्थकता उसके बच्चे ही होते हैं. वह स्वयं कुछ नहीं कर सकती. हालातों से मुक्ति मुश्किल है, उसे ही नये पुराने समाज में सामंजस्य बना कर सन्तान की ममता की डोर थामनी पड़ती है. मोह का जाल न चाहते हुए भी बुनता जाता है, जिसे काट कर मुक्त होने में स्वयं को असमर्थ पाती हूँ. वह क्षमता मुझमें कभी आयी ही नहीं. इसीलिए बदले समाज और मनुष्य से रिश्ता बदलते तेवरों को मैंने हमेशा अस्वीकार किया. खुल कर समाज के सामने आ कर के दायित्व ही निभाया किसी तरह.
आत्म विस्मृति मनुष्य को साधारण अवस्था में किंकर्तव्यविमूढ़ बना देती है. प्राकृतिक नियमों की सूक्ष्म श्रृखलाएँ स्वयं बनती बिगड़ती रहती हैं. कर्म के नियमों के कुछ पहलू यंत्रवत चलते हैं, सो बुद्धिमान व्यक्ति इन्हीं आदर्शों को प्रतीक मान स्वयं परिस्थितियों को अनुकूल कर अपने हिसाब से ढ़ाल लेता है. यदि अदृश्य शक्ति मुझे थोड़ी बुद्धि और देती तो शायद मैं इस तरह की न बन कर कुछ अधिक प्रखर व स्वतंत्र खुद को बना पाती.
अब लगता है कि मैं स्वयं क्यों चार दिन भी अपने लिए न जी पायी. स्वयं को तलाशने की साध धरी रह गयी. बर्फीली नदियां शरीर पर बहती रहीं और मैं स्वयं मुट्ठी भर धूप बाँटती रही सभी के लिए. जहाँ तक सम्भव हुआ अपनी परम्परा व उत्तरदायित्व निभाती रही.
एक बार छोटी बेटी ने शिकायत भी की थी कि कैसे संस्कार दिये हैं कि उनसे बाहर निकल ही नहीं पाते. यहाँ दोषी हूँ, स्वयं भी नहीं निकल पायी.
मैं तो पल पल बहने वाले वर्तमान के सा इस तरह बह रही हूँ कि मेरे लिए भविष्य का कोई वजूद ही शेष नहीं है अब. कमज़ोर पड़ने लगी हूँ मैं. आस्थाएँ भी डगमगाने लगी हैं. लगता है कि अब इस एकांत में रह कर मैं स्वयं को तलाशने लगी हूँ. स्मृतियों की कर्म श्रृँखलाओं से मुक्ति चाहने लगी हूँ. स्वयं को भूलने लगी हूँ. कभी न कभी जाने किन गहराईयों में मन डूबने लगा है तब स्वयं को असहाय पाती हूँ. पिछले तेईस वर्षों में अकेले ही अपने दायित्वों और कर्तर्व्यों में उलझी रही और धीरे धीरे सभी प्रेरणा सोत्र और परिचित मेरा साथ छोड़ते जा रहे हैं, लोग जिन्होंने स्नेह और सहयोग से मेरी सहायता की, मेरे अकेलेपन और अभावों में साथ रहे. ऐसे प्रिय साथ छोड़ते गये जिनसे मन की बात होती थी.
पिछले कुछ दिनों से लगातार तुम्हें देख रही हूँ, लखनऊ, इलाहाबाद, हैदराबाद, दिल्ली और यहां अमेरिका में भी. अचानक नींद टूटती है, हड़बड़ा कर अपने आसपास देखती हूँ, बड़ी विचित्र हूँ मैं. कारण समझ नहीं पा रही हूँ. कहीं कुछ विषेश घटने वाली बात है क्या? जो घट रहा है उससे ज्यादा अब क्या होगा? आने वाला भविष्य और क्या लायेगा? कितनी ज़िन्दगी और है? अदृश्य रह कर तुम प्रेरणा देते हो, फ़िर भी बहुत कमज़ोर पाती हूँ स्वयं को. जब तक जीवन है सामना तो परिस्थितियों का करना ही होगा. भविष्य कब कहाँ छोड़ता है? कौन जाने. अचानक यह सब हुआ कि मुझे स्वयं को संभालने में समय लगेगा. ज़ख्म गहरा है न. सोचने की शक्ति भी अब तो नहीं रही. पढ़ने की कोशिश करती हूँ लेकिन जो पढ़ती हूँ याद नहीं रहता कि क्या पढ़ा है. दिमाग सुन्न है. आयु भी तो बढ़ रही है, उसी का असर होगा. फ़ैज़ की गज़ल का छोटा सा हिस्सा जो तुम्हें बहुत पसंद था और प्रायः गुनगुनाया करते थे दिमाग में घूम रहा हैः
वेती चले गये हैं दिल
याद से उनकी प्यार कर
ग़म है तेरे नसीब में
मौत का इंतज़ार कर
तुम्हारी स्मृति ही मेरी शक्ति, विश्वास और आस्था रही है, उसका अवलंबन कर यहाँ तक खिंचती चली आयी हूँ. इस बीच समझ नहीं पायी कि समय की गति के साथ बहते हुए यहां तक आयी हूँ. आज अचानक एक घटना याद आ गई, अचानक याद आ गया कि कहीं किसी की ऊँची आवाज़ आ रही है. प्लेन था फ्रेंकफर्ट से दिल्ली के लिए, सो सोचा घूम लेती हूँ, हैंडबेग उठा कर चल पड़ी. बहुत लोग इक्टठे थे और एक प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले स्वामी जी, गोरे लाल ऊँचे कद के, साथ ही गेरुआ वस्त्र धारण किये लोगों को पश्चिमी संस्कृति की आलोचना और भारतीय संस्कृति की विषेशताएँ बता रहे थे, "यहाँ के लोग मेटिरियलिस्ट हैं, मोबाईल और ट्राँजिस्टर के अतिरिक्त कुछ सोचते ही नहीं, ईश्वर, नैतिकता और धर्म को भूल बैठे हैं, लेकिन हम भारतीय नैतिक और आध्यात्मिक रूप से कितने विकसित हैं." स्वामी अच्छे वक्ता होने के साथ साथ विद्वान भी दिखाई देते थे. धर्म और दर्शन सम्बंधी संस्कृत के श्लोकों का अंग्रेज़ी अनुवाद भी पप्रभावशाली ढंग से कर रहे थे, भोग और मोह निन्द्रा में पड़े लोगों को धर्म और आध्यात्म का मार्ग बता रहे थे. घन्टा भर सुनने के पश्चात स्वयं को रोक नहीं पायी, तब उनसे पूछा कि स्वामी जी आप यह बात क्यों नहीं समझते कि आध्यात्मवाद की जितनी जरूरत हम भारतीय लोगों को है उतनी इन लोगों को नहीं है. कुछ क्षण तक सन्नाटा रहा और स्वामी जी मुझे तीखी नज़रों से देखते रहे. तो मैंने कहा स्वामी जी आप जानते हैं हमारे देश में इस आध्यत्मिकता के कारण जितनी उन्नती हुई है? ठगी, घूसखोरी और अनैतिकता और चोर बाज़ारी अपने चरम पर हैं. साधारण आदमी अंध विश्वासों में डूब कर आप की भारतीय संस्कृति की बखिया उधेड़ रहा है और इस स्थिति में हमारी संस्कृति और आध्यात्मिकता धार्मिकता आप को अर्थहीन नहीं लगती, यह जो प्रवचन आप दे रहे हें इसे आत्मप्रवंचना ही कह सकती हूँ मैं. यहां के लोग इस तरह के अंधविश्वास से दूर हैं और जैसा चाहते हैं वैसा स्वछन्द जीवन जीते हैं तथा हमारी तरह की नैतिकता नहीं बघारते. कब तक आप इस अर्थहीनता में स्वयं को और अपनी सांस्कृतिक धरौहर को बेचते रहेंगे? कुछ तो इस तरह का काम करें कि उसका लाभ आप के देश और समाज को मिल सके.
स्वामी जी खीजे स्वर में बोले, "भौतिकचाद की पूजा करने वालों में नैतिकता कहां रह गयी है. पश्चिम वालों को कृतज्ञ होना चाहिये कि हमने उनके उद्धार के लिए आज भी वस्तुवाद की दुनिया में रह कर भी धर्म और ईश्वर को सहेज रखा है." धर्म और ईश्वर पर केवल भारत का कैसे अधिकार हो? लेकिन मैं वहां से चली आयी. कितने लोगों को स्वामी जी के साथ यह वार्तालाप समझ में आया यह अन्दाज़ मुझे नहीं है लेकिन स्वयं स्वामी जी काफ़ी परेशान दिखाई दे रहे थे.
जिस धर्म दर्शन और ऊँची संस्कृति की लम्बी चौड़ी व्याख्या हम भारतीय करते हैं, वह तो अब केवल खण्डहर ही रह गये हैं और धार्मिकता और अध्यात्मिकता के यह ठेकेदार उन खण्डहरों को भी अपने लिए नहीं रखेंगे, मुझे लगता है.
लोग विदेशों से भारतीय संस्कृति के इन खण्डहरों में स्वयं ही भारतीय आध्यात्मिकता धार्मिकता और नैतिकता को खोज रहे हैं. यह उन अध्यात्मिकता के रक्षकों की समझ में शायद नहीं आ रहा है और यह संस्कृति के रक्षक ज़मीन पर तो रहते नहीं आकाश में ही विचरण करते हैं तो कैसे समझ सकते हैं?
माँ की डायरी से - शेरोन बोस्टन अमेरिका 1998 (तारीख नहीं लिखी)