ओमप्रकाश दीपक का आलेख (1968)
श्री जवाहरलाल नेहरु गाँधी जी से बीस साल छोटे थे. और राम मनोहर लोहिया श्री नेहरु से इक्कीस साल छोटे थे. आयु का यह फ़र्क इस दृष्टि से महत्वपूर्ण था कि तीनो व्यक्ति, तीन विभिन्न ऐतिहासिक अवधियों में, भिन्न वातावरणों में जवान हुए थे, जिनका उनके व्यक्तित्व पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा.
गाँधी जी जवान हुए थे उन्नीसवीं सदी की आखिरी चौथाई में. राजनीतिक दृष्टि से यह अवधि भारत में शांती व व्यवस्था की अवधि थी. अंग्रेज़ी राज अच्छी तरह से जमा हुआ था, और उसके विरुद्ध विद्रोह की कोई कल्पना नहीं करता था. यह काल था धार्मिक, साँस्कृतिक पुनर्जागरण का. स्वामी दयानन्द का आर्यसमाज फ़ैल रहा था. स्वामी विवेकानन्द नें राष्ट्रीयता और सार्विकता को एक समेथित विचारधारा के रूप में प्रस्तुत किया था.
उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में बंगाल से ही राजा राममोहन राय ने वह परम्परा चलाई थी, जो ईस्ट इंडिया कम्पनी का हित साधन करने का साथ साथ इंगलिस्तान की बौद्धिक साँस्कृतिक परम्परा का प्रचार करती थी. दास जातियों में हमेशा ही एक ऐसा वर्ग होता है जिसके लिए प्रभु जाति की उन विशिष्ठताओं से बढ़ कर, जिनमें वह प्रभु जाति का स्रोत देखता है, दुनिया में और कुछ नहीं होता. सदी के उत्तरार्द्ध में इसके विपरीत विवेकानन्द ने यह लक्ष्य प्रस्तुत किया कि भारत आंतरिक जड़ता और पराधीनता, दोनो से मुक्ति प्राप्त करे. गाँधी इसी परम्परा की अगली कड़ी थे.
श्री नेहरू की किशोरावस्था इंगलिस्तान में गुज़री. युरोप में यह व्यापक सामाजिक हलचल और उथल पुथल का काल था. इस उथल पुथल की परिणति 1914 के महायुद्ध और 1917 की रूसी क्रांती में हुई. हिन्दुस्तान में भी इस अवधि में गंभीर राजनैतिक उथल पुथल शुरु हो गयी थी और तिलक उग्र राष्ट्रवाद के नेता के रूप में सामने आये. विशेषतः रूसी क्रांती के बाद मार्क्सवाद और साम्यवाद का प्रभाव भी युरोप से हिन्दुस्तान आया. 19वीं सदी के युरोपीय प्रभावों की भाँती यह प्रभाव भी नाना रूपों में आया, और इसके प्रतीक बने श्री नेहरू, जिन्होंने अपनी उग्र राष्ट्रीयता के साथ साथ अन्तरार्ष्ट्रीय दृष्टि से युवकों की नई पीढ़ी को बहुत अधिक प्रभावित किया.
राममनोहर लोहिया दोनों महायुद्ध के बीच की क्रांतीकारि अवधि में जवान हुए. तब ऐसा लगता था कि मनुष्य जाति एक क्रांतीकारी परिवर्तन के कगार पर खड़ी है, और शीघ्र ही समता और समृद्धि पर आधारित मनुष्य की एक नयी सभ्यता का उदय होगा. किशोरावस्था में, जर्मनी जाने से पहले, लोहिया को गाँधी और नेहरू, दोनो ने ही आकर्षित किया था. लेकिन गाँधी जी के प्रति उनके आकर्षण में श्रद्धा अधिक थी, शायद एक दूरी भी थी, जबकि श्री नेहरू के प्रति उनके आदर में सहजता और तात्कालिकता थी. नेहरू में वही गुण दिखायी देते थे जो लोहिया खुद अपने में देखना चाहते थे: निर्भीकता, बौद्धिक स्वतंत्रता, संवेदनशीलता और साथ ही एक व्यापक मानवीय दृष्टि.
लेकिन नेहरू और लोहिया की दृष्टि में एक बुनियादी फ़र्क था, जिसने वक्त बीतने पर उन्हें अलग ही नहीं किया, एक दूसरे का विरोधी बनाया. नेहरू युरोपीय सभ्यता के भक्त थे. स्वाधीनता इसलिए आवश्यक थी कि भारत युरोप की तरह अपना विकास कर सके. इस कारण, राज्य से भिन्न राष्ट्र का उनके लिए कोई मतलब नहीं था. इसके अतिरिक्त विश्व के भविष्य के लिए, जिसमें भारत का भविष्य भी शामिल है, युरोपीय सभ्यता की उस विरासत की रक्षा नेहरू को आवश्यक प्रतीत होती थी, जिसका प्रतीक इंगलिस्तान का उदारवाद है. नेहरू की उग्र राष्ट्रीयता और सामाजिक परिवर्तन की इच्छा समय बीतने के साथ युरोपीय सभ्यता के प्रति उनके लगाव के समक्ष गौण पड़ती गयी.
लोहिया जब जर्मनी से वापस आये, तो युरोपीय लोकतंत्र, समाजवाद और रूसी साम्यवाद के प्रति भी उनके मन में काफ़ी आदर था, यद्यपि वह कभी भी मार्क्सवादी नहीं रहे. उन्होंने 1929 के बाद युरोप में मंदी के प्रभाव को और फासिज़्म के उदय को प्रत्यक्ष देखा था. लेकिन शीघ्र ही युरोप से उन्हें निराशा हुई. स्पेन के गृहयुद्ध के समय युरोप के "लोकतांत्रिक" कहलाने वाले देश स्पेनी गणराज्य की हत्या का तमाशा देखते रहे और अप्रत्यक्ष रूप में इस हत्या में सहायक भी हुए. अबिसीनया और चीन पर हमले होने के समय भी यही अनुभव दोहराया गया. इसके अतिरिक्त लोहिया ने देखा कि इंगलिस्तान भारत को बाँटने और तोड़ने की हर मुमकिन और गंदे से गंदे तरीकों से कोशिश कर रहा था, ताकि साम्राज्य का यह रत्न उसे खोना न पड़े.
साम्यवाद के प्रति लोहिया का मोहभंग उस समय हुआ, जब स्टालिन ने बोलशेविक क्रांती के समय अपने पुराने साथियों का सफाया करना शुरु किया. फ़िर तो एक के बाद एक ऐसी घटनाएँ होती गयीं. 1938 में रूस ने हिटलर के साथ अनाक्रमण संधि कर ली. उसके बाद ही रूस ने फ़िनलैंड पर आक्रमण किया और 1939 में जब हिटलर की पलटन पश्चिम से पोलैंड में घुसी, तो पूर्व से रूसी लाल सेना ने भी आक्रमण किया. पोलैंड को रूस और जर्मनी ने बाँट लिया. इन घटनाओं के बाद लोहिया के लिए यह स्पष्ट हो गया कि रूस की क्रांती एक नयी मानवीय सभ्यता का पहला प्रयोग तो नहीं थी, और चाहे जो भी हो. जब युरोप के समाजवादी कहलाने वालों ने किसी भी दशा में अपने साम्राज्यों से हटना स्वीकार नहीं किया, बल्कि फ़ासिज़्म के हाथों अपनी पराजय की संभावना को अधिक स्वीकार्य पाया, तो युरोपीय सभ्यता से लोहिया की श्रद्धा बिल्कुल उठ गयी.
उस अविधि में, 1938 से 1942 के बीच गाँधी और नेहरू के साथ लोहिया के सम्बंध बदले. गाँधी "एक समय में एक कदम" पर विश्वास रखते थे और दूसरे महायुद्ध के आरम्भ में उनका कम से कम नैतिक समर्थन इंगलिस्तान-फ्राँस के पक्ष में था. लेकिन गाँधी जी ने भी जब देखा कि अंग्रेज़ किसी भी दशा में भारत छोड़ने को तैयार नहीं थे, तो उनका एक एक कदम अनिवार्य ही उनको निष्कर्षों की ओर ले गया जिन पर लोहिया पहुँचे थे. इसके विपरीत, लोहिया ने पाया कि सारे प्रमाणों के बावजूद नेहरू का मन युरोपीय सभ्यता, खास तौर पर इंगलिस्तान के प्रति अपने मोह को छोड़ने लिए तैयार नहीं था. किसी समय के उग्रपंथी नेहरू अब किसी भी प्रकार अंग्रेज़ों से समझौता कर लेना चाहते थे. उन्होंने बराबर इस बात की चेष्ठा की कि कांग्रेस अंग्रेज़ी सरकार से कोई समझौता कर ले. युद्धकाल में अंग्रेज़ी राज के विरुद्ध कोई संघर्ष छेड़ने के नेहरू बिल्कुल विरुद्ध थे.
यह इतिहास का एक व्यंग है कि जो व्यक्ति 1942 के विद्रोह को शुरु करने के पक्ष में नहीं था, विद्रोह का राजनैतिक लाभ सबसे अधिक उसी ने उठाया. 1942 के विद्रोह में युवा राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं का एक विशाल समूह पैदा हो गया था. उन्होंने डाकखाने जलाये थे, रेल पटरियाँ उखाड़ी थीं, तेलीफ़ोन के तार काटे थे. गाँधीजी ने इनकी निन्दा नहीं की, लेकिन गाँधीजी के लिए इनसे एकात्म होना कठिन था. उनकी अहिँसा इसमें बाधक थी. दूसरी ओर गाँधीजी ने जो रचनात्मक कार्यक्रम रखा, उसमें इन उग्रपंथी युवकों की कोई खास दिलचस्पी नहीं थी. ऐसी हालत में श्री नेहरू जब 1945 में रिहा हुए तो जेल से निकलते ही उन्होंने बयान दिया कि अरुणा आसिफ़ अली और उनके साथियों ने जो कुछ किया है, वह व्यर्थ नहीं जायेगा.
यह एक दिलचस्प बात है कि श्री नेहरु ने अरुणा आसिफअली का नाम तो लिया, जो 1942 के पहले राजनीति में सक्रिय ही नहीं थीं, लेकिन अपने पुराने मित्रों, जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया का नहीं, जो उस समय जेल में ही थे. इतना ही नहीं, श्री नेहरु ने शीघ्र बाद ही आज़ाद हिन्द फौज के अफ़सरों की रिहाई के लिए तो बड़ा नाटकीय आन्दोलन चलाया - जबकि पहले उन्होंने कहा था कि सुभाष बोस की फौज अगर भारत में आई तो स्वयं उसके विरुद्ध लड़ेंगे - लेकिन लोहिया और जयप्रकाश की रिहाई के लिए नहीं बोले. अंग्रेजों के साथ समझौता वार्ता शुरु हो गयी और ये दोनों आगरा जेल में ही बन्द रहे.
और 1946 में लोहिया जब रिहा हुए तो श्री नेहरु सरकार में जाने की तैयारी कर रहे थे. इसके बाद तो लोहिया को बार बार यह अनुभव हुआ कि नेहरु को अब जनशक्ति और जन-आंदोलन पर भरोसा नहीं रहा. रिहा होने के दो महीने बाद ही लोहिया फ़िर गोआ में गिरफ्तार हुए तो गाँधी जी उन्हें पूरा समर्थन मिला और श्री नेहरु का चिढ़ भरा विरोध. इसके बाद एक साल तक गाँधीजी राष्ट्र को टूटने से बचाने के लिए नोआखली, कलकत्ता, बिहार और दिल्ली में घूमते हुए जानों की बाजी लगाते रहे. लोहिया ने पहले तो नये संघर्ष की तैयारी के लिए लोगों को आंदोलित करने की चेष्ठा की (गाँधी जी के समर्थन से), फ़िर गाँधी जी के काम के निर्णायक महत्व को समझ कर उन्हीं के साथ लगे रहे, विभाजन के पहले के संकटपूर्ण महीनों में भी, और विभाजन के बाद भी.
पर श्री नेहरु इस बीच सरकार बनाने की सौदेबाज़ी में लगे थे. उस वक्त का एक बड़ा ही दिलचस्प किस्सा मुझे याद है. अंतरिम सरकार जब बनी तो उसमें एक पारसी उद्योगपति श्री सी. एच. भाभा को भी शामिल किया गया था. उन दिनों अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के एक नेहरु समर्थक सदस्य लाहौर में समाजवादियों को बराबर यह समझाने की कोशिश करते रहे कि श्री नेहरु ने अपनी स्वीकृति इस भ्रम में दे दी कि प्रसिद्ध वैज्ञानिक श्री जे. एस. भाभा को लेने की बात है. इस तरह पारसी पूँजीपतियों के साथ श्री नेहरु के सम्बंध भी सुधर गये और बदनामी गई सरदार पटेल के सर. इस तरह के हथकंडे बाद में श्री नेहरु ने जाने कितनी बार अपनाये.
श्री नेहरु के साथ राजनैतिक अलगाव का वक्त लोहिया के लिए बहुत कुछ तो 1946 में ही आ गया था. श्री नेहरु उस समय कांग्रेस अध्यक्ष भी थे. उन्होंने प्रस्ताव रखा कि लोहिया कांग्रेस के महामंत्री का पद स्वीकारें. लम्बी बातचीत में लोहिया ने तीन बातें कहींः "कांग्रेस अध्यक्ष सरकार में शामिल न हो. मंत्री लोग कार्यकारिणी में न लिये जायें. और संगठन को सरकार की सुहानूभूतिपूर्ण आलोचना का अधिकार हो." नेहरु ने पहली बात सिद्धांत के रूप में मानी, लेकिन उसे अपने ऊपर लागू करना स्वीकार नहीं किया. अन्य दोनो बातें उन्होंने अस्वीकार कर दीं. बात टूट गयी.
उन्हीं दिनों लोहिया ने देखा कि सरकार में जाते ही श्री नेहरु को नौकरशाही के अफसरों में बड़े गुण और असाधारण प्रतिभा दिखाई देने लगी थी. उसमें भी विशेष गुण-प्रतिभा समपन्न ब्राह्मण थे, सबसे अधिक कशमीरी ब्राह्मण. मोह भंग की परिणति उस समय हुई जब श्री नेहरु ने सर गिरजाशंकर वाजपेयी को अपना महासचिव नियुक्त किया और उन्हें विदेश विभाग के अन्य मंत्रियों से भी ऊँचा दर्ज़ा दिया. वही गिरिजाशंकर वाजपेयी थे, जिन्होंने जेल में कस्तूरबा की मृत्यू के समय बड़ी बेशर्मी से अमरीका में अंग्रेज़ी सरकार की ओर से प्रचार किया था. कुछ दिनों बाद ही संसद में श्री नेहरु ने श्री वाजपेयी की ऐसी तारीफ़ की, जैसी शायद ही किसी अन्य व्यक्ति की उनके जीवनकाल में की हो. इसके बाद लोहिया और नेहरु एक दूसरे के विरुद्ध खड़े थे.
लेकिन 1946 की स्थिति में एक विचित्र विरोधाभास था. जिस समय लोहिया ने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया था, 1933-34 में, उसके पहले तक राष्ट्रीय आन्दोलन में गाँधी, नेहरु और लोहिया, तीनों की ही पीढ़ियाँ सक्रिय थीं. पुरानी पीढ़ी में लाला लाजपतराय, हकीम अजमल खाँ, श्री मोतीलाल नेहरु और पंडित मदनमोहन मालवीय थे. बीच की पीढ़ी में श्री नेहरु, राजाजी, सरदार पटेल, श्री गोविन्द वल्लभ पंत आदि थे, जिनके हाथ में अब संगठन का नेतृत्व था. लोहिया की अपनी पीढ़ी में वामपक्षी भी थे और दक्षिणपक्षी भी. वामपक्षी युवकों में बौद्धिक प्रतिभा तो थी, लेकिन संगठन की शक्ति नहीं थी. 1942 के विद्रोह के समय गाँधी जी अलावा उनकी पीढ़ी का कोई अन्य नेता सक्रिय नहीं था. मालवीयजी जीवित तो थे लेकिन रोग-शैया पर पड़े थे. बीच की पीढ़ी वाले, संगठन के वास्तविक नेता कुछ करने के पहले ही या केवल प्रतीकात्मक कार्यवाही करने पर गिरफ्तार कर लिए गये. प्रारम्भिक विस्फोट में छात्रों ने प्रमुख भाग लिया और बाद में विद्रोह का नेतृत्व किया, युवक नेताओं की उस पीढ़ी ने, जिसके हाथ में संगठन की शक्ति नहीं थी.
फलस्वरूप 1946-47 में लोहिया की राष्ट्रीय नेता के रूप में प्रतिष्ठा थी. उनकी सभाओं में भीड़ होती थी. उनके बयान अखबारों में छपते थे. (उस समय जयप्रकाश नारायण की सभाओं में और अधिक भीड़ होती थी. उनके बयान और अधिक छपते थे) लेकिन उनके पीछे संगठित शक्ति बहुत कम थी. कांग्रेस के एक अंग के रूप में, समाजवादियों को अपनी शक्ति वास्तविकता से बहुत अधिक लगती थी. कांग्रेस का संगठन दूसरे लोगों ने खड़ा किया था. और हर हाल में, जहाँ समाजवादियों ने उसमें प्रमुख भाग लिया था, जैसे संयुक्त प्रान्त (उत्तर प्रदेश) में, वहाँ का संगठन कांग्रेस का था. गाँव का किसान कांग्रेस का नाम और तिरंगा झंडा ही जानता था. सोशलिस्ट पार्टी के नाम और झंडे से वह परिचित नहीं था.
1947 में देश के विभाजन के समय और उसके बाद, गाँधीजी की हत्या होने तक लोहिया की राजनीति लगभग पूरी तरह गाँधीजी के साथ जुड़ी हुई थी. दूसरे कुछ लोग कांग्रेस से निकलने को आतुर थे और शेखचिल्लियों की तरह ख्याली पुलाव पका रहे थे. वे समझते थे कि गाँधी जी जैसे व्यक्ति के नेतृत्व में, जिस काम को करने में कांग्रेस को कई दशक लगे थे, उसे वह कुछ महीनों में ही कर लेंगे. इसके अलावा अधिकांश समाजवादी नेता इतिहास द्वारा प्रस्तुत अवसरों की परीक्षाओं में कम-ज़्यादा सफल तो हुए थे, लेकिन मूलतः यह सब दूसरे दर्ज़े के नेता थे, जो अपने से बड़े किसी नेता का मुंह देखने के आदि थे. इनमें से किसी में भी इतनी आंतरिक शक्ति न थी कि अकेले नई ज़मीन तोड़ कर रास्ता बनाने की तकलीफ़ उठा सके. लोहिया में यह शक्ति थी. लोहिया ने दो ही नेता माने थे. उनमें से गाँधीजी की मृत्यू हो गई थी. और नेहरु से लोहिया न केवल पूरी तरह निराश हो चुके थे, बल्कि उन्हें विश्वास हो गया था कि नया हिन्दुस्तान बनाने की चेष्टा करने वाले लोग नेहरु की शक्ति से लड़े और ....
(... आलेख के यह हिस्सा पूरा नहीं है)
"... से एकरूप और प्रतिनिधि नहीं बनने देगी, उसका तुम कैसे समर्थन करोगे?" गाँधी कहते जा रहे थे और लोहिया के लिए ऐसा संकोचमय क्षण पहले नहीं आया था. गाँधी का हाथ लोहिया के कन्धे पर था, चाह कर भी भाग न सकते थे. खामोशी से सुनने के सिवा कोई चारा न था. गाँधी ने अन्त में पूछाः "तुम्हें कुछ कहना नहीं है." लोहिया चुप. गाँधी ने फ़िर पूछाः "तुम्हें क्या कुछ भी नहीं कहना है?" लोहिया फ़िर चुप. तब गाँधी बोलेः "अब देखो तुम मुझे बोलने से रोकना चाहते हो क्या?" तब लोहिया का मुंह खुलाः "ऐसा कुछ नहीं. आप जारी रखिये." तब गाँधी ने दूसरा रुख लियाः "मैं केवल तुम्हारे सार्वजनिक जीवन से समबन्धित हूँ, ऐसा मानते हो क्या?" अब लोहिया ने कहाः "मैं ऐसी सीमाएँ नहीं मानता. आकाश के नीचे जो भी चीज़ें हैं, उनके सम्बन्ध में कुछ भी आप को मुझसे कहने की आज़ादी है आप को." यह बहस एकतरफा ही रही. गाँधी 40-45 मिनट तक बोलते रहे. तब लोहिया ने कहाः "मैं आज आपको जवाब नहीं देता, पर जल्दी ही दूँगा."
और दो महीने बाद लोहिया ने सिगरेट पीना छोड़ दिया और जब इसकी खबर गाँधी को दी तो गाँधी केवल मुस्कुरा पड़े थे.
और जब गाँधी की हत्या हुई, तो क्षोभ, चिढ़, उद्वेग से लोहिया के कोलाहलपूर्ण मन में एक हाहाकार रह रह कर उठताः "गांधी ने सारी ज़िन्दगी भर अहिंसा का प्रचार किया, लेकिन उनकी मृत्यू हिंसा से हुई? कैसी विपरीत घटना है. कहीं यह घटना भारत के अधःपतन की शुरुआत तो नहीं?"
और सोचते सोचते लोहिया का चित्त बड़े भयानक क्षोभ से ढक गया था. वह बरबस कह उठेः "क्यों आपने मेरे साथ और हिन्दुस्तान की जनता के साथ ऐसी दगाबाज़ी की? क्यों आप इतनी जल्दी चले गये?" और गांधी से दग़ाबाज़ी का प्रतिशोध लेने के लिए लोहिया ने फ़िर से सिगरेट पीना शुरु कर दिया. यह कितना निष्पाप दर्द है! लेकिन गुरु से प्रतिशोध भी कैसा? दोबारा सिगरेट ज़्यादा दिन नहीं चली.
अब तो दूसरे भी मानने लगे हैं कि गांधी के सूत्रों को एकमात्र लोहिया ने ही जीवित रखा है.
***
इलाहाबाद में ही एक दिन अचानक बैठे बैठे, ठीक ठाक से बातें करते करते लोहिया एकाएक उद्विग्न हो उठे थे. एकांत पा कर मुझसे पूछाः "क्यों, तुम तो पढ़े लिखे आदमी हो न! ज़रा बताओ कि जब बुद्ध और आम्रपाली की भेंट हुई होगी, तो ऐसा क्या हुआ होगा कि आम्रपाली ने सर्वस्व बुद्ध पर निछावर कर दिया और बुद्ध ने भी उसे स्वीकार लिया?"
मैं हतप्रभ! कैसा प्रश्न! कैसा प्रश्नकर्ता! मैं सकुचाया तो बोलेः "नहीं, ऐसी ऐसी बातों को साधारण ढंग से पढ़ कर भूल मत जाया करो. सोचा करो कि इतिहास की इन घटनाओं के पीछे क्या रहता है!"
फ़िर एक दिन पूछाः "विवेकानन्द कन्याकुमारी में किधर मुँह करके बैठे होंगे? स्वदेश भूमि की ओर या समुद्र की ओर?"
ऐसे ही एक क्षण वे चित्रकूट में उस रास्ते वन की ओर कुछ ढूँढ़ने चल पड़े थे, जिधर से राम दक्षिण गये थे.
लोहिया के कुछ भावुक क्षण होते थे - राजनीति से दूर, पर इतिहास के गर्भ में जब वे डूबते थे, तो दूसरे ही लोहिया होते थे.
आज लोहिया नहीं हैं. शिखर पर पहुँचने के पूर्व ही जीवन खण्डित हो गया उनका. और साथ ही खण्डित हो गया विद्रोही जन मानस के निर्माण का प्रक्रिया क्रम भी!
हम जैसे उनके अनुचरों की व्यथा कौन समझे? हम उनके स्नेह से अधिक, उनकी डाँट, झिड़क और खीझ याद आती है. किसमें है इतनी हिम्मत, जो अब हमें फ़िर उस प्यार से झिड़के!
टिप्पणीः ओमप्रकाश दीपक का यह आलेख "लहर" पत्रिका के मार्च-अप्रैल 1968 के अंक में छपा था.
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18 सितंबर 2014
15 अक्टूबर 2012
भारतीय राष्ट्र के पुनर्जागरण का संघर्ष - कुछ समस्याएँ
ओमप्रकाश दीपक, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, 30 जून 1968
हिन्दुस्तान में अध्ययन, विचार, विवेचन और विश्लेषण की जगह बड़ी हद तक फ़िकरेबाज़ी ने ले ली है. मैं जानता हूँ कि यह बात बहुतेरे लोगों के गले नहीं उतरेगी. कुछ लोग तो जवाब में यह भी कह सकते हैं कि मेरा यह वाक्य इस बात का प्रमाण है कि मैं स्वयं भी हीन भावना से पीड़ित हूँ. मैं उलट कर इस आरोप को भी फ़िकरेबाज़ी का एक नमूना कह सकता हूँ. आम तौर पर हमारे यहाँ बहसें इससे आगे नहीं बढ़तीं क्योंकि जो लोग स्थिति को अनुभव करते हैं वे भी आगे जा कर कहीं उँगली नहीं रख पाते कि रोग कहाँ है.
मैं यहाँ कोशिश करूँगा कि कुछ जगहों पर उँगली रखूँ. इसके बाद भी कोई सार्थक बहस चलेगी, इसकी उम्मीद मुझे बहुत ज़्यादा नहीं है. लेकिन इतना ज़रूर है कि और भी काफ़ी लोग हैं, खास कर नौजवान लोग जिन्हें फ़िकरेबाज़ी से सन्तोष नहीं होता. जो विचारों के क्षेत्र में आज की निरर्थक एकरसता और जड़ता को तोड़ना चाहते हैं.
पिछले बीस इक्कीस सालों से भारतीयों का अपना एक स्वतंत्र राज्य है. लेकिन भारत क्या एक राष्ट्र है? इस सवाल का आज तक सामना नहीं किया गया. इस मामले में हमारी स्थिति बड़ी विचित्र है. दुनिया में ऐसे कई राज्य हैं जो एक राष्ट्र नहीं हैं. पश्चिमी जर्मनी-पूर्वी जर्मनी, उत्तर कोरिया-दक्षिण कोरिया, उत्तरी वियतनाम-दक्षिणी वियतनाम, उत्तरी आयर-दक्षिणी आयर. इन सभी मामलों में एक राष्ट्र को दो राज्यों में विभाजित कर दिया गया है. निकट भविष्य में उनके फ़िर से एक होने की आशा भी नहीं, क्योंकि आयर को छोड़ कर, जिसके बँटवारे का आधार धर्म है, अन्य सभी देश अमरीकी-रुसी-चीनी क्षेत्रों में बँटे हैं. वे फ़िर से एक तभी हो सकते हैं जब इनमें से कोई एक या दोनों ही वहाँ से हट जायें. लेकिन राज्य भले ही दो हों, राष्ट्र के एक होने के बारे में कोई बहस नहीं.
दूसरी तरफ कुछ बड़े देश है, जिनमें राज्य तो एक है, लेकिन राष्ट्र कई हैं. अमरीका किस हद तक एक राष्ट्र है या कनाडा किस हद तक एक राष्ट्र है इस पर बहस हो सकती है. लेकिन हवाई द्वीप भी अमरीकी राष्ट्र का अंग है इसे किस आधार पर स्वीकार किया जा सकता है? रूस और चीन का मामला तो बिल्कुल साफ़ है. एक राज्य होने के अलावा और कोई सामान्य तत्व नहीं है, जो इन राज्यों के सारे निवासियों को एक सूत्र में बाँधता हो - न इतिहास, न भूगोल, न संस्कृति, न धर्म, न भाषा, न और कुछ. राज्य की सहायता से अर्थ व्यवस्था और समाज व्यवस्था की एकरूपता के जरिये राज्य के सभी हिस्सों को बाँधने की कोशिश की गयी है.
हमारे यहाँ स्थिति यह है कि आज़ादी से पहले ही राष्ट्रीयता की जो धारणा विकसित हुई थी, उसके आधार भौगोलिक भी थे, एतिहासिक भी, जातीय भी थे और साँस्कृतिक भी, आर्थिक भी थे और राजनीतिक भी. लेकिन 1947 में हिन्दुस्तान का बँटवारा इस ढंग से किया गया कि यह सभी आधार खत्म हो गये. कोई भी सूत्र ऐसा नहीं है जिससे हम कोहिमा, कलकत्ता, अमृतसर, श्रीनगर और तंजौर को बाँध सके, और ढाका, लाहौर और पेशावर को छोड़ा जा सके. भारतीय समाज को जोड़ने वाला एक ही तत्व रह गया - भारतीय राज्य.
इस आधार पर तो केवल एक बेजान और कमजोर राजनीति चलाई सकती थी. यही हुआ भी. भारतीय राजनीति ने चाहा कि राष्ट्रीयता के आधार वही रहें जो आज़ादी के पहले थे लेकिन भौगोलिक सीमा वर्तमान भारतीय राज्य की रहे. अर्थव्यवस्था पर राज्य का प्रभाव इतना अधिक हो गया है कि आर्थिक नीतियों को भी किसी हद तक राज्य की सीमाओं के आधार पर चलाया जा सका. लेकिन कश्मीर के साथ तो पहले ही एकमात्र बर्नहाल दर्रे के ज़रिये सम्पर्क था, 1965 के भारत पाक संघर्ष के बाद शेष भारत के साथ असम का सम्बन्ध भी सिलीगुड़ी के रेलमार्ग से ही रह गया - पूर्वी बंगाल से हो कर गुज़रने वाले महत्वपूर्ण जलमार्ग बन्द हो गये.
कहीं अधिक महत्वपूर्ण बात यह थी कि राष्ट्रीय जीवन का जितना हिस्सा राज्य के प्रत्यक्ष नियंत्रण में नहीं था, उसमें राष्ट्रीयता की धारणा खत्म हो गयी. अकेले भारत का न कोई इतिहास है, न कोई भूगोल, न कोई संसकृति है न कोई साहित्य. यह बड़ी ही दिलचस्प लेकिन उतनी ही दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि सत्तारूढ़ राजनीति ने जो भ्रम फ़ैलाया भारतीय बुद्धिजीवियों ने लगभग निरपवाद उसे आँख मूँद कर स्वीकार कर लिया. कहने को इस समय भारत में पचास के करीब विश्वविद्यालय हैं, हज़ारों कालेज हैं, दर्जनों उच्च शिक्षा और शोधकार्य के संस्थान हैं, लेकिन किसी ने भी इस विसंगति की ओर ध्यान नहीं खींचा कि भारत एक राज्य अवश्य है, किन्तु उसकी राष्ट्रीयता का कोई तार्किक आधार नहीं है. राष्ट्रीयता अगर हो सकती है तो भारत-पाकिस्तान की, पूरे हिन्दुस्तान की एक ही.
स्थिति का एक दूसरा पक्ष भी है. समूचे भारत की राष्ट्रीयता का कोई तार्किक आधार नहीं है, लेकिन उसके अंगों के अलग अलग आँशिक आधार हैं. यह अंग भौगोलिक भी हो सकते हैं, सामाजिक भी. कश्मीर का इतिहास, कश्मीर का भूगोल, तमिल भाषा, तमिल संस्कृति, ब्राह्मण संस्कृति, जाटों का इतिहास, जाट संस्कृति, मगध का इतिहास, मालवा का इतिहास, राजस्थानी संस्कृति, आदि आदि. इन समूहों को अगर नज़दीक से देखें तो हम पायेंगे कि मुख्य रूप से तीन आधार हैं जिन पर बने समूह विषेश रूप से सक्रिय और मुखर हुए हैं - धर्म (हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई, पारसी), भाषा और जाति. असलियत यह है कि इस समय भारत में समूह जीवन के लगभग सभी पक्षों को यह तत्व मिल कर या अलग अलग नियन्त्रित और संचालित करते हैं.
भाषाओं में भी अंग्रेज़ी का मामला दूसरों से अलग है. एक ओर तो अंग्रेज़ी किसी भौगोलिक क्षेत्र विषेश की भाषा नहीं है, सारे देश में ही एक छोटा सा वर्ग है जो थोड़ी बहुत अंग्रेज़ी लिख बोल और समझ लेता है. दूसरी ओर अंग्रेज़ी इस वर्ग को किसी राष्ट्रीय केन्द्र से नहीं जोड़ती, सीधे पश्चिम से जोड़ती है. फ़लस्वरूप एक ऐसी मानसिकता का विकास हुआ है जिसे हम "प्राँतीय अंतरराष्ट्रीयता" कह सकते हैं. यह दिमाग एक तरफ़ तो प्राँतीय है, या और भी संकीर्ण है, और दूसरी तरफ़ अंतरराष्ट्रीय है. लेकिन राष्ट्रीय नहीं है. राष्ट्रीय हो भी कैसे, राष्ट्रीयता की कोई तर्कसंगत धारणा ही नहीं है.
इस सन्दर्भ में यह भी ध्यान रखना चाहिये कि हमारे देश में सारा साहित्य इन्हीं लोगों के द्वारा, इन्हीं लोगों के लिए लिखा जाता है, कम से कम सारा आधुनिक कहा जाने वाला साहित्य. इस लिए आधुनिकता के नाम पर हमारे यहाँ यह प्रांतीय अन्तरराष्ट्रीयता ही फली फूली है. इस अन्तरराष्ट्रीयता के भी कई रूप देखे जा सकते हैं. एक रूप में प्रांतीय होना जनाभिमुख होना है और अन्तरराष्ट्रीय होना आधुनिक होना है, लेकिन राष्ट्रीय होना तो दकियानूसीपन है. ऐसे लोगों के लिए राष्ट्रीयता का वर्तमान मात्र राजकीय आधार बहुत सुविधाजनक है. कुछ ऐसे लोग हैं जो अंग्रेजी ज्ञान के द्वारा इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि दुनिया तो अब एक हो गयी है. राष्ट्र वगैरा की मनुष्य जाति को बाँटने वाली बातें तो निहायत दकियानूसी, पुरानी और भदेस हो गयीं हैं. उनके लिए यह बात इस हद तक तो सच है ही कि इस देश में अंग्रेज़ीदां लोग अकाल में भूख से नहीं मरते. बाकी लोग अंग्रेजी पढ़ लें तो वे भी न मरें. अगर अभी अन्तरिक्ष यात्रा केवल अमरीकी या रूसी ही कर सकते हैं तो क्या फर्क पड़ता है. हर अमरीकी ही कहां चाँद पर चला जा रहा है? और जब इतनी प्रगति हो जायेगी, तब इनमें से भी किसी न किसी को तो मौका मिल ही जायेगा. कुछ लोगों की राय में जमाना ही पश्चिम का है. अगर हमने इतनी बेवकूफी की वहां पैदा न हो कर हिन्दुस्तान में पैदा हो गये, तो अब इतना ही कर सकते हैं कि जहाँ तक हो सके पाश्चात्य बन जायें.
यूँ इस नकली आधुनिक मानसिकता का किस्सा बहुत लम्बा है. मैं पहले ही कह चुका हूँ कि हमारे यहाँ के इतिहासकारों, समाजशास्त्रियों, किसी ने भी अपने कर्तव्य का पालन नहीं किया. करते भी कैसे, सब तो इसी अन्तरराष्ट्रीय वर्ग के हैं. बहरहाल मैं उम्मीद करता हूँ कि कभी कोई आदमी मेहनत करके "आधुनिक भारतीय" नाम के जन्तु का अध्ययन करेगा कि इसका दिमाग कैसे काम करता है.
धर्म, भाषा और जाति को तोड़ने वाले प्रभाव आम तौर पर उतने प्रकट नहीं हैं, सिवाय पूर्व-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण के प्रसंग में, लेकिन उनका असर किसी तरह कम नहीं है. प्रकट रूप में नागा विद्रोह भी है, लचित सैना भी, और उस तरह की घटनाएँ भी, जिनमें कछार की बंगाली स्त्रियों को असमी मेखला पहनने को बाध्य किया गया था. जिस तरह का प्रचार कभी मुस्लिम लीग की तरफ से किया जाता था - मुसलमान तहमत बांधते हैं, पश्चिम की तरफ मुँह करके नमाज पढ़ते हैं, हिन्दू लांग बांधते हैं, पूर्व की ओर मुँह करके पूजा करते हैं - उस तरह का प्रचार अब दक्षिण में भी होने लगा है, कि दक्षिण के लोग लुंगी बांधते हैं, उनका संगीट कर्नाटक संगीत है, आदि, आदि. यों सच यह है कि राष्ट्र का इस तरह बांटना शुरु करें तो फ़िर इसका कोई अन्त नहीं. बीच में कहीं रुकना चाहें तो कुछ समूहों पर अन्याय करके ही रुक सकते हैं - इस्लामी पाकिस्तान ही बंगाली, सिन्धी और पख्तून के लिए जेलखाना बन गया है. बंगाली अधिपत्य की यादें असमिया, बिहारी और उड़िया लोगों में, और तमिल अधिपत्य की यादें तेलगू और कन्नड़ लोगों में अभी बहुत ताजी हैं.
हिन्दी क्षेत्र में भी राजस्थानी-मैथिली वगैरह की आवाज़ें उठने लगी हैं. दूसरी ओर हम देखते हैं कि हिन्दी के प्रवक्ता उर्दू को अलग भाषा मानने को तैयार नहीं, उसे हिन्दी की ही एक शैली का ही दर्ज़ा देते हैं. पर उर्दू साहि्त को हिन्दी साहित्य के एक अँग के रूप में मान्यता देने को तैयार नहीं. यह लिपि का मामला ही नहीं क्योंकि सूफ़ी साहित्य फारसी लिपि में होने पर भी उसे हिन्दी का अँग मान लिया गया है. फ़िर पन्द्रहवीं शताब्दी के बाद को उर्दू साहित्य को हिन्दी में क्यों शामिल नहीं किया जाता? यहां धर्म पर आधारित एक ऐसी कमज़ोरी दिखायी देती है जो राष्ट्रीय आन्दोलन के समय से ही चली आ रही है. हिन्दी और पंजाबी का अलगाव बहुत कुछ राजनीति में हिन्दू-सिख अलगाव का ही प्रतिफलन है.
वर्ग और जाति का प्रभाव जितना अप्रकट है उतना ही गहरा है. यह प्रभाव शायद हिन्दी में अन्य भाषाओं के साहित्य से अधिक है. हिन्दी का औसत लेखक आर्थिक दृष्टि से मध्यवर्गीय और संस्कार की दृष्टि से द्विज है. फलस्वरूप सारे हिन्दी लेखन में जबर्दस्त एकरसता है. कुछ पुरानी मान्यताएँ हैं, जो सारे हिन्दी साहित्य में व्याप्त हैं. यह एक बड़ा कारण है कि हिन्दी का लगभग हर कवि किसी न किसी समय महाकाव्य लिखने की चेष्ठा करता है. "प्रिय प्रवास" से ले कर "लोकायतन" तक इन महाकाव्यों को नज़दीक से देखने पर हम पायेंगे कि उनके पीछे द्विज दृष्टि ही है, भले ही उसे आधुनिकता का आवरण पहना दिया गया हो. द्विज दृष्टि को कुछ इस तरह भारतीय संस्कृति का पर्याय मान लिया गया है कि इनको पढ़ते हुए कोई शंका भी मन में नहीं उठती - पढ़ने वाले भी तो सब द्विज ही होते हैं.
यानि दुहाई चाहे भारतीय संस्कृति की दी जाती हो, चाहे आधुनिक अन्तरराष्ट्रीयता की, दोनो ही सूरतों में मानसिक जड़ता, संकीर्णता, अलगाव, टूट और बँटवारे की प्रवृत्तियाँ ही अभिव्यक्ति पाती हैं. इसके कुछ ऐतिहासिक कारण भी हैं. भारतीय समाज में न जाने कितनी सदियों से दो विरोधी प्रतीत होने वाली, लेकिन परस्पर पूरक प्रवृत्तियों का शिकार रहा है - एक प्रवृत्ति रही है अतिशुद्धता की, जो अंग अशुद्ध हो जाये, उसे काट कर अलग कर दो. दूसरी प्रवृत्ति रही है विदेशी शासक की अन्धी और ऊपरी नकल करने की, चाहे वह शासक मुगल हो या अंग्रेज. दुनिया में शायद और कोई भी राष्ट्र ऐसा नहीं है जो विदेशी हमलावरों द्वारा इतनी बार कुचला और रौंदा गया हो जितना हिन्दुस्तान. हर बार जब देश इस तरह रौंदा गया तब यह दोनो ही प्रवृत्तियाँ काम करती रहीं. फलस्वरूप दो तरह के झूठे संतोष एक साथ हिन्दुस्तानी मन को भुलावा देते रहे हैं. एक ओर अतिशुद्धता और संकीर्णता की प्रवृत्ति यह भ्रम उतपन्न करती है कि कठिन से कठिन परिस्थितयों में भी हमने अपने व्यक्तित्व को बचाये रखा, अपनी संस्कृति को बचाये रखा. दूसरी ओर विदेशी शासक की भाषा-भूषा आदि की नकल यह भ्रम उत्पन्न करती है कि समन्वय के द्वारा पुनर्जागरण हो रहा है, भारत आधुनिक हो रहा है. यह दोनो प्रवृत्तियाँ दोनो मामलों में कुछ अलग अलग भी दिखायी देती हैं, लेकिन आम तौर पर एक ही वर्ग में, एक ही व्यक्ति में दिखायी देती हैं. हर सूरत में, हमारे जड़ बेजान समाज को बदलने का, उसमें जान डालने का काम नहीं होता. मौलिक प्रतिभा का, नये विचारों का, देश काल के अनुकूल नयी संस्थाओं का विकास नहीं होता.
हमारे यहाँ हर चीज़ या तो हजारों साल पुरानी है, या विदेशों से आयातित है.हमारे किसान या मछुआरे या जुलाहे आज भी उसी तरह काम करते हैं जैसे हजार साल पहले उनके पुरखे करते थे. या फ़िर ऐसी मशीने आ गयी हैं जिनके चलते रहने के लिए हम पूरी तरह से विदेशों पर निर्भर हैं. देश में ऐसे कारखाने मुश्किल से दस प्रतिशत होंगे जो बिना विदेशी आयात के चल सकते हों. विचारों के क्षेत्र में, पिछले एक हज़ार साल में हमारे यहाँ कोई मौलिक प्रतिभा नहीं हुई, केवल गाँधी जी के सत्याग्रह के बारे में ही कुछ बहस हो सकती है. मैं खुद राममनोहर लोहिया को भी एक अपवाद मानता हूँ लेकिन इसका फैसला हम इतिहास पर छोड़ सकते हैं. ऊपर मैंने जो कुछ कहा है उसमें इससे कोई फर्क भी नहीं पड़ता.
एक आशाजनक तथ्य यह है कि युवा और नवयुवा बुद्धिजीवियों का ऐसा समूह जरूर पैदा हो गया है जिसे समूची भारतीय स्थिति के खोखलेपन का, उसमें निहित विसंगतियों का अहसास हो गया है. यह बुद्धिजीवी आज मोहभंग की स्थिति में हैं. वे इतना तो समझने लगे हैं कि आधुनिक भारतीय निर्माण न तो विदेशों की ऊपरी नकल से हो सकता है, न शास्त्रों के आधार पर. नये आधारों की खोज भी धीरे धीरे होने लगी है - साहित्य में भी, अर्थशास्त्र और राजनीति में भी. विज्ञान का अध्ययन करने वाले लोगों में भी यह चेतना आने लगी है कि विज्ञान के सामान्य सिद्धांत जिस तरह सार्विक होते हैं, व्यावहारिक विज्ञान उसी तरह स्थानीय परिस्थितियों से प्रभावित होता है.
मगर भारतीय राज्य की शक्ति अभी भी जड़ता और दास भावना के साथ ही है. और इसलिए भारतीय राज्य के और अधिक विघटित होने का खतरा बढ़ता जाता है. मुझे लगता है कि भारतीय राष्ट्र का पुनर्जागरण का संघर्ष अब निर्णायक दौर में पहुँच रहा है. और मुझे यकीन है नयी पीढ़ी न सिर्फ भांटने वाली प्रवृत्तियों को खत्म करके राष्ट्रीयता को फिर से प्रतीष्ठित करेगी, वरन उसमें भी राष्ट्र की मौलिक प्रतिभा जीवन के सभी क्षेत्रों में जागेगी.
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टिप्पणी: ओमप्रकाश दीपक ने यह आलेख १९६८ में साप्ताहिक हिन्दुस्तान पत्रिका के लिए लिखा था. तब भारत की स्वतंत्रता की इक्कीस वर्ष हुए थे और शायद बँटवारे के बाद बचे भारत की राष्ट्रीयता पर प्रश्न करना समझा जा सकता था. लेकिन यह प्रश्न वहीं स्माप्त नहीं हुआ था. इसी विषय पर सुनील खिलनानी या रामचन्दर गुआ जैसे लोगों में पिछले कुछ सालों में भी लिखा है. इस आलेख में उनका यह कहना कि अंग्रेजी बोलने वाले भारतीय सभी विदेश की ओर देखते हैं या फ़िर यह कि भारत में किसी भी क्षेत्र में मौलिक सोच नहीं हुई, जैसी बातों पर अवश्य आज बहस हो सकती है.
यह आलेख आज कितना प्रसंगीय है यह तो पढ़ने वाले ही कह सकते हैं, हाँ स्वंत्रता के बीस साल बाद वे इसके बारे में क्या सोचते थे, यह जानना भी दिलचस्प हो सकता है, यह समझने के लिए कि इसके लिखने के चालिस सालों के बाद क्या बदला है, क्या नहीं बदला! (सुनील दीपक)
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02 जनवरी 2012
बाँझ कलम से (1)
दिल्ली के एक हिन्दी दैनिक में करीब दो महीने पहले अन्दर के सफ़े पर एक छोटी सी खब़र छपी थी. उत्तरप्रदेश के एक गाँव में एक मर्द ने किसी लड़की को छेड़ दिया. "छेड़ने" से पत्र के संवाददाता का क्या तात्पर्य था, नहीं मालूम. ठिठोली करने से ले कर हाथापाई करने तक किसी भी चीज़ को "छेड़ना" कहा जा सकता है. लड़की उस व्यक्ति की जाति की नहीं थी. लड़की की जात बिरादरी के जितने भी लोग गाँव में थे, सारे इकट्ठे हो कर उस व्यक्ति के घर चढ़ आये. घर में कोई बालिग मर्द नहीं था, मुमकिन है कि भीड़ आने की तैयारी सुन कर ही मर्द भाग गये हों. दरवाज़ा तोड़ कर या दीवार लाँघ कर भीड़ के लोग घर में घुस गये. परिवार के अन्य लोगों को एक कोठरी में बन्द कर के भीड़ ने उस व्यक्ति की युवा पत्नी से सामूहिक बलात्कार किया, और फ़िर उसे नंगी सारे गाँव में घुमाया.
आठ दस साल पहले तक ऐसी कोई खब़र पढ़ने के बाद मैं कुछ इन्तज़ार किया करता था. मैं सोचता था कि किसी लेखक पर कहीं कुछ तो प्रतिक्रिया होगी, किसी रूप में तो वह प्रतिक्रिया व्यक्त होगी. अब मैं इन्तज़ार नहीं करता, हिन्दी के लेखक को मैं ज़्यादा अच्छी तरह से जान गया हूँ. लेकिन तकलीफ़ मुझे अब भी उतनी ही होती है जितनी पहले होती थी, बेइन्तहा तकलीफ़ होती है, और अब भी मैं सोचता हूँ कि ऐसा क्यों है कि ये चीज़ें हिन्दी के लेखक को नहीं छूती? और उसके साथ साथ खुद अपनी कलम के बाँझ होने का एहसास मुझे बेतरह सालता है. सफल अभिव्यक्ति की कामना ही शायद मेरी कलम में नहीं है, इसलिए ऐसे कुछ अनुभवों को व्यक्त करने के स्वयं के प्रयासों का ज़िक्र मैं नहीं करूँगा. लेकिन यह सवाल रह जाता है कि गम्भीरतम मानवीय अनुभव भी, अगर वह कुछ खास कोटियों के अनुभव न हों, तो हिन्दी लेखक को नहीं छूते, क्यों?
इस उपर ही की घटना को लें. दुनिया में भारत और पाकिस्तान के अलावा और कोई देश शायद ऐसा नहीं है जहां ऐसी घटना हो सकती हो. लेकिन किसी भी ऐसे देश में, जो समाचारपत्रों से सर्वथा वंचित नहीं है, अगर इससे मिलती जुलती कोई घटना हो जाये, ख़ास तौर पर किसी सभ्य और लोकतांत्रिक देश में, तो सारा समाज एक बार हिल उठे. समाचारपत्रों और पत्रिकाओं में न केवल पूरी पृष्ठभूमि के साथ विस्तृत विवरण प्रकाशित हों, बल्कि समाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, मनोवैज्ञानिक, संस्थात्मक, सभी दृष्टियों से घटना का विश्लेषण हो, शायद मानवीय और सामाजिक आचरण के सम्बन्ध में कुछ मौलिक खोजकार्य भी हो. सर्जनात्मक अभिव्यक्ति को न जाने कितनी प्रत्यक्ष और परोक्ष रीतियों से ऐसी घटना प्रभावत करे, क्योंकि मानवीय सम्बन्धों की नई पुरानी सभी धारणाओं को खंडित करती हुई यह घटना कितने ही ऐसे सवाल खड़े करती है जो बहुत ही तकलीफ़देह हैं. अर्थहीनता की बात आजकल बहुत की जाती है, लेकिन मानवीय सम्बन्धों के अर्थहीन हो जाने की ऐसी मिसाल और कहाँ मिलेगी?
हिन्दुस्तान में, जहाँ ये घटनाएँ संभव हैं और ऐसी बहुत असमान्य नहीं हैं, और मानवीय स्थिति की कुछ गम्भीरतम असंगतियों को व्यक्त करती है, किसी का ध्यान इनकी ओर नहीं जाता. अंग्रेज़ी पत्र पत्रिकाओं की संख्या प्रसार इस देश में सबसे अधिक है, और उनमें यकीनन ऐसी खबरें नहीं छपतीं. अंग्रेज़ी अखबार "सभ्य और शिष्ट" लोगों के सभ्य और शिष्ट अखबार होते हैं, छोटे लोगों की कुत्सित जिन्दगी की कुत्सित घटनाओं में उनकी दिलचस्पी नहीं होती. इन सभ्य और शिष्ट लोगों की यौन कुण्ठाओं और विकृतियों को अखबारों की भी दिलचस्पी इसमें नहीं. हिन्दी के समाचार पत्रों के आदर्श भी यही अंग्रेज़ी के अखबार होते हैं. इसलिए हिन्दी के अखबारों में भी ऐसी खबरें कम ही जगह पाती हैं, अंग्रेज़ी से खबरों के अनुवाद करने के बाद अगर जगह बच गयी तो डाक संस्करण में कहीं कोने अंतरे में चार छः पंक्तियों में खबर आ जाती है.मैंने भी जिस अखबार में यह खबर पढ़ी थी, उसमें वह घटना के काफ़ी दिनों के बाद उस समय छपी थी, जब उससे सम्बन्धित कुछ अभियुक्तों को छोटी अदालत ने सेशन सुपुर्द किया था.
हिन्दी का लेखक, सामाजिक चेतना और आधुनिकता के अपने तमाम मुखौटों के बावज़ूद, निहायत "सभ्य और शिष्ट" प्राणी होता है, और इसलिए वह अंग्रेज़ी अखबार पढ़ता है. जो विचार और धारणाएँ वह अंग्रेज़ी की पुस्तकों से उधार नहीं लेता, उन्हें अंग्रेज़ी के अखबारों से उधार लेता है. और इसलिए अधिकांश हिन्दी लेखकों की नज़र में वह खबर आई ही नहीं होगी. शायद विग्रह के अधिकाँश पाठकों की नज़र में भी न आई हो. और जिनकी नज़र में यह खबर आई, जाहिर है कि उनका भी ध्यान उसने नहीं खींचा. क्यों?
कोई वक्त था जब मैं मानता था कि हिन्दी का मध्यमवर्गीय लेखक, हिन्दी के सभी लेखक मध्यमवर्गीय ही हैं, अपनी छोटी सी नकली दुनिया को ही सारे विश्व का और सारी मानवीय स्थिति का पर्याय मान कर उसी में डूबा रहता है, उसी के बारे में झूठी और नकली चीज़ें लिखता रहता है, और उसी को आधुनिकता कहता मानता है. यह बात सच है. लेकिन सच शायद सिर्फ़ इतना ही नहीं है. हिन्दी के लेखको में आज बहुतेरे ऐसे हैं जो कम से कम दिमागी तौर पर जानते हैं कि जिस दुनिया में वह रहते हैं, बिल्कुल नकली है, और उससे निकलना चाहते हैं. लेकिन निकल नहीं पाते या एक तरह के झूठ से निकल कर दूसरे तरह के झूठ में फँस जाते हैं. ऐसा क्यों है? मैंने दो लेखकों से इस घटना की चर्चा की थी. उनमें से एक यह मानते हैं कि जीवन में सारे सम्बन्ध अर्थहीन हो गये हैं. इसलिए साहित्य को सार्थक बनाने की चेष्ठा पाखंड है. लेकिन जब वह सम्बन्धों के अर्थहीन हो जाने की बात करते हैं तो उसका मतलब क्या है? जाहिर है कि उनका विचार पश्चिम की आधुनिकता सम्बन्धी कुछ किताबी धारणाओं पर आधारित है. अपनी निजी ज़िन्दगी में वे उतने ही "सभ्य और शिष्ट" हैं जितना कोई और. पहनना ओढ़ना, रहन सहन, बातचीत, पारिवारिक जीवन, बच्चों की पढ़ाई और रोज़मर्रा ज़िन्दगी की सारी बातों में वे शहरी मध्यम वर्ग के प्रतिनिधि हैं और दूसरों से ऊँचे रहना और दिखना चाहते हैं. मैंने जब उनसे कहा कि कोई लेखक जो इस घटना को जान कर भी अप्रभावित रह जाता है, आधुनिक नहीं हो सकता, तो उन्होंने इन्कार नहीं किया. लेकिन यह भी ज़ाहिर है कि वे यह नहीं समझ पाये कि अपने दिमाग के किस खाने में इस घटना को रखें. इसमें प्रतिहिँसा है, लेकिन ऐसी प्रतिहिँसा जिसकी व्याख्या किसी मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त के आधार पर नहीं की जा सकती. इसमें सम्पत्ति और परिवार के विरुद्ध अपराध है, इसमें बलात्कार है, लेकिन यौनकुण्डा के कारण नहीं. मान्य नियमों और सिद्धान्तों के उल्लंघन के जितने भी समाज शास्त्रीय या अन्य परिचित कारण हैं, उनमें से किसी के भी आधार पर इस घटना को समझा नहीं जा सकता.
मेरे दूसरे लेखक मित्र का "समाजिकता" पर बड़ा आग्रह रहता है. उन्होंने यह माना कि ऐसी घटना सर्जानत्मक लेखक को प्रभावित ही न करे ऐसा किसी जीवन्त साहित्य में संभव नहीं है. लेकिन मैं समझता हूँ कि उनके सामने भी वही दिक्कत रही होगी, ज़िन्दगी के बारे में समझ का जो दिमागी ढांचा है उसमें इस घटना को कहाँ रखें? कैसे समझे इसको? इसमे न कोई पूँजिपति है न सामन्त, न सेठ न ज़मींदार, न मजदूर न किसान, न कोई राजनेता, न कोई अंधविश्वास.
जो चीज़ समझी नहीं जा सकती, यानि विचार व्यवस्था में जिसे कहीं पर बिठाया नहीं जा सकता, उसके सामने आ जाने पर दो ही विकल्प रहते हैं, या तो उसकी उपेक्षा कर दें या फ़िर उसकी मानवीय पीड़ा को झेलें. इसमे कोई शक नहीं कि इसमे केवल तकलीफ़ ही तकलीफ़ है. ऐसी चीज़ का सामना करने पर आप उसको किसी भी पहलू से लें, सिर्फ़ तकलीफ़ ही होगी, और जितना आप इसका सामना करने की कोशिश करेंगे, उतनी तकलीफ़ बढ़ेगी. उपेक्षा करने के अलावा, तकलीफ़ से बचने के दो ही उपाय हैं, आप उस भीड़ के साथ अपने आप को एकात्म कर लें, और सोचें कि बहुत अच्छा किया उन लोगों ने, या फ़िर बदला लेने की सोचें. यूं दरअसल दोनो में बात एक ही है. क्योंकि बदला लेने का मतलब इतना ही है कि उसी तरह की और भीड़ें हों, जो पहली भीड़ के सदस्यों के घरों पर चढ़ाइयां करें और उनकी युवा पत्नियों को अपना शिकार बनायें.
1946 से 1966 के बीच हमने देखा है कि कभी यह धर्म का रूप ले लेती है, हिन्दू मुसलमान, कभी जाति का, जैसे इस मामले में, कभी भाषा का, बंगला असमियाँ. लेकिन हमेशा, हर मामले में, मुख्य शिकार औरतें होती हैं, गो मामला ज़्यादा भड़क जाने पर लूट मार और कतल भी इसमें शामिल होते हैं.
मुझे अक्सर अचरज होता रहा है कि इन सब को ले कर हिन्दुस्तान में कभी कुछ लिखा क्यों नहीं गया? अब मुझे कभी कभी लगता है कि हम सब उन भीड़ों में शामिल हैं, औरतें भी बड़ी आसानी के साथ अन्य औरतों के साथ बलात्कार करने वाली भीड़ों में शामिल हो जाती हैं. और इसलिए मानवीय स्थिति के रूप में हम इन घटनाओं का सामना नहीं कर सकते. किसी हद तक हम लोग मनुष्य ही नहीं रह गये हैं. लेकिन हम मनुष्य ही नहीं रह गये हैं, इसको स्वीकार करने का साहस कहाँ है? इसलिए हम उन दिमागी ढांचों से चिपके रहते हैं, जिनसे ज़न्दगी को समझने में भले ही ज़्यादा मदद न मिलती हो, लेकिन जो खुद आसानी से समझ आ जाते हैं. सहूलियत इसलिए भी है उन दिमागी ढांचों के लिए हमें खुद कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती, अंग्रेज़ी किताबों की दुकानों पर उन्हें आसानी से खरीदा जा सकता है. बहुत से ढांचे उपलब्ध हैं, अपनी पसंद के मुताबिक उनमे से अर्थहीनता का, सामाजिक चेतना का, प्रगतिवाद का, आध्यात्मिकता का, या और भी कोई खरीदा जा सकता है. अब यह ढांचे किसी हद तक हिन्दी अनुवादों में भी मिलने लगे हैं, गो अभी उनमें वह निखार नहीं है जो अंग्रेज़ी में है. और जब इस तरह की कोई चीज़ सामने आ जाती है, तो हम या तो खुद भी चोरी छिपे उस भीड़ में या बदला लेने वाली भीड़ में शामिल हो जाते हैं, या फ़िर उधर से मुँह फ़ेर लेते हैं.
मुंह इसलिए फ़ेर लेते हैं कि ये चीज़ें कुछ ऐसी ही होती हैं जैसे कोई दुःस्वपन यथार्थ बन कर सामने खड़ा हो जाये. जो चीज़ किसी दुस्वपन जैसी ही भयावह, तर्कहीन और संगतिहीन हो, उसका सामना तभी किया जा सकता है जब विचार और यथार्थ की सारी सुरक्षाओं का सहारा छोड़ कर आदमी खड़ा हो जाये, दुःस्वपन के सारे भय और सारी तकलीफ़ों को झेलने के लिए, और तलाश करे कि उस अर्थहीन अमानवता की जड़ें कहाँ हैं. मुमकिन है ऐसा करने पर शुरु में भयावता और तकलीफ़ के अलावा कुछ हाथ न आये, कुछ नज़र न आये. लेकिन मैं विश्वास की सीमा तक उम्मीद करता हूँ कि जो अकेला, नर्भय हो कर इस भयावता और दर्ड का सामना करने और उसे सहने का साहस करेगा, वह इस अर्थहीनता में से नये मानवीय सम्बन्धों को तलाश करने में भी किसी न किसी हद तक कामयाब होगा.
जब तक ऐसा नहीं है हिन्दी लेखक की कलम बाँझ है, बाँझ ही रहेगी, अपनी तसल्ली के लिए हम भले ही विलायती मोम के बबुओं को हिन्दुस्तानी कपड़े पहना कर, जिनकी काट भी अक्सर विलायती होती है, खुश हो लें. यह उम्मीद मेरे मन में बनी हुई है, और मैं चाहता हूँ कि बनी रहे, कि किसी औरत का बेटा या बेटी, किसी दिन भीड़ में शामिल होने से इन्कार ही नहीं करेगा, बल्कि उस भीड़ के सामने खड़ा हो कर उनसे आँखें मिलायेगा, और उस औरत से भी आँख मिलायेगा, और उनसे भी पूछेगा, अपने आप से भी, क्यों? क्यों?
यूं बात उस औरत की नहीं है जो सामूहिक बलात्कार के बाद गाँव में नंगी घुमाई जाती है. विचार और यथार्थ की हमारी व्यवस्थाओं की, अर्थहीन अमानवीयता और भी कितने रूपों में सामने आती है, और किसी का भी सामना करने की हिम्मत हम बटोर नहीं पाते. इसलिए नहीं कर पाते कि उस अर्थहीनता और अमानवीयता में हमारी निजी और तात्कालिक सुरक्षा है, गो सबकी और दीर्घकालीन सुरक्षा नहीं. इसलिए नहीं कर पाते कि फ़िर हमें उस अमानवीयता का सामना करना पड़ेगा जो हम सब के अन्दर है.
मैंने कल के ही अखबार में दो खबरें एक के बाद एक पढ़ी थीं. दिल्ली में पटरियों पर सोने वाले दो व्यक्ति ठंड से अकड़ कर मर गये. गुलाब के प्रेमी दिल्ली की ठंड से बहुत खुश हैं, क्योंकि ठंड ज़्यादा होने पर कली को खीलने में ज़्यादा समय लगता है, जिससे फ़ूल ज़्यादा बड़ा और खूबसूरत होता है.
मुझे फ़ूलों से प्यार है. मेरे छोटे से घर में कच्ची ज़मीन नहीं है, लेकिन मैंने चार पाँच गमले रख छोड़े हैं. और मोतिया की बेल जिस दिन बढ़ कर छत पर चढ़ गयी थी, उस दिम मुझे कुछ वैसी ही खुशी हुई थी, जैसी पिछले दिनों अपने बेटे के स्वास्थ्य सम्बन्धी उसके स्कूल से आई रपट पढ़ कर, कि वह चार फीट साढ़े आठ इंच लम्बा हो गया है. जहाँ मैं दिन भर बैठ कर काम करता हूँ, वहाँ हाते में गुलाब की कई क्यारियाँ हैं, और उसमें बड़े ही खूबसूरत भूल आये हैं. लेकिन आज मैं उन फ़ूलों की तरफ़ देखने की हिम्मत नहीं कर पा रहा हूँ. मैं जानता हूँ कि गुलाब की खुशबू मेरे लिए वापस लौट आयेगी. कुछ बदलेगा नहीं, फ़िर भी लौट आयेगी, क्योंकि यथार्थ चाहे कितना भी अमानवीय हो, उससे अपने को पूरी तरह काट लेने की ताकत मुझ में नहीं है.
और मैं यह भी जानता हूँ कि मेरी कलम तो बाँझ है. बाँझ तो हम सबकी कलम है. फर्क शायद इतना है कि कुछ लोग जानते हैं, कुछ लोग नहीं जानते. लेकिन यह जानना अपनेआप में कितनी भयंकर यातना है.
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टिप्पणी
ओमप्रकाश दीपक ने यह लेख 1966 में लिखा था और "विग्रह" नाम की पत्रिका में छपा था. तब हम लोग दिल्ली में रामजस रोड पर रहते थे और वह 7 रकाबगँज रोड पर डा. राम मनोहर लोहिया के घर पर "जन" के दफ़तर में काम करते थे.
उनका यह लिखना कि इस घटना को समझने के लिए कोई वैचारिक श्रेणी नहीं थी, कुछ अजीब सा लगता है, क्या उस समय नारीवादी फैमिनिस्ट विमर्ष नहीं था?
उनका यह लिखना कि इसे समझने के लिए भयावह यथार्थ का समाना करना पड़ेगा, भी मुझे कुछ समझ नहीं आया. दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व की संस्कृति में परिवार की स्त्रियों की "इज़्ज़त" यानि यौनिक अस्मिता को सर्वोपरि माना जाता है, इसलिए भारत पाकिस्तान आदि में सभी गालियों में परिवार की स्त्रियों से सम्भोग या बलात्कार की धमकी दी जाती है और बदला लेने के लिए यही काम किये जाते हैं. इस बात की जड़े कहाँ छुपी हैं, क्यों और कैसे बनी, आदि की वैचारिक या दार्शनिक समझ आ भी जाये तो उससे क्या होगा?
क्या बदलेगा? "पटरियों पर सोने वाले दो व्यक्ति ठँड से अकड़ कर मर गये", शायद इसी बात से वह मानसिक यात्रा शुरु हुई थी जो 1968 के उनके उपन्यास "कुछ ज़िन्दगियाँ बेमतलब" में निकलीं?
मुझे उनका हिन्दी और अंग्रेज़ी लेखन और पत्रिकाओं का दो हिस्सों में बाँटना, जहाँ अंग्रेज़ी समाचार पत्रिकाएँ पर केवल मध्यवर्गीय सोच और सतहीपन के आरोप लगाये हैं, भी आज बदला हुआ लगता है. बहुत सी हिन्दी और अंग्रेज़ी के समाचार पत्र और पत्रिकाएँ ऐसी हैं, पर दोनो भाषाओं में जिलों कस्बों नमें बसने वाले भारत की बात भी होती है. यही बात चिट्ठों और इंटरनेट भी लागू होती है.
क्या इस लेख के लिखे जाने के बाद के चालीस साल बाद यह स्थिति बदली है? मेरे विचार में ऐसी घटनाएँ तो आज भी होती रहती हैं लेकिन इसके बारे में बहस विमर्श भी होता है. सन 2000 में अरुण चढ़्ढ़ा ने इसी तरह की एक घटना पर डाकूमैंटरी फ़िल्म बनायी थी, "द शेम इज़ नाट माइन" (शर्म मेरी नहीं) जिसे भारत सरकार का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था.
उनके विचारों और सोच के विलायतीपन होने के आरोप के बारे में मुझे लोगों के विचार जानना अच्छा लगेगा.
सुनील दीपक, 2 जनवरी 2012
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आठ दस साल पहले तक ऐसी कोई खब़र पढ़ने के बाद मैं कुछ इन्तज़ार किया करता था. मैं सोचता था कि किसी लेखक पर कहीं कुछ तो प्रतिक्रिया होगी, किसी रूप में तो वह प्रतिक्रिया व्यक्त होगी. अब मैं इन्तज़ार नहीं करता, हिन्दी के लेखक को मैं ज़्यादा अच्छी तरह से जान गया हूँ. लेकिन तकलीफ़ मुझे अब भी उतनी ही होती है जितनी पहले होती थी, बेइन्तहा तकलीफ़ होती है, और अब भी मैं सोचता हूँ कि ऐसा क्यों है कि ये चीज़ें हिन्दी के लेखक को नहीं छूती? और उसके साथ साथ खुद अपनी कलम के बाँझ होने का एहसास मुझे बेतरह सालता है. सफल अभिव्यक्ति की कामना ही शायद मेरी कलम में नहीं है, इसलिए ऐसे कुछ अनुभवों को व्यक्त करने के स्वयं के प्रयासों का ज़िक्र मैं नहीं करूँगा. लेकिन यह सवाल रह जाता है कि गम्भीरतम मानवीय अनुभव भी, अगर वह कुछ खास कोटियों के अनुभव न हों, तो हिन्दी लेखक को नहीं छूते, क्यों?
इस उपर ही की घटना को लें. दुनिया में भारत और पाकिस्तान के अलावा और कोई देश शायद ऐसा नहीं है जहां ऐसी घटना हो सकती हो. लेकिन किसी भी ऐसे देश में, जो समाचारपत्रों से सर्वथा वंचित नहीं है, अगर इससे मिलती जुलती कोई घटना हो जाये, ख़ास तौर पर किसी सभ्य और लोकतांत्रिक देश में, तो सारा समाज एक बार हिल उठे. समाचारपत्रों और पत्रिकाओं में न केवल पूरी पृष्ठभूमि के साथ विस्तृत विवरण प्रकाशित हों, बल्कि समाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, मनोवैज्ञानिक, संस्थात्मक, सभी दृष्टियों से घटना का विश्लेषण हो, शायद मानवीय और सामाजिक आचरण के सम्बन्ध में कुछ मौलिक खोजकार्य भी हो. सर्जनात्मक अभिव्यक्ति को न जाने कितनी प्रत्यक्ष और परोक्ष रीतियों से ऐसी घटना प्रभावत करे, क्योंकि मानवीय सम्बन्धों की नई पुरानी सभी धारणाओं को खंडित करती हुई यह घटना कितने ही ऐसे सवाल खड़े करती है जो बहुत ही तकलीफ़देह हैं. अर्थहीनता की बात आजकल बहुत की जाती है, लेकिन मानवीय सम्बन्धों के अर्थहीन हो जाने की ऐसी मिसाल और कहाँ मिलेगी?
हिन्दुस्तान में, जहाँ ये घटनाएँ संभव हैं और ऐसी बहुत असमान्य नहीं हैं, और मानवीय स्थिति की कुछ गम्भीरतम असंगतियों को व्यक्त करती है, किसी का ध्यान इनकी ओर नहीं जाता. अंग्रेज़ी पत्र पत्रिकाओं की संख्या प्रसार इस देश में सबसे अधिक है, और उनमें यकीनन ऐसी खबरें नहीं छपतीं. अंग्रेज़ी अखबार "सभ्य और शिष्ट" लोगों के सभ्य और शिष्ट अखबार होते हैं, छोटे लोगों की कुत्सित जिन्दगी की कुत्सित घटनाओं में उनकी दिलचस्पी नहीं होती. इन सभ्य और शिष्ट लोगों की यौन कुण्ठाओं और विकृतियों को अखबारों की भी दिलचस्पी इसमें नहीं. हिन्दी के समाचार पत्रों के आदर्श भी यही अंग्रेज़ी के अखबार होते हैं. इसलिए हिन्दी के अखबारों में भी ऐसी खबरें कम ही जगह पाती हैं, अंग्रेज़ी से खबरों के अनुवाद करने के बाद अगर जगह बच गयी तो डाक संस्करण में कहीं कोने अंतरे में चार छः पंक्तियों में खबर आ जाती है.मैंने भी जिस अखबार में यह खबर पढ़ी थी, उसमें वह घटना के काफ़ी दिनों के बाद उस समय छपी थी, जब उससे सम्बन्धित कुछ अभियुक्तों को छोटी अदालत ने सेशन सुपुर्द किया था.
हिन्दी का लेखक, सामाजिक चेतना और आधुनिकता के अपने तमाम मुखौटों के बावज़ूद, निहायत "सभ्य और शिष्ट" प्राणी होता है, और इसलिए वह अंग्रेज़ी अखबार पढ़ता है. जो विचार और धारणाएँ वह अंग्रेज़ी की पुस्तकों से उधार नहीं लेता, उन्हें अंग्रेज़ी के अखबारों से उधार लेता है. और इसलिए अधिकांश हिन्दी लेखकों की नज़र में वह खबर आई ही नहीं होगी. शायद विग्रह के अधिकाँश पाठकों की नज़र में भी न आई हो. और जिनकी नज़र में यह खबर आई, जाहिर है कि उनका भी ध्यान उसने नहीं खींचा. क्यों?
कोई वक्त था जब मैं मानता था कि हिन्दी का मध्यमवर्गीय लेखक, हिन्दी के सभी लेखक मध्यमवर्गीय ही हैं, अपनी छोटी सी नकली दुनिया को ही सारे विश्व का और सारी मानवीय स्थिति का पर्याय मान कर उसी में डूबा रहता है, उसी के बारे में झूठी और नकली चीज़ें लिखता रहता है, और उसी को आधुनिकता कहता मानता है. यह बात सच है. लेकिन सच शायद सिर्फ़ इतना ही नहीं है. हिन्दी के लेखको में आज बहुतेरे ऐसे हैं जो कम से कम दिमागी तौर पर जानते हैं कि जिस दुनिया में वह रहते हैं, बिल्कुल नकली है, और उससे निकलना चाहते हैं. लेकिन निकल नहीं पाते या एक तरह के झूठ से निकल कर दूसरे तरह के झूठ में फँस जाते हैं. ऐसा क्यों है? मैंने दो लेखकों से इस घटना की चर्चा की थी. उनमें से एक यह मानते हैं कि जीवन में सारे सम्बन्ध अर्थहीन हो गये हैं. इसलिए साहित्य को सार्थक बनाने की चेष्ठा पाखंड है. लेकिन जब वह सम्बन्धों के अर्थहीन हो जाने की बात करते हैं तो उसका मतलब क्या है? जाहिर है कि उनका विचार पश्चिम की आधुनिकता सम्बन्धी कुछ किताबी धारणाओं पर आधारित है. अपनी निजी ज़िन्दगी में वे उतने ही "सभ्य और शिष्ट" हैं जितना कोई और. पहनना ओढ़ना, रहन सहन, बातचीत, पारिवारिक जीवन, बच्चों की पढ़ाई और रोज़मर्रा ज़िन्दगी की सारी बातों में वे शहरी मध्यम वर्ग के प्रतिनिधि हैं और दूसरों से ऊँचे रहना और दिखना चाहते हैं. मैंने जब उनसे कहा कि कोई लेखक जो इस घटना को जान कर भी अप्रभावित रह जाता है, आधुनिक नहीं हो सकता, तो उन्होंने इन्कार नहीं किया. लेकिन यह भी ज़ाहिर है कि वे यह नहीं समझ पाये कि अपने दिमाग के किस खाने में इस घटना को रखें. इसमें प्रतिहिँसा है, लेकिन ऐसी प्रतिहिँसा जिसकी व्याख्या किसी मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त के आधार पर नहीं की जा सकती. इसमें सम्पत्ति और परिवार के विरुद्ध अपराध है, इसमें बलात्कार है, लेकिन यौनकुण्डा के कारण नहीं. मान्य नियमों और सिद्धान्तों के उल्लंघन के जितने भी समाज शास्त्रीय या अन्य परिचित कारण हैं, उनमें से किसी के भी आधार पर इस घटना को समझा नहीं जा सकता.
मेरे दूसरे लेखक मित्र का "समाजिकता" पर बड़ा आग्रह रहता है. उन्होंने यह माना कि ऐसी घटना सर्जानत्मक लेखक को प्रभावित ही न करे ऐसा किसी जीवन्त साहित्य में संभव नहीं है. लेकिन मैं समझता हूँ कि उनके सामने भी वही दिक्कत रही होगी, ज़िन्दगी के बारे में समझ का जो दिमागी ढांचा है उसमें इस घटना को कहाँ रखें? कैसे समझे इसको? इसमे न कोई पूँजिपति है न सामन्त, न सेठ न ज़मींदार, न मजदूर न किसान, न कोई राजनेता, न कोई अंधविश्वास.
जो चीज़ समझी नहीं जा सकती, यानि विचार व्यवस्था में जिसे कहीं पर बिठाया नहीं जा सकता, उसके सामने आ जाने पर दो ही विकल्प रहते हैं, या तो उसकी उपेक्षा कर दें या फ़िर उसकी मानवीय पीड़ा को झेलें. इसमे कोई शक नहीं कि इसमे केवल तकलीफ़ ही तकलीफ़ है. ऐसी चीज़ का सामना करने पर आप उसको किसी भी पहलू से लें, सिर्फ़ तकलीफ़ ही होगी, और जितना आप इसका सामना करने की कोशिश करेंगे, उतनी तकलीफ़ बढ़ेगी. उपेक्षा करने के अलावा, तकलीफ़ से बचने के दो ही उपाय हैं, आप उस भीड़ के साथ अपने आप को एकात्म कर लें, और सोचें कि बहुत अच्छा किया उन लोगों ने, या फ़िर बदला लेने की सोचें. यूं दरअसल दोनो में बात एक ही है. क्योंकि बदला लेने का मतलब इतना ही है कि उसी तरह की और भीड़ें हों, जो पहली भीड़ के सदस्यों के घरों पर चढ़ाइयां करें और उनकी युवा पत्नियों को अपना शिकार बनायें.
1946 से 1966 के बीच हमने देखा है कि कभी यह धर्म का रूप ले लेती है, हिन्दू मुसलमान, कभी जाति का, जैसे इस मामले में, कभी भाषा का, बंगला असमियाँ. लेकिन हमेशा, हर मामले में, मुख्य शिकार औरतें होती हैं, गो मामला ज़्यादा भड़क जाने पर लूट मार और कतल भी इसमें शामिल होते हैं.
मुझे अक्सर अचरज होता रहा है कि इन सब को ले कर हिन्दुस्तान में कभी कुछ लिखा क्यों नहीं गया? अब मुझे कभी कभी लगता है कि हम सब उन भीड़ों में शामिल हैं, औरतें भी बड़ी आसानी के साथ अन्य औरतों के साथ बलात्कार करने वाली भीड़ों में शामिल हो जाती हैं. और इसलिए मानवीय स्थिति के रूप में हम इन घटनाओं का सामना नहीं कर सकते. किसी हद तक हम लोग मनुष्य ही नहीं रह गये हैं. लेकिन हम मनुष्य ही नहीं रह गये हैं, इसको स्वीकार करने का साहस कहाँ है? इसलिए हम उन दिमागी ढांचों से चिपके रहते हैं, जिनसे ज़न्दगी को समझने में भले ही ज़्यादा मदद न मिलती हो, लेकिन जो खुद आसानी से समझ आ जाते हैं. सहूलियत इसलिए भी है उन दिमागी ढांचों के लिए हमें खुद कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती, अंग्रेज़ी किताबों की दुकानों पर उन्हें आसानी से खरीदा जा सकता है. बहुत से ढांचे उपलब्ध हैं, अपनी पसंद के मुताबिक उनमे से अर्थहीनता का, सामाजिक चेतना का, प्रगतिवाद का, आध्यात्मिकता का, या और भी कोई खरीदा जा सकता है. अब यह ढांचे किसी हद तक हिन्दी अनुवादों में भी मिलने लगे हैं, गो अभी उनमें वह निखार नहीं है जो अंग्रेज़ी में है. और जब इस तरह की कोई चीज़ सामने आ जाती है, तो हम या तो खुद भी चोरी छिपे उस भीड़ में या बदला लेने वाली भीड़ में शामिल हो जाते हैं, या फ़िर उधर से मुँह फ़ेर लेते हैं.
मुंह इसलिए फ़ेर लेते हैं कि ये चीज़ें कुछ ऐसी ही होती हैं जैसे कोई दुःस्वपन यथार्थ बन कर सामने खड़ा हो जाये. जो चीज़ किसी दुस्वपन जैसी ही भयावह, तर्कहीन और संगतिहीन हो, उसका सामना तभी किया जा सकता है जब विचार और यथार्थ की सारी सुरक्षाओं का सहारा छोड़ कर आदमी खड़ा हो जाये, दुःस्वपन के सारे भय और सारी तकलीफ़ों को झेलने के लिए, और तलाश करे कि उस अर्थहीन अमानवता की जड़ें कहाँ हैं. मुमकिन है ऐसा करने पर शुरु में भयावता और तकलीफ़ के अलावा कुछ हाथ न आये, कुछ नज़र न आये. लेकिन मैं विश्वास की सीमा तक उम्मीद करता हूँ कि जो अकेला, नर्भय हो कर इस भयावता और दर्ड का सामना करने और उसे सहने का साहस करेगा, वह इस अर्थहीनता में से नये मानवीय सम्बन्धों को तलाश करने में भी किसी न किसी हद तक कामयाब होगा.
जब तक ऐसा नहीं है हिन्दी लेखक की कलम बाँझ है, बाँझ ही रहेगी, अपनी तसल्ली के लिए हम भले ही विलायती मोम के बबुओं को हिन्दुस्तानी कपड़े पहना कर, जिनकी काट भी अक्सर विलायती होती है, खुश हो लें. यह उम्मीद मेरे मन में बनी हुई है, और मैं चाहता हूँ कि बनी रहे, कि किसी औरत का बेटा या बेटी, किसी दिन भीड़ में शामिल होने से इन्कार ही नहीं करेगा, बल्कि उस भीड़ के सामने खड़ा हो कर उनसे आँखें मिलायेगा, और उस औरत से भी आँख मिलायेगा, और उनसे भी पूछेगा, अपने आप से भी, क्यों? क्यों?
यूं बात उस औरत की नहीं है जो सामूहिक बलात्कार के बाद गाँव में नंगी घुमाई जाती है. विचार और यथार्थ की हमारी व्यवस्थाओं की, अर्थहीन अमानवीयता और भी कितने रूपों में सामने आती है, और किसी का भी सामना करने की हिम्मत हम बटोर नहीं पाते. इसलिए नहीं कर पाते कि उस अर्थहीनता और अमानवीयता में हमारी निजी और तात्कालिक सुरक्षा है, गो सबकी और दीर्घकालीन सुरक्षा नहीं. इसलिए नहीं कर पाते कि फ़िर हमें उस अमानवीयता का सामना करना पड़ेगा जो हम सब के अन्दर है.
मैंने कल के ही अखबार में दो खबरें एक के बाद एक पढ़ी थीं. दिल्ली में पटरियों पर सोने वाले दो व्यक्ति ठंड से अकड़ कर मर गये. गुलाब के प्रेमी दिल्ली की ठंड से बहुत खुश हैं, क्योंकि ठंड ज़्यादा होने पर कली को खीलने में ज़्यादा समय लगता है, जिससे फ़ूल ज़्यादा बड़ा और खूबसूरत होता है.
मुझे फ़ूलों से प्यार है. मेरे छोटे से घर में कच्ची ज़मीन नहीं है, लेकिन मैंने चार पाँच गमले रख छोड़े हैं. और मोतिया की बेल जिस दिन बढ़ कर छत पर चढ़ गयी थी, उस दिम मुझे कुछ वैसी ही खुशी हुई थी, जैसी पिछले दिनों अपने बेटे के स्वास्थ्य सम्बन्धी उसके स्कूल से आई रपट पढ़ कर, कि वह चार फीट साढ़े आठ इंच लम्बा हो गया है. जहाँ मैं दिन भर बैठ कर काम करता हूँ, वहाँ हाते में गुलाब की कई क्यारियाँ हैं, और उसमें बड़े ही खूबसूरत भूल आये हैं. लेकिन आज मैं उन फ़ूलों की तरफ़ देखने की हिम्मत नहीं कर पा रहा हूँ. मैं जानता हूँ कि गुलाब की खुशबू मेरे लिए वापस लौट आयेगी. कुछ बदलेगा नहीं, फ़िर भी लौट आयेगी, क्योंकि यथार्थ चाहे कितना भी अमानवीय हो, उससे अपने को पूरी तरह काट लेने की ताकत मुझ में नहीं है.
और मैं यह भी जानता हूँ कि मेरी कलम तो बाँझ है. बाँझ तो हम सबकी कलम है. फर्क शायद इतना है कि कुछ लोग जानते हैं, कुछ लोग नहीं जानते. लेकिन यह जानना अपनेआप में कितनी भयंकर यातना है.
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टिप्पणी
ओमप्रकाश दीपक ने यह लेख 1966 में लिखा था और "विग्रह" नाम की पत्रिका में छपा था. तब हम लोग दिल्ली में रामजस रोड पर रहते थे और वह 7 रकाबगँज रोड पर डा. राम मनोहर लोहिया के घर पर "जन" के दफ़तर में काम करते थे.
उनका यह लिखना कि इस घटना को समझने के लिए कोई वैचारिक श्रेणी नहीं थी, कुछ अजीब सा लगता है, क्या उस समय नारीवादी फैमिनिस्ट विमर्ष नहीं था?
उनका यह लिखना कि इसे समझने के लिए भयावह यथार्थ का समाना करना पड़ेगा, भी मुझे कुछ समझ नहीं आया. दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व की संस्कृति में परिवार की स्त्रियों की "इज़्ज़त" यानि यौनिक अस्मिता को सर्वोपरि माना जाता है, इसलिए भारत पाकिस्तान आदि में सभी गालियों में परिवार की स्त्रियों से सम्भोग या बलात्कार की धमकी दी जाती है और बदला लेने के लिए यही काम किये जाते हैं. इस बात की जड़े कहाँ छुपी हैं, क्यों और कैसे बनी, आदि की वैचारिक या दार्शनिक समझ आ भी जाये तो उससे क्या होगा?
क्या बदलेगा? "पटरियों पर सोने वाले दो व्यक्ति ठँड से अकड़ कर मर गये", शायद इसी बात से वह मानसिक यात्रा शुरु हुई थी जो 1968 के उनके उपन्यास "कुछ ज़िन्दगियाँ बेमतलब" में निकलीं?
मुझे उनका हिन्दी और अंग्रेज़ी लेखन और पत्रिकाओं का दो हिस्सों में बाँटना, जहाँ अंग्रेज़ी समाचार पत्रिकाएँ पर केवल मध्यवर्गीय सोच और सतहीपन के आरोप लगाये हैं, भी आज बदला हुआ लगता है. बहुत सी हिन्दी और अंग्रेज़ी के समाचार पत्र और पत्रिकाएँ ऐसी हैं, पर दोनो भाषाओं में जिलों कस्बों नमें बसने वाले भारत की बात भी होती है. यही बात चिट्ठों और इंटरनेट भी लागू होती है.
क्या इस लेख के लिखे जाने के बाद के चालीस साल बाद यह स्थिति बदली है? मेरे विचार में ऐसी घटनाएँ तो आज भी होती रहती हैं लेकिन इसके बारे में बहस विमर्श भी होता है. सन 2000 में अरुण चढ़्ढ़ा ने इसी तरह की एक घटना पर डाकूमैंटरी फ़िल्म बनायी थी, "द शेम इज़ नाट माइन" (शर्म मेरी नहीं) जिसे भारत सरकार का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था.
उनके विचारों और सोच के विलायतीपन होने के आरोप के बारे में मुझे लोगों के विचार जानना अच्छा लगेगा.
सुनील दीपक, 2 जनवरी 2012
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सभ्यता
01 अगस्त 2011
मैं और मेरा वक्त
टिप्पणी, 2011: ओमप्रकाश दीपक ने यह आलेख 1965 में भारत पाकिस्तान युद्ध से पहले लिखा था, जो शायद उसी वर्ष "क ख ग" नाम की हिन्दी पत्रिका में छपा था. उस बात को अब 45 साल हो चुके हैं. आलेख में बहुत सी बातों के वर्णन हैं जो भारत की स्वतंत्रता से दस बीस साल पहले के समाज के बारे में हैं. उनका पुरुष और नारी वाँछित गुणों के बारे में कहना, अमरीकी नीग्रो तथा भारतीय दलितों के बारे में तुलना, भारत पाकिस्तान को एक राष्ट्र के दो राज्य कहना, आदि बातें कुछ अटपटी सी लगती हैं. समय ने उनकी सोच की कई बातों को गलत साबित किया. अगर वह जीवित रहते तो शायद समय के साथ उनकी सोच बदलती?
पर जहाँ वैचारिक दृष्टि से यह आलेख मुझे तर्क से कम और भावनाओं से अधिक जुड़ा लगता है, भावनात्मक दृष्टि से यह आलेख मुझे बहुत प्रिय है क्योंकि इसमें मुझे उनके बचपन के वह दिन दिखते हैं जिसके बारे में जानकारी नहीं थी. क्या जाने, आज के इलाहाबाद में "गाड़ीवान टोला" नाम की जगह बची है या नहीं? (सुनील दीपक)
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मैं और मेरा वक्त
ओमप्रकाश दीपक
पिछले दिनों मैं जेम्स बाल्डविन की एक किताब पढ़ रहा था, "दि फायर नेक्स्ट टाईम" (अगली बार आग). पढ़ते पढ़ते मेरे मन में कई बार ख्याल आया कि हिन्दुस्तान में वर्ण भेद के बारे में कोई इस तरह क्यों नहीं लिखता. एक बार यह भी ख्याल आया कि मैं खुद लिखूँ. लेकिन ख्याल आया और चला गया. मैं द्विज हूँ. बहुत कोशिश करूँ, तो भी उस तरह नहीं लिख सकता. वह चीज़ झूठी होगी. लेकिन मैं दूसरी तरह से लिख सकता हूँ शायद.
बाल्डविन की पुस्तक पढ़ते समय मन में एक अज़ीब सी जलन उठी थी, बाल्डविन के मन की जलन, जो शब्दों के माध्यम से उसने मुझ तक पहुँचा दी थी. कुछ देर मुझे भ्रम रहा कि वह मेरे अपने मन की जलन है, लेकिन थी नहीं. लिखने बैठा, और मन पीछे को मुड़ा, चलता चला गया उन दिनों को जब इलाहाबाद के गाड़ीवान टोला मुहल्ले में बिजली नहीं आयी थी, और कमीज़ के नीचे धोती बाँधे एक छोटा सा लड़का गलियों में कम ही निकलता था. उसकी विधवा माँ और दो बहनों को बहुत डर था उसके बिगड़ जाने का (और सारे एहतियात के बावजूद वह बिगड़ ही गया). उसके घर की एक बिल्कुल नकली दुनिया थी, जो नाकाम कोशिश करती थी कि उस लड़के के साथ साथ बाहर की दुनिया में जाये, और बाहर की असलियत थी कि हरदम इस दुनिया को चीर कर इसमें घुसी आती थी. लेकिन उसके लिए दोनो ही संसार सच थे - एक में वह रहता था, दूसरे में उसे जाना पड़ता था. (उन दिनों को तीस पैंतीस साल बीत गये हैं और अब एक तीसरी दुनिया भी है, उस लड़के के मन की, और इन तीनों में अब भी मेल नहीं है, शायद कभी नहीं होगा.) और वापस मुड़ कर जाते हुए, अगल बगल देखते हुए, मेरे मन में कोई जलन नहीं उठी, एक बहुत गहरी उदासी मन में घर गई. "अगली बार आग", अग्नि प्रलय, जिसमें कुछ नहीं बचता. पानी कितना भी अधिक हो, उस पर कुछ चीज़ें तैरती रहती हैं, जल में स्वयं भी प्राणी रहते हैं. ठंड कितनी भी अधिक हो, बर्फ़ जब पिघलती है, तो कोंपलें फ़िर फूट निकलती हैं. बर्फ़ जमाती है. पानी गलाता है, सड़ाता है, लेकिन आग जलाती है, झुलसाती है, जिससे एक हद के वाद कोई नहीं बचता, कुछ नहीं बचता. केवल वह चीज़ बचती है जिसे वैज्ञानिकों ने "ब्रह्म धूलि" का नाम दिया है. "अगली बार आग", अग्नि प्रलय.
अगली बार! लेकिन कोई "अगली बार" आती है क्या? मन में एक बहुत, बहुत गहरी उदासी घर कर जाती है - हम सब तो जले हुए, झुलसे हुए लोग हैं. शम्बूक का वध करने की राम को आवश्यकता नहीं थी, शम्बूक की तपस्या ही उसकी मृत्यु थी. उसे जीवन तो तब मिलता जब राम तपस्या करते, शम्बूक बनने के लिए. लेकिन वैसा हुआ नहीं और शिव के हाथों सृष्टि का सबसे बड़ा पाप हुआ - कितना व्यंग है कि अन्यथा जो पाप रहित था, अद्धनारीश्वर था, नर नारी के प्रेम का सर्वोत्तम प्रतीक था, उसी ने प्रेम के देवता को जला कर राख कर दिया.
प्रेम का देवता जल कर राख हो गया, और हमारे झुलसे हुए हृदयों पर प्रेम की वर्षा करने की तपस्याएँ विफल हो गयीं. रति है, प्रेम नहीं है. संयम करो, बुद्ध ने सिखाया, गाँधी ने भी सिखाया. रति में संयम और अनंग, अशरीरी प्रेम. गांधी स्वय मन में शंका लिये हुए ही शहीद हो गये. प्रेम और रति का संयोग, है कोई जो सिखाये. लेकिन झुलसा हुआ मन प्रेम कैसे करे? प्रेम का देवता तो जल कर राख हो गया.
स्त्रियाँ कहीं किसी जगह सब एक जैसी होती हैं. अपनी शत्रु होने में भी एक जैसी होती हैं. और इसलिए एक दूसरे के सामने अपना दुखड़ा रोने में भी एक जैसी होती हैं. लेकिन मैंने अपनी माँ को अपना दुखड़ा किसी के आगे रोते नहीं देखा. अब वह साठ साल की हैं और अब भी सुन्दर हैं! तैरह चौदह साल पहले मेरी शादी में कुछ लोगों ने दीदी को बड़ी बहन समझा था, और माँ को छोटी. पैंतीस साल पहले कैसी रही होंगी? मैं कभी कभी उसे देखता हूँ और सोचता हूँ कि अगर वह डेढ़ सौ साल पहले हुई होती, तो पच्चीस वर्ष की आयु में ज़िन्दा ही जला दी गयी होती. लेकिन अब भी, लेकिन अभी भी वह अपना दुखड़ा नहीं रोती, क्योंकि उसका दुखड़ा तो इतना व्यक्त है, इतना साफ़ दिखाई देता है कि उसका रोना क्या.
दिल्ली के अजमलखाँ पार्क में सारा साल लोग शाम को जमा होते हैं. कथाएँ होती है, भजन कीर्तन और प्रवचन होते हैं. एक जगह कुछ लोग बैठ कर राजनीतिक सामाजिक प्रश्नों की चर्चा भी करते हैं. उस चर्चा में एक दिन मैंने सुना एक सज्जन कह रहे थे कि सती प्रथा इसलिए थी कि स्त्रियाँ पतियों के स्वास्थ्य का ध्यान रखें, ठीक से खीलाएँ पिलायें, कहीं जहर न दे दें. मेरे जी में आया कि पूछूँ फ़िर पत्नी के साथ पति को जलाने की व्यवस्था क्यों न शुरु की जाये ताकि पति लोग अपनी पत्नियों के स्वास्थ्य का ध्यान रखें, उन्हें बेमौत न मारें. और, एक बार मैंने एक पत्र में अपनी पत्नि को लिख दिया कि अगर में आज मर जाईँ तो मुझे ज़रा रंज नहीं होगा. मेरी मंशा थी कि ज़िन्दगी को मैंने भरपूर जिया है. इसलिए जब भी मौत आयेगी मुझे अफ़सोस नहीं होगा. (गो अब कभी कभी लगता है कि पाँव उतने मजबूत नहीं रहे). बहरहाल, पत्नि ने उत्तर दिया, हाँ तुमको क्यों रंज होगा, तुम्हें तो छुट्टी मिल जायेगी, बिलखना तो होगा मेरे बच्चों को. स्वाभीमानी है इसलिए अपनी बात नहीं कही. लेकिन हिन्दुस्तानी औरत की ज़िन्दगी का सबसे बड़ा सच यही है. पति के अमंगल का भर भूत की तरह उसके सर चढ़ा रहता है. और इस भय ने हिन्दुस्तानी औरत को तो भीरू बनाया ही है - गो अब भी समान स्थितियों में, हिन्दुस्तानी औरत शायद हिन्दुस्तानी मर्द से अधिक साहस का परिचय देती है - लेकिन, इससे भी अधिक, उसने सारी कौम को नपुसंक बना दिया है. जिजीवषा का अर्थ हो गया है किसी भी तरह किसी भी हालत में शरीर से चिपके रहना.
मैं जानता हूँ कि लोग राष्ट्रीय आंदोलन का हवाला देंगे. मैंने पन्द्रह साल की उम्र में हथकड़ी पहनी थी, और लगभग बीस साल तक मैं भी दृष्टिभ्रम का शिकार रहा. हिन्दुस्तान का राष्ट्रीय आन्दोलन का काफ़ी हिस्सा केवल एक दृष्टिभ्रम था. हमारे आन्दोलन जब दिखावे से आगे बढ़ते थे तो आत्म पीड़न बन जाते थे. गाँधी जी के बावजूद, हिन्दुस्तान ने अहिँसा को स्वेच्छा से नहीं मजबूरी में स्वीकार किया था. और मुझे अब इसमें और ज़रा भी सन्देह नहीं रह गया है कि मजबूरी की अहिँसा बहुत गन्दी चीज़ होती है. मजबूरी की अहिँसा अगर कायरता नहीं होती तो आत्म पीड़न होती है. और राष्ट्रीय आन्दोलन की परिणती हुई हत्या, लूट, बलात्कार और आगज़नी में, ऐसी जो इतिहास में अभूतपूर्व थी. गाँधी जी के भारतीय राजनीति में प्रवेश करने के तीस वर्ष बाद हिन्दुस्तानी आदमी ने लड़ना नहीं सीखा, सीखा अकेले आदमी की पीठ में छुरा भोंक देना. गाँधी स्वयं खोटा सिक्का हो गये. मजबूरी की अहिँसा वाले राष्ट्रीय आन्दोलन के "चौधरी" ज्यादा अक्लमंद थे. उन्होंने मौके को हाथ से नहीं जाने दिया. डेढ़ सौ साल बाद जुआ उतरा, तो पिछले अठारह सालों से बधिया बैल फ़िर पसरा हुआ जुगाली कर रहा है. कभी कभी ज़ोर से सिर हिला कर झौकारता और निरीह बच्चों को सींग मार कर अपने पुसंत्व का प्रमाण देता रहा है, और जब भी किसी साँड ने आ कर सींग अड़ाये हैं, तो जनखों की तरह गुहार लगाता रहा है, "हाय देखो ये मुझे छेड़ता है." और दुनिया हँसती रही है, क्योंकि बधिया बैल और बधिया कौम की हरकतों पर हँसा ही जा सकता है.
मैं अपनी माँ को देखता हूँ जिसके मन का सबसे बड़ा भय है कि पति की मृत्यु देखने वाली उसकी आँखों को कहीं बेटे की मृत्यु भी न देखनी पड़े. अपनी पत्नी को देखता हूँ, "पति जैसा भी है पति है, उसका सहारा न छूटे." यह भी देखता हूँ कि अपने बेटे को वह किस तरह बाँधे रखना चाहती है, हर खतरे से दूर रखना चाहती है. खीजता हूँ कभी कभी, बहुत खीजता हूँ. लेकिन उनकी कितनी पुरखिनों को ज़िन्दा जला दिया गया होगा, और जलाने वाले उनके बेटे, भाई, बाप और ससुर रहे होंगे. मेरे मन में क्रोध नहीं उठता, जलन नहीं होती, एक बहुत गहरी उदासी घर कर जाती है.
गाड़ीवान टोला की उस गली को कैथाना कहते थे. गली में कैथा का एक पेड़ था और बचपन में मैं कैथाना की व्यत्पत्ति कैथा से हुई समझता था - कायस्थ और कैथाना का सम्बन्ध मुझे बहुत बाद में मालूम हुआ. कायस्थ, बनिये, ब्राह्मण, एक दो परिवार ठाकुरों के, एक नाई और एक कहार, बस. मेरे देखते देखते भी द्विज परिवारों का धन बढ़ा. एक दो परिवारों की हालत अगर कुछ बिगड़ी भी, तो कायस्थ की जगह बनिये ने ले ली. सारी गली में पक्के मकान केवल द्विजों के पास थे (गो कुछ द्विज कच्चे घरों में भी थे), और जब बिजली आई तो उन्ही घरों में, रेडियो आया तो उन्ही घरों में.
कहार का नाम था महादेव, कहारिन का नाम मुझे नहीं मालूम. बरसों तक वह औरत मेरे घर काम करने दिन में दो बार आती रही, और उसका नाम मुझे नहीं मालूम. बहुत ही व्यावहारिक, आती, काम करती, (बल्कि सारा परिवार काम करता, कभी इक्ट्ठे, कभी कई घरों में बँट कर) और चली जाती. उसे खुलते हुए मैंने एक ही बार देखा. घर में कोई शादी थी और लड़कियाँ बिना किसी बाजे के ही बैठ कर गा रही थीं. दबे दबे गले से गाने वाली शहरी द्विज लड़कियाँ. कहारिन आयी, तो काम खतम करके अचानक बोली, "जरा खुल के गाओ." और स्वयं स्टूल खींच कर उस पर ढोलक की थाप देने लगी, "किन्नो लियो रे गोरी, तिहारो रस." "अरे कहारिन तो छिपी रुस्तम है", किसी ने कहा और कहारिन उठ गयी. बस. न उसके पहले कुछ, न बाद में.
उसका एक लड़का था, मेरी ही उम्र का छोटेलाल. माँ बाप से ले कर गली मोहल्ले के सभी लोग उसे "छोटइया" कहते थे. छोटे हर बात में मुझसे तेज था, सिवाय पढ़ायी के. उसके स्कूल जाने की नौबत ही नहीं आयी, परिवार में किसी भी बच्चे के स्कूल जाने की नौबत नहीं आई. दौड़ना, कबड्डी या गेंद बल्ला खेलना, पेड़ पर चढ़ना, कुश्ती लड़ना या तालाब के उस पार पत्थर फैंकना, आसपास का कोई भी लड़का इनमें छोटे का मुकाबला नहीं कर सकता था. सत्रह साल की उम्र में, जब दुनिया के साथ ज़ोर आज़माने के लिए मैंने घर और शहर छोड़ा, तो वह एक मुसलमान युवक रफ़ीक खाँ का नौकर मुसाहब बन गया था. रफ़ीक का बाप काफ़ी सम्पत्ति छोड़ गया था, और रफ़ीक का एक ही काम था, पास पड़ोस की तमाम नौजवान लड़कियों से इश्क लड़ाना. छोटे मुहल्ले के सभी घरों में आता जाता था (कहारिन का लड़का था) और इसलिए इन प्रेम प्रसंगो के लिए उससे अच्छा दूत कोई और नहीं मिल सकता था. रफ़ीक 1947 में पाकिस्तान चला गया. और छोटे?
छोटे कहीं बर्तन माँजता होगा, इसकी कल्पना मैं नहीं कर सकता. लेकिन फ़िर करता क्या होगा? चोरी करता होगा, यह भी मैं नहीं सोच सकता. जेबें काटता हो, यह मुमकिन है, क्योंकि उसके लिए कौशल की ज़रूरत होती है, और शिकार को बेवकूफ़ बनाने का एहसास भी होता है. यह भी संभव है कि रात बिरात किसी अकेले आदमी की साइकल घड़ी आदि छीन लेने वाले किसी गिरोह में शामिल हो गया हो. तब वह शराब नहीं पीता था, लेकिन अब मुमकिन है कि भट्ठी लगा कर शराब बेचता भी हो, पीता भी हो.
हिन्दुस्तान में छोटेलाल जैसे लोगों के सामने विकल्प दो होते हैं - अपने मन को मार कर बड़े घरों के बर्तन माँजे, या फ़िर अपराध करें, असामाजिक या समाज विरोधी बनें, क्योंकि उनकी क्षमता के उपयोग का समाज में कोई मार्ग नहीं है. अमरीकी नीग्रो के पास एक तीसरा विकल्प भी है, आत्म सम्मान की रक्षा करते हुए जीना. लेकिन हिन्दुस्तान के शूद्र के पास ऐसा कोई विकल्प नहीं है - उसने हजारों साल पहले ही समाज में अपनी हीन स्थिति को स्वीकार कर लिया था.
गाड़ीवान टोला में मेरे मकान के पिछवाड़े खुली जगह में एक नीम का पेड़ था, और पेड़ के नीचे एक घरौंदा था - पाँच-छः फुट चौड़ा, पाँच-छः फुट लम्बा. उस घरौंदे में एक परिवार रहता था. मैं जब बहुत छोटा था तो उस परिवार में छः सदस्य थे. "टेकइया" (मैं अनुमान से ही कह सकता हूँ कि उसका नाम टेक चंद होगा) और "गिलहरी" दोनो अन्धे थे. गेल्हर का काका बदलू वहीं बूढ़ा हो कर मरा था, और उसे बाजे-गाजे के साथ ले गए थे. बहुत पहले गेल्हर के भाई भावज भी वहीं रहते थे, पास की खुली ज़मीन पर. भावज का नाम तो खैर मालूम भी क्या होता, भाई का नाम भी मैं भूल गया हूँ. तीस साल तक मैंने उस अन्धे दम्पत्ति को उस घरौंदे में रहते देखा. वक्त ने तीनो के ही चेहरों और शरीर पर जो छाप डाली, उसके अलावा तीस साल तक कोई फर्क नहीं पड़ा. गिलहरी के बच्चे होते रहे, मरते रहे. केवल एक लड़की ही जीवित रही - बड़ी बड़ी रसीली आँखों वाली ललिता. एक बार बचपन में उसकी भावज को एक साफ़ रंगीन साड़ी पहने देखा (जो शायद उसे किसी बड़े घर से मिली थी) मैं उसे पहचान नहीं सका था. उसके कुछ दिन बाद ही उस खुली जगह में उसे साँप डस गया. उसके मर जाने पर उसका पति भी कहीं चला गया. ललिता का ब्याह हो गया और अन्धे पति पत्नि अकेले रह गये.
टेकचंद बहुत ही कम बोलता था, बहुत ही कम. गेल्हर उतनी ही वाचाल थी. औरों को नहीं जानता, मुझे वह चाल से ही पहचान लेती थी. मेरे आश्चर्य प्रकट करने पर हँस कर कहती, "हे ल्यो! का मैं आँधर हौं कि न पहिचानिहौं!" यह उसका प्रिय मज़ाक था. कभी कहीं खुशी का मौका होता तो मगन हो कर गाती, "लायो महाराजा हमें छल करके." यह उसका प्रिय गीत था. कन्ट्रोल को कन्टोर और इन्सपेक्टर को निसपिट्टर कहती थी. सावन के महीने में उसकी नीम पर झूला पड़ता और आसपड़ोस की औरतें इक्ट्ठी हो कर झूलती और सावन गाती. मुझे ऐसा याद पड़ता है कि मैंने उसे हमेशा काली धोती पहने हुए ही देखा. अब सोचता हूँ कि शायद जहाँ से भी उसे धोती मिलती होगी, उसे वह काले रंग का ही लेती होगी, साबुन सज्जी की बचत.
कोई अतीत नहीं, कोई भविष्य नहीं, कोई वर्तमान भी नहीं. मन के अन्दर के न जाने किस कोने से वह अपनी हँसी का बहाव निकालती थी, अब अपने साथ वैसा छल कर पाती होगी क्या?
इतना भी मुझे याद पड़ता है कि उसकी भावज जब जिन्दा थी, तो कभी कभी घर आ कर रोती थी - उसका पति दिन भर जो कमाता था, शाम को ताड़ी पी लेता था, ऊपर कर्ज कर लेता था. रात को घर (!) आकर पीटता था, पैसे छीन लेता था.
और अब भी माँ के पास अक्सर औरतें आती हैं, हरिजन औरतें, शूद्र औरतें, और सबका एक ही किस्सा है, सबका एक ही दुश्मन है - दारू. अपनी सारी ज़िन्दगी में दो ही हरिजन डाक्टरों से मेरी भेंट हुई है. एक होम्योपैथी करते हैं, दूसरे के पास भी कोई डिगरी नहीं है, पुराने किसी नियम अन्तर्गत डाक्टरी करने का, या कम से कम दवाईयाँ बेचने का लायसैंस उन्हें मिला हुआ है. उकी दुकान पर औषधि निर्माताओं की प्रचार सामग्री प्रचुर मात्रा में देखी जा सकती है - रंग बिरंगे फोल्डर, कार्ड, सोख्ते, लेकिन सिर दर्द की भी दवा नहीं मिलती. मरीज आते हैं, डाक्टर को दिखाये बिना ही अन्दर चले जाते हैं, दवा पी कर बाहर आते हैं, पैसे देते हैं और चले जाते हैं. एक बार कुछ परेशान से दिखे, इलाके में नया मजिस्टर आया था, जिसके बारे में प्रसिद्ध था कि वह बड़ा सख्त है. लेकिन दूसरे दिन उनका चेहरा फ़िर खिला हुआ था, थानेदार की मार्फत सारा मामला तय हो गया था.
डाक्टर साहब इलाके के हरिजनों के नेता है, पिछली बार चुनाव भी लड़े थे, काफ़ी वोट मिले थे, लेकिन हार गये, क्योंकि कांग्रेस का उम्मीदवार उनसे पड़ा और ज़्यादा दबदबे वाला चौधरी था. डाक्टर साहब को द्विजों से कोई लगाव नहीं है, वे हरिजनों के पूर्ण हितैषी हैं, लेकिन बस ज़िन्दगी ही ऐसी है.
अमरीकी नीग्रो को शकल से पहचाना जा सकता है. लेकिन इसमें नीग्रो की मुक्ति भी निहित है - उसे "गोरा" बनने की चेष्टा करने का लोभ नहीं होता. वह अपने पुरखों की गुलामी को स्वीकार कर सकता है, अपनी वर्तमान स्थिति के तथ्य को भी स्वीकार कर सकता है, और गोरों से कह सकता है कि हमें अपने को नहीं सुधारना, तुम्हें अपने को शिक्षित करना है, तुम्हें नैतिक बनना है! सवाल यह नहीं है कि तुम हमें स्वीकार करो, सवाल यह है कि हम नीग्रो लोग तुम्हें स्वीकार करें.
लेकिन हिन्दुस्तानी शूद्र के साथ ऐसा नहीं है. गोरे लोग समाज में नीग्रो को जो स्थान देना चाहते हें या देते हैं, उसे वह स्वीकार नहीं करता. पिछले दिनों मुझे यह जान कर निजि क्षति का अनुभव हुआ कि अमरीकी नीग्रो लेखिका लोरायन हैंन्सबरी की कैंसर से मृत्यु हो गयी. कई वर्ष पहले मैंने उनका एक वाक्य पढ़ा था, जिसे मैं पहले भी एकाध बार उद्धृत कर चुका हूँ, और यहाँ फ़िर करना चाहता हूँ: "यह सच है कि साहित्य मात्र का उद्देश्य मानव जाति में समाहित होना है, लेकिन इससे पहले ज़रूरी है कि दुनिया के दबे हुए लोग अपने को पहचानें."
यह पहचान ही ऐसा काम है, जो भारतीय शूद्र के लिए लगभग असंभव जैसा कठिन है. हज़ारों साल पहले ही उसने द्विजों द्वारा समाज में अपने लिए निर्धारित स्थान को स्वीकार कर लिया था. भरी दोपहरिया में मेरी जमादारनी प्यासी रह गई, लेकिन उसने अपने हाथ से मेरे गिलास में पानी ले कर पीना स्वीकार नहीं किया. वह अब भी जमादारनी है, जिसका काम है पाख़ाने साफ़ करना, और कूड़ा उठाना. अस्पृश्यता निवारण़ कानून! उसको विरासत में यह ज़िम्मेदारी मिली है कि दूसरों की गन्दगी साफ़ करे. उसके बाद यही काम उसके बेटे बेटियों बहुओं को मिलेगा और उसके बाद उनके बेटे बेटियों बहुओं को. इस सिलसिले के चलते हुए क्या अस्पृश्यता निवारण कानून जैसे हज़ार कानूनों का भी कोई मतलब हो सकता है?
लेकिन सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि हिन्दुस्तान का शूद्र सिर उठा कर यह नहीं कह सकता कि हाँ मैं शूद्र हूँ, और तुमसे किसी तरह भी कम नहीं हूँ, किसी तरह छोटा नहीं हूँ. वह अपनी स्थिति को बदलना भी चाहता है तो द्विज बनने की चेष्टा करता है. द्विज वह बन नहीं सकता, इसलिए अन्ततः आत्म सम्मान भी प्राप्त नहीं कर सकता. मन ही मन उसके अन्दर जलन और हीन भावना बनी रहती है, बढ़ती जाती है. मुझे एक मित्र ने बताया जो शूद्र हैं, और साम्यवादी नहीं हैं कि चीनी आक्रमण के समय बहुसंख्यक शूद्र मन ही मन खुश हुए थे कि चलो अच्छा है द्विजों की सत्ता समाप्त होगी. लेकिन, इस बात के अलावा कि आज के चीनी आक्रमण और दो सदी पहले के अंग्रेज़ी आक्रमण में कोई विषेश अंतर नहीं है, और अगर दुर्भाग्यवश हिन्दुस्तान फ़िर कभी गुलाम हुआ, तो नये शासक द्विजों के माध्यम से ही शासन करेंगे, यह तथ्य उससे भी बड़ा है कि शूद्रों में देश द्रोह की भी क्षमता नहीं है, देश द्रोह भी द्विज ही करते हैं. हिन्दुस्तान का शूद्र तो बिल्कुल ही झुलस गया है, स्वतंत्र रूप से कोई भी काम करने की क्षमता उसमें नहीं है.
इन्हीं मित्र ने पिछले दिनों एक खंड काव्य लिखा. कोई ऐसी असाधारण रचना नहीं फिर भी ऐसी रचनाएँ द्विज लेखक लिखते रहते हैं, और वे छपती रहती हैं. लेकिन मेरे इन मित्र की कविता कहीं नहीं छप रही.
मेरी नज़र में इससे भी बड़ा एक सवाल और है. कविता के कुछ अंश उन्होंने मुझे सुनाये. मैंने जब सीधा सवाल किया कि आप का जो प्रत्यक्ष अनुभव है, जो कुछ आप ने भोगा है, उसे ले कर आप ने कभी कुछ लिखा है, तो उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया. नहीं लिखा, क्योंकि शूद्र होने का जो अर्थ है, उसे शारिरिक तौर पर स्वीकार और नैतिक स्तर पर अस्वीकार करने के बजाय, वे मूलतः उसे नैतिक स्तर पर स्वीकार और शारीरिक स्तर पर अस्वीकार करने की चेष्टा करते हैं.
जले हुए, झुलसे हुए लोग, बिगड़ती हुई नस्ल. लेकिन दिल्ली में युगोस्लाविया के एक भूतपूर्व राजदूत ने, जो कला मर्मज्ञ भी हैं, कहा कि हिन्दुस्तान में उन्हें किसान मजदूर औरतें दिखायी ही नहीं दीं, हर हिन्दुस्तानी औरत की चाल रानियों जैसी होती है. आग में झुलसे हुए लोग, तपा हुआ सोना. मुश्किल यह है कि आदमी तो असंख्य धातुओं का बना है. जब वह स्वयं अपनी शुद्धि करता है, तब भी अक्सर बात बिगड़ जाती है. जब वह शुद्ध किया जाता है, तो हर हालत में अनिवार्य ही, इसका एक ही परिणाम होता है, आदमी का झुलस जाना. संस्कारों में हमेशा ही एक पीड़ा निहित होती है. और पीड़ा सहने की सामर्थ्य आ जाए तो मनुष्य को ऐसी भंगिमा प्रदान करती है जो बड़ी ही गरिमामयी प्रतीत होती है. लेकिन निरपेक्षता और जड़ता का अन्तर बहुधा बड़ा बारीक होता है. निरपेक्ष बनते बनते हिन्दुस्तानी आदमी जड़ हो गया है, ब्रह्मचारी तो नहीं बन सका, नपुंसक बन गया. हज़ारों साल के संस्कारों ने हिन्दुस्तानी औरत को गज़ब की चाल ढाल प्रदान की है, किसी हद तक हिन्दुस्तानी मर्द को भी. लेकिन अन्दर से मर्द औरत दोनों झुलसे हुए हैं, और यह झुलसे हुए मन बिल्कुल सड़ गये हैं.
अतीत और वर्तमान पर नज़र डालता हूँ तो एक गहरी उदासी मन में घर कर जाती है. भविष्य की ओर देखने का साहस एकत्र करने में मन एक बार काँप जाता है. हिन्दुस्तान में जिजिवषा का अर्थ बदल गया है - किसी भी तरह शरीर से चिपके रहो. शरीर रोगी हो, कोढ़ी हो, ज़न्दगी रोगी कोढ़ी हो, खुशी की एक किरण भी न हो, फ़िर भी शरीर से चिपके रहो. बचना फ़िर भी नहीं होता. हर साल लाखों आदमी हैजे से मरते हैं, चेचक से मरते हैं, निरन्तर भूखे या अधपेटे रह कर तिल तिल मरते हैं. लेकिन हैजा और चेचक और भूख को उन्होंने स्वीकार कर लिया है. चेचक निकली है, शारदा माता आयी है. पानी नहीं बरसा, यज्ञ करो. इन्हें ख़तम करने की कोशिश में खतरा है, मौत का खतरा है. हिन्दुस्तानी आदमी पीठ पर छुरा खाता है, पीठ पर छुरा मारता है, छाती पर नहीं. और कहीं कोई संकल्प नहीं है, निष्ठा नहीं है, निर्णय नहीं है. लेकिन उदासी के इस बहुत गहरे दलदल में फँसे हुए भी हार नहीं मानी जा सकती. हार मान लेने पर तो एक ही मार्ग शेष रहता है - आत्महत्या. किन्तु हार न मानने का मतलब होता है जि़न्दगी को एक स्थायी जोखिम में डाल देना. तमाम झूठे सहारों को छोड़ देना, तोड़ देना, चाहे वह इतिहास और परम्परा के हों, चाहे धर्म और नैतिकता के हों, चाहे आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा के हों. हार न मानने का मतलब है जीवन की तमाम असुरक्षाओं को स्वीकार करना, और इन असुरक्षाओं से लड़ते हुए जीवन के अंकुर को उगाना और पोसना. बहुत मुश्किल है, बहुत ही मुश्किल है, क्योंकि हर तरफ़ सुरक्षा का आश्वासन है कि हमारी शरण में आओ. जाति की सुरक्षा, धर्म की सुरक्षा, सामाजिक संगठन की सुरक्षा, राज्य की सुरक्षा, अंधविश्वासों की सुरक्षा. न जाने कितने, कैसे कैसे अंधविश्वास हैं. हमारी शरण में आओ! सुरक्षा नहीं है. कहीं किसी में नहीं है. लेकिन दिल के बहलाने को जन्नत का ख्याल तो अच्छा है ही. और जीवन के साथ जीवन की असुरक्षाओं को स्वीकार करने की तकलीफ़ से आदमी बच जाता है.
पचीस वर्ष की आयु में विधवा हो कर जिस स्त्री ने अपनी संकल्प शक्ति के सहारे ही खुद पढ़ा लिखा, और प्राथमिक पाठशाला में नौकरी करके बच्चों को पाला पढ़ाया, उसी का लड़का जब जीवन के परिचित दायरे से बाहर निकल गया, स्वीकृति मान्यताओं के दायरे से बाहर निकल गया, तो उसकी तर्क बुद्धि ने हार मान ली. अब वह नियमित रूप से मासिक "कल्याण" पढ़ती है, और जीवन के हर सवाल का उसके पास एक ही उत्तर है - जो कुछ करता है, ईश्वर करता है.
लेकिन मैं हार नहीं मान सकता. जिन कठघरों में हम जन्म लेते हैं और पलते हैं, उनसे बाहर निकलने की चेष्टा करने वाले, हार नहीं मान सकते. उनके सामने तो एक ही मार्ग है - इन कठघरों को तोड़ना, ताकि इनसे बाहर निकल कर जीवन की समस्याओं का, जीवन की असुरक्षाओं का सचमुच सामना कर सकें, उन पर विजय पाने का वास्तविक प्रयास कर सकें.
यह लड़ाई जितनी बाहरी शक्तियों से हैं, उतनी ही अपने अन्दर खुद अपने आप से भी है - अपने संस्कारों से, न जाने कितनी ऐसी बातों से, जिन्हें हम मान कर चलते हैं, जिन्हें कसौटी पर कसने का ख्याल नहीं आता, लेकिन जो अन्धविश्वासों पर आधारित हैं, केवल अंधविश्वासों पर, ऐसे अन्धविश्वासों पर, जिन्हें सामाजिक मान्यता मिली हुई है. और यह लड़ाई हर वक्त है, हर जगह है, विचारों भावनाओं में, निजि और सार्वजनिक आचरण में, संगठित और सस्वतः स्फूर्त व्यवहार में, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सम्बन्धों में.
हार हो या जीत, यह लड़ाई तो करनी ही है. हर हालत में लगातार करनी है, क्योंकि यह तो जीवन की स्वीकृति का अनिवार्य परिणाम है. हारना मृत्यु नहीं है, हार मानना मृत्यु है. और इसलिए लड़ना ही है, जो भी हो, लड़ना ही है.
पुनश्चयः पाँच अगस्त और तेईस सितम्बर के बीच युद्ध स्थल में हुई घटनाओं में क्या ऐसा कोई संकेत है जिससे इस लेख में कुछ जोड़ना या घटाना वाँछनीय हो? इस अविधि के कुछ ही पहले यह लेख लिखा गया था, और उसके बाद भी ऐसा कुछ नहीं हो रहा है जो इस लेख की स्थापनाओं को किसी तरह प्रभावित करता हो. लेकिन उस अविधि में, विषेशतः 6 सितम्बर और 23 सितम्बर के बीच के अठारह दिनों में ऐसा लगता था कि इस बूढ़े देश के शरीर में एक बार बिजली दौड़ गई है. हो सकता है दिल्ली में रहने के कारण मुझे विषेशतः ऐसा लगता है, क्योंकि दिल्ली राजधानी होने के अतिरिक्त पंजाब से लगी हुई है, और वस्तुतः सारे देश के लिए यह बात सच न हो, या उतनी सच न हो. ऐसा भी नहीं कि जो कुछ हुआ वह सब अच्छा ही था - बहुत कुछ बुरा भी था. लेकिन इतना भी क्या कम था कि चाहे यह एक प्रकार का गृह युद्ध ही था (दो राज्य होने पर भी राष्ट्र तो एक ही है), फ़िर भी यह लड़ाई साम्प्रदायिक नहीं थी, वरना राष्ट्रीयता और साम्प्रदायिकता के बीच का पुराना विरोध एक नये रूप में फ़िर से उभरा था. दूसरे, यह लड़ाई, पीठ में छुरा भोंकने की नहीं, बराबर या लगभग बराबर के हथियारों से आमने सामने लड़ने की थी. तीसरे स्वतंत्र भारत की पल्टन, अपने ही नौजवान अफसरों के नेतृत्व में पहली बार अच्छी तरह लड़ी. जीत हार का उतना महत्व नहीं, क्योंकि कुल अठारह दिन ही लड़ाई चली, और जीता हारा गया कुल रकबा लगभग उतना ही है जितना दिल्ली नगर निगम का अधिकार क्षेत्र. महत्व की बात है कि सेना अच्छी तरह लड़ी.
इस अंतिम बात को, विषेशतः जीत को बहुत अधिक महत्व दिया जा रहा है, जबकि वास्तविक महत्व इस युद्ध के राजनीतिक कारणों का है - राष्ट्रीयता और साम्प्रदायिकता का संघर्ष. और यह संघर्ष उन तमाम संघर्षों से जुड़ा हुआ है, जिनकी गवाही मैंने इस लेख में देनी चाही है.
क्या इस युद्ध से संकेत मितला है कि लोकवादी, असाम्प्रदायिक, और सामाजिक एकता पर आधारित राष्ट्रीयता की पुनः प्रतीष्ठा पर ही देश का भविष्य निर्भर है? निश्चय ही हाँ. क्या इससे यह भी संकेत मिलता है कि इस कार्य के लिए आवश्यक शक्ति, चेतना और संकल्प देश में मौजूद हैं? इस प्रश्न का उत्तर देना कुछ कठिन है, क्योंकि इतिहास के दिशा संकेतों पर भरोसा करना खतरनाक होता है, अगर उन्हें बल देने वाले संगठित और निरन्तर सक्रिय प्रयास साथ में न हों. फ़िर भी, समस्या अंततः सीधे आत्मरक्षा की है, अपने अस्तित्व को बनाये रखने की है, और जब जान खतरे में हो, तो दुर्बल से दुर्बल प्राणी भी एक बार बहादुर बन जाता है.
भरोसा तो आखिरकार कसी बात का नहीं, सिवाय इसके कि जिन्हें एहसास है, उन्हें हर हालत में लड़ना ही होगा, चाहे लड़ाई बंदूक की हो, चाहे मन की.
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पर जहाँ वैचारिक दृष्टि से यह आलेख मुझे तर्क से कम और भावनाओं से अधिक जुड़ा लगता है, भावनात्मक दृष्टि से यह आलेख मुझे बहुत प्रिय है क्योंकि इसमें मुझे उनके बचपन के वह दिन दिखते हैं जिसके बारे में जानकारी नहीं थी. क्या जाने, आज के इलाहाबाद में "गाड़ीवान टोला" नाम की जगह बची है या नहीं? (सुनील दीपक)
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मैं और मेरा वक्त
ओमप्रकाश दीपक
पिछले दिनों मैं जेम्स बाल्डविन की एक किताब पढ़ रहा था, "दि फायर नेक्स्ट टाईम" (अगली बार आग). पढ़ते पढ़ते मेरे मन में कई बार ख्याल आया कि हिन्दुस्तान में वर्ण भेद के बारे में कोई इस तरह क्यों नहीं लिखता. एक बार यह भी ख्याल आया कि मैं खुद लिखूँ. लेकिन ख्याल आया और चला गया. मैं द्विज हूँ. बहुत कोशिश करूँ, तो भी उस तरह नहीं लिख सकता. वह चीज़ झूठी होगी. लेकिन मैं दूसरी तरह से लिख सकता हूँ शायद.
बाल्डविन की पुस्तक पढ़ते समय मन में एक अज़ीब सी जलन उठी थी, बाल्डविन के मन की जलन, जो शब्दों के माध्यम से उसने मुझ तक पहुँचा दी थी. कुछ देर मुझे भ्रम रहा कि वह मेरे अपने मन की जलन है, लेकिन थी नहीं. लिखने बैठा, और मन पीछे को मुड़ा, चलता चला गया उन दिनों को जब इलाहाबाद के गाड़ीवान टोला मुहल्ले में बिजली नहीं आयी थी, और कमीज़ के नीचे धोती बाँधे एक छोटा सा लड़का गलियों में कम ही निकलता था. उसकी विधवा माँ और दो बहनों को बहुत डर था उसके बिगड़ जाने का (और सारे एहतियात के बावजूद वह बिगड़ ही गया). उसके घर की एक बिल्कुल नकली दुनिया थी, जो नाकाम कोशिश करती थी कि उस लड़के के साथ साथ बाहर की दुनिया में जाये, और बाहर की असलियत थी कि हरदम इस दुनिया को चीर कर इसमें घुसी आती थी. लेकिन उसके लिए दोनो ही संसार सच थे - एक में वह रहता था, दूसरे में उसे जाना पड़ता था. (उन दिनों को तीस पैंतीस साल बीत गये हैं और अब एक तीसरी दुनिया भी है, उस लड़के के मन की, और इन तीनों में अब भी मेल नहीं है, शायद कभी नहीं होगा.) और वापस मुड़ कर जाते हुए, अगल बगल देखते हुए, मेरे मन में कोई जलन नहीं उठी, एक बहुत गहरी उदासी मन में घर गई. "अगली बार आग", अग्नि प्रलय, जिसमें कुछ नहीं बचता. पानी कितना भी अधिक हो, उस पर कुछ चीज़ें तैरती रहती हैं, जल में स्वयं भी प्राणी रहते हैं. ठंड कितनी भी अधिक हो, बर्फ़ जब पिघलती है, तो कोंपलें फ़िर फूट निकलती हैं. बर्फ़ जमाती है. पानी गलाता है, सड़ाता है, लेकिन आग जलाती है, झुलसाती है, जिससे एक हद के वाद कोई नहीं बचता, कुछ नहीं बचता. केवल वह चीज़ बचती है जिसे वैज्ञानिकों ने "ब्रह्म धूलि" का नाम दिया है. "अगली बार आग", अग्नि प्रलय.
अगली बार! लेकिन कोई "अगली बार" आती है क्या? मन में एक बहुत, बहुत गहरी उदासी घर कर जाती है - हम सब तो जले हुए, झुलसे हुए लोग हैं. शम्बूक का वध करने की राम को आवश्यकता नहीं थी, शम्बूक की तपस्या ही उसकी मृत्यु थी. उसे जीवन तो तब मिलता जब राम तपस्या करते, शम्बूक बनने के लिए. लेकिन वैसा हुआ नहीं और शिव के हाथों सृष्टि का सबसे बड़ा पाप हुआ - कितना व्यंग है कि अन्यथा जो पाप रहित था, अद्धनारीश्वर था, नर नारी के प्रेम का सर्वोत्तम प्रतीक था, उसी ने प्रेम के देवता को जला कर राख कर दिया.
प्रेम का देवता जल कर राख हो गया, और हमारे झुलसे हुए हृदयों पर प्रेम की वर्षा करने की तपस्याएँ विफल हो गयीं. रति है, प्रेम नहीं है. संयम करो, बुद्ध ने सिखाया, गाँधी ने भी सिखाया. रति में संयम और अनंग, अशरीरी प्रेम. गांधी स्वय मन में शंका लिये हुए ही शहीद हो गये. प्रेम और रति का संयोग, है कोई जो सिखाये. लेकिन झुलसा हुआ मन प्रेम कैसे करे? प्रेम का देवता तो जल कर राख हो गया.
स्त्रियाँ कहीं किसी जगह सब एक जैसी होती हैं. अपनी शत्रु होने में भी एक जैसी होती हैं. और इसलिए एक दूसरे के सामने अपना दुखड़ा रोने में भी एक जैसी होती हैं. लेकिन मैंने अपनी माँ को अपना दुखड़ा किसी के आगे रोते नहीं देखा. अब वह साठ साल की हैं और अब भी सुन्दर हैं! तैरह चौदह साल पहले मेरी शादी में कुछ लोगों ने दीदी को बड़ी बहन समझा था, और माँ को छोटी. पैंतीस साल पहले कैसी रही होंगी? मैं कभी कभी उसे देखता हूँ और सोचता हूँ कि अगर वह डेढ़ सौ साल पहले हुई होती, तो पच्चीस वर्ष की आयु में ज़िन्दा ही जला दी गयी होती. लेकिन अब भी, लेकिन अभी भी वह अपना दुखड़ा नहीं रोती, क्योंकि उसका दुखड़ा तो इतना व्यक्त है, इतना साफ़ दिखाई देता है कि उसका रोना क्या.
दिल्ली के अजमलखाँ पार्क में सारा साल लोग शाम को जमा होते हैं. कथाएँ होती है, भजन कीर्तन और प्रवचन होते हैं. एक जगह कुछ लोग बैठ कर राजनीतिक सामाजिक प्रश्नों की चर्चा भी करते हैं. उस चर्चा में एक दिन मैंने सुना एक सज्जन कह रहे थे कि सती प्रथा इसलिए थी कि स्त्रियाँ पतियों के स्वास्थ्य का ध्यान रखें, ठीक से खीलाएँ पिलायें, कहीं जहर न दे दें. मेरे जी में आया कि पूछूँ फ़िर पत्नी के साथ पति को जलाने की व्यवस्था क्यों न शुरु की जाये ताकि पति लोग अपनी पत्नियों के स्वास्थ्य का ध्यान रखें, उन्हें बेमौत न मारें. और, एक बार मैंने एक पत्र में अपनी पत्नि को लिख दिया कि अगर में आज मर जाईँ तो मुझे ज़रा रंज नहीं होगा. मेरी मंशा थी कि ज़िन्दगी को मैंने भरपूर जिया है. इसलिए जब भी मौत आयेगी मुझे अफ़सोस नहीं होगा. (गो अब कभी कभी लगता है कि पाँव उतने मजबूत नहीं रहे). बहरहाल, पत्नि ने उत्तर दिया, हाँ तुमको क्यों रंज होगा, तुम्हें तो छुट्टी मिल जायेगी, बिलखना तो होगा मेरे बच्चों को. स्वाभीमानी है इसलिए अपनी बात नहीं कही. लेकिन हिन्दुस्तानी औरत की ज़िन्दगी का सबसे बड़ा सच यही है. पति के अमंगल का भर भूत की तरह उसके सर चढ़ा रहता है. और इस भय ने हिन्दुस्तानी औरत को तो भीरू बनाया ही है - गो अब भी समान स्थितियों में, हिन्दुस्तानी औरत शायद हिन्दुस्तानी मर्द से अधिक साहस का परिचय देती है - लेकिन, इससे भी अधिक, उसने सारी कौम को नपुसंक बना दिया है. जिजीवषा का अर्थ हो गया है किसी भी तरह किसी भी हालत में शरीर से चिपके रहना.
मैं जानता हूँ कि लोग राष्ट्रीय आंदोलन का हवाला देंगे. मैंने पन्द्रह साल की उम्र में हथकड़ी पहनी थी, और लगभग बीस साल तक मैं भी दृष्टिभ्रम का शिकार रहा. हिन्दुस्तान का राष्ट्रीय आन्दोलन का काफ़ी हिस्सा केवल एक दृष्टिभ्रम था. हमारे आन्दोलन जब दिखावे से आगे बढ़ते थे तो आत्म पीड़न बन जाते थे. गाँधी जी के बावजूद, हिन्दुस्तान ने अहिँसा को स्वेच्छा से नहीं मजबूरी में स्वीकार किया था. और मुझे अब इसमें और ज़रा भी सन्देह नहीं रह गया है कि मजबूरी की अहिँसा बहुत गन्दी चीज़ होती है. मजबूरी की अहिँसा अगर कायरता नहीं होती तो आत्म पीड़न होती है. और राष्ट्रीय आन्दोलन की परिणती हुई हत्या, लूट, बलात्कार और आगज़नी में, ऐसी जो इतिहास में अभूतपूर्व थी. गाँधी जी के भारतीय राजनीति में प्रवेश करने के तीस वर्ष बाद हिन्दुस्तानी आदमी ने लड़ना नहीं सीखा, सीखा अकेले आदमी की पीठ में छुरा भोंक देना. गाँधी स्वयं खोटा सिक्का हो गये. मजबूरी की अहिँसा वाले राष्ट्रीय आन्दोलन के "चौधरी" ज्यादा अक्लमंद थे. उन्होंने मौके को हाथ से नहीं जाने दिया. डेढ़ सौ साल बाद जुआ उतरा, तो पिछले अठारह सालों से बधिया बैल फ़िर पसरा हुआ जुगाली कर रहा है. कभी कभी ज़ोर से सिर हिला कर झौकारता और निरीह बच्चों को सींग मार कर अपने पुसंत्व का प्रमाण देता रहा है, और जब भी किसी साँड ने आ कर सींग अड़ाये हैं, तो जनखों की तरह गुहार लगाता रहा है, "हाय देखो ये मुझे छेड़ता है." और दुनिया हँसती रही है, क्योंकि बधिया बैल और बधिया कौम की हरकतों पर हँसा ही जा सकता है.
मैं अपनी माँ को देखता हूँ जिसके मन का सबसे बड़ा भय है कि पति की मृत्यु देखने वाली उसकी आँखों को कहीं बेटे की मृत्यु भी न देखनी पड़े. अपनी पत्नी को देखता हूँ, "पति जैसा भी है पति है, उसका सहारा न छूटे." यह भी देखता हूँ कि अपने बेटे को वह किस तरह बाँधे रखना चाहती है, हर खतरे से दूर रखना चाहती है. खीजता हूँ कभी कभी, बहुत खीजता हूँ. लेकिन उनकी कितनी पुरखिनों को ज़िन्दा जला दिया गया होगा, और जलाने वाले उनके बेटे, भाई, बाप और ससुर रहे होंगे. मेरे मन में क्रोध नहीं उठता, जलन नहीं होती, एक बहुत गहरी उदासी घर कर जाती है.
गाड़ीवान टोला की उस गली को कैथाना कहते थे. गली में कैथा का एक पेड़ था और बचपन में मैं कैथाना की व्यत्पत्ति कैथा से हुई समझता था - कायस्थ और कैथाना का सम्बन्ध मुझे बहुत बाद में मालूम हुआ. कायस्थ, बनिये, ब्राह्मण, एक दो परिवार ठाकुरों के, एक नाई और एक कहार, बस. मेरे देखते देखते भी द्विज परिवारों का धन बढ़ा. एक दो परिवारों की हालत अगर कुछ बिगड़ी भी, तो कायस्थ की जगह बनिये ने ले ली. सारी गली में पक्के मकान केवल द्विजों के पास थे (गो कुछ द्विज कच्चे घरों में भी थे), और जब बिजली आई तो उन्ही घरों में, रेडियो आया तो उन्ही घरों में.
कहार का नाम था महादेव, कहारिन का नाम मुझे नहीं मालूम. बरसों तक वह औरत मेरे घर काम करने दिन में दो बार आती रही, और उसका नाम मुझे नहीं मालूम. बहुत ही व्यावहारिक, आती, काम करती, (बल्कि सारा परिवार काम करता, कभी इक्ट्ठे, कभी कई घरों में बँट कर) और चली जाती. उसे खुलते हुए मैंने एक ही बार देखा. घर में कोई शादी थी और लड़कियाँ बिना किसी बाजे के ही बैठ कर गा रही थीं. दबे दबे गले से गाने वाली शहरी द्विज लड़कियाँ. कहारिन आयी, तो काम खतम करके अचानक बोली, "जरा खुल के गाओ." और स्वयं स्टूल खींच कर उस पर ढोलक की थाप देने लगी, "किन्नो लियो रे गोरी, तिहारो रस." "अरे कहारिन तो छिपी रुस्तम है", किसी ने कहा और कहारिन उठ गयी. बस. न उसके पहले कुछ, न बाद में.
उसका एक लड़का था, मेरी ही उम्र का छोटेलाल. माँ बाप से ले कर गली मोहल्ले के सभी लोग उसे "छोटइया" कहते थे. छोटे हर बात में मुझसे तेज था, सिवाय पढ़ायी के. उसके स्कूल जाने की नौबत ही नहीं आयी, परिवार में किसी भी बच्चे के स्कूल जाने की नौबत नहीं आई. दौड़ना, कबड्डी या गेंद बल्ला खेलना, पेड़ पर चढ़ना, कुश्ती लड़ना या तालाब के उस पार पत्थर फैंकना, आसपास का कोई भी लड़का इनमें छोटे का मुकाबला नहीं कर सकता था. सत्रह साल की उम्र में, जब दुनिया के साथ ज़ोर आज़माने के लिए मैंने घर और शहर छोड़ा, तो वह एक मुसलमान युवक रफ़ीक खाँ का नौकर मुसाहब बन गया था. रफ़ीक का बाप काफ़ी सम्पत्ति छोड़ गया था, और रफ़ीक का एक ही काम था, पास पड़ोस की तमाम नौजवान लड़कियों से इश्क लड़ाना. छोटे मुहल्ले के सभी घरों में आता जाता था (कहारिन का लड़का था) और इसलिए इन प्रेम प्रसंगो के लिए उससे अच्छा दूत कोई और नहीं मिल सकता था. रफ़ीक 1947 में पाकिस्तान चला गया. और छोटे?
छोटे कहीं बर्तन माँजता होगा, इसकी कल्पना मैं नहीं कर सकता. लेकिन फ़िर करता क्या होगा? चोरी करता होगा, यह भी मैं नहीं सोच सकता. जेबें काटता हो, यह मुमकिन है, क्योंकि उसके लिए कौशल की ज़रूरत होती है, और शिकार को बेवकूफ़ बनाने का एहसास भी होता है. यह भी संभव है कि रात बिरात किसी अकेले आदमी की साइकल घड़ी आदि छीन लेने वाले किसी गिरोह में शामिल हो गया हो. तब वह शराब नहीं पीता था, लेकिन अब मुमकिन है कि भट्ठी लगा कर शराब बेचता भी हो, पीता भी हो.
हिन्दुस्तान में छोटेलाल जैसे लोगों के सामने विकल्प दो होते हैं - अपने मन को मार कर बड़े घरों के बर्तन माँजे, या फ़िर अपराध करें, असामाजिक या समाज विरोधी बनें, क्योंकि उनकी क्षमता के उपयोग का समाज में कोई मार्ग नहीं है. अमरीकी नीग्रो के पास एक तीसरा विकल्प भी है, आत्म सम्मान की रक्षा करते हुए जीना. लेकिन हिन्दुस्तान के शूद्र के पास ऐसा कोई विकल्प नहीं है - उसने हजारों साल पहले ही समाज में अपनी हीन स्थिति को स्वीकार कर लिया था.
गाड़ीवान टोला में मेरे मकान के पिछवाड़े खुली जगह में एक नीम का पेड़ था, और पेड़ के नीचे एक घरौंदा था - पाँच-छः फुट चौड़ा, पाँच-छः फुट लम्बा. उस घरौंदे में एक परिवार रहता था. मैं जब बहुत छोटा था तो उस परिवार में छः सदस्य थे. "टेकइया" (मैं अनुमान से ही कह सकता हूँ कि उसका नाम टेक चंद होगा) और "गिलहरी" दोनो अन्धे थे. गेल्हर का काका बदलू वहीं बूढ़ा हो कर मरा था, और उसे बाजे-गाजे के साथ ले गए थे. बहुत पहले गेल्हर के भाई भावज भी वहीं रहते थे, पास की खुली ज़मीन पर. भावज का नाम तो खैर मालूम भी क्या होता, भाई का नाम भी मैं भूल गया हूँ. तीस साल तक मैंने उस अन्धे दम्पत्ति को उस घरौंदे में रहते देखा. वक्त ने तीनो के ही चेहरों और शरीर पर जो छाप डाली, उसके अलावा तीस साल तक कोई फर्क नहीं पड़ा. गिलहरी के बच्चे होते रहे, मरते रहे. केवल एक लड़की ही जीवित रही - बड़ी बड़ी रसीली आँखों वाली ललिता. एक बार बचपन में उसकी भावज को एक साफ़ रंगीन साड़ी पहने देखा (जो शायद उसे किसी बड़े घर से मिली थी) मैं उसे पहचान नहीं सका था. उसके कुछ दिन बाद ही उस खुली जगह में उसे साँप डस गया. उसके मर जाने पर उसका पति भी कहीं चला गया. ललिता का ब्याह हो गया और अन्धे पति पत्नि अकेले रह गये.
टेकचंद बहुत ही कम बोलता था, बहुत ही कम. गेल्हर उतनी ही वाचाल थी. औरों को नहीं जानता, मुझे वह चाल से ही पहचान लेती थी. मेरे आश्चर्य प्रकट करने पर हँस कर कहती, "हे ल्यो! का मैं आँधर हौं कि न पहिचानिहौं!" यह उसका प्रिय मज़ाक था. कभी कहीं खुशी का मौका होता तो मगन हो कर गाती, "लायो महाराजा हमें छल करके." यह उसका प्रिय गीत था. कन्ट्रोल को कन्टोर और इन्सपेक्टर को निसपिट्टर कहती थी. सावन के महीने में उसकी नीम पर झूला पड़ता और आसपड़ोस की औरतें इक्ट्ठी हो कर झूलती और सावन गाती. मुझे ऐसा याद पड़ता है कि मैंने उसे हमेशा काली धोती पहने हुए ही देखा. अब सोचता हूँ कि शायद जहाँ से भी उसे धोती मिलती होगी, उसे वह काले रंग का ही लेती होगी, साबुन सज्जी की बचत.
कोई अतीत नहीं, कोई भविष्य नहीं, कोई वर्तमान भी नहीं. मन के अन्दर के न जाने किस कोने से वह अपनी हँसी का बहाव निकालती थी, अब अपने साथ वैसा छल कर पाती होगी क्या?
इतना भी मुझे याद पड़ता है कि उसकी भावज जब जिन्दा थी, तो कभी कभी घर आ कर रोती थी - उसका पति दिन भर जो कमाता था, शाम को ताड़ी पी लेता था, ऊपर कर्ज कर लेता था. रात को घर (!) आकर पीटता था, पैसे छीन लेता था.
और अब भी माँ के पास अक्सर औरतें आती हैं, हरिजन औरतें, शूद्र औरतें, और सबका एक ही किस्सा है, सबका एक ही दुश्मन है - दारू. अपनी सारी ज़िन्दगी में दो ही हरिजन डाक्टरों से मेरी भेंट हुई है. एक होम्योपैथी करते हैं, दूसरे के पास भी कोई डिगरी नहीं है, पुराने किसी नियम अन्तर्गत डाक्टरी करने का, या कम से कम दवाईयाँ बेचने का लायसैंस उन्हें मिला हुआ है. उकी दुकान पर औषधि निर्माताओं की प्रचार सामग्री प्रचुर मात्रा में देखी जा सकती है - रंग बिरंगे फोल्डर, कार्ड, सोख्ते, लेकिन सिर दर्द की भी दवा नहीं मिलती. मरीज आते हैं, डाक्टर को दिखाये बिना ही अन्दर चले जाते हैं, दवा पी कर बाहर आते हैं, पैसे देते हैं और चले जाते हैं. एक बार कुछ परेशान से दिखे, इलाके में नया मजिस्टर आया था, जिसके बारे में प्रसिद्ध था कि वह बड़ा सख्त है. लेकिन दूसरे दिन उनका चेहरा फ़िर खिला हुआ था, थानेदार की मार्फत सारा मामला तय हो गया था.
डाक्टर साहब इलाके के हरिजनों के नेता है, पिछली बार चुनाव भी लड़े थे, काफ़ी वोट मिले थे, लेकिन हार गये, क्योंकि कांग्रेस का उम्मीदवार उनसे पड़ा और ज़्यादा दबदबे वाला चौधरी था. डाक्टर साहब को द्विजों से कोई लगाव नहीं है, वे हरिजनों के पूर्ण हितैषी हैं, लेकिन बस ज़िन्दगी ही ऐसी है.
अमरीकी नीग्रो को शकल से पहचाना जा सकता है. लेकिन इसमें नीग्रो की मुक्ति भी निहित है - उसे "गोरा" बनने की चेष्टा करने का लोभ नहीं होता. वह अपने पुरखों की गुलामी को स्वीकार कर सकता है, अपनी वर्तमान स्थिति के तथ्य को भी स्वीकार कर सकता है, और गोरों से कह सकता है कि हमें अपने को नहीं सुधारना, तुम्हें अपने को शिक्षित करना है, तुम्हें नैतिक बनना है! सवाल यह नहीं है कि तुम हमें स्वीकार करो, सवाल यह है कि हम नीग्रो लोग तुम्हें स्वीकार करें.
लेकिन हिन्दुस्तानी शूद्र के साथ ऐसा नहीं है. गोरे लोग समाज में नीग्रो को जो स्थान देना चाहते हें या देते हैं, उसे वह स्वीकार नहीं करता. पिछले दिनों मुझे यह जान कर निजि क्षति का अनुभव हुआ कि अमरीकी नीग्रो लेखिका लोरायन हैंन्सबरी की कैंसर से मृत्यु हो गयी. कई वर्ष पहले मैंने उनका एक वाक्य पढ़ा था, जिसे मैं पहले भी एकाध बार उद्धृत कर चुका हूँ, और यहाँ फ़िर करना चाहता हूँ: "यह सच है कि साहित्य मात्र का उद्देश्य मानव जाति में समाहित होना है, लेकिन इससे पहले ज़रूरी है कि दुनिया के दबे हुए लोग अपने को पहचानें."
यह पहचान ही ऐसा काम है, जो भारतीय शूद्र के लिए लगभग असंभव जैसा कठिन है. हज़ारों साल पहले ही उसने द्विजों द्वारा समाज में अपने लिए निर्धारित स्थान को स्वीकार कर लिया था. भरी दोपहरिया में मेरी जमादारनी प्यासी रह गई, लेकिन उसने अपने हाथ से मेरे गिलास में पानी ले कर पीना स्वीकार नहीं किया. वह अब भी जमादारनी है, जिसका काम है पाख़ाने साफ़ करना, और कूड़ा उठाना. अस्पृश्यता निवारण़ कानून! उसको विरासत में यह ज़िम्मेदारी मिली है कि दूसरों की गन्दगी साफ़ करे. उसके बाद यही काम उसके बेटे बेटियों बहुओं को मिलेगा और उसके बाद उनके बेटे बेटियों बहुओं को. इस सिलसिले के चलते हुए क्या अस्पृश्यता निवारण कानून जैसे हज़ार कानूनों का भी कोई मतलब हो सकता है?
लेकिन सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि हिन्दुस्तान का शूद्र सिर उठा कर यह नहीं कह सकता कि हाँ मैं शूद्र हूँ, और तुमसे किसी तरह भी कम नहीं हूँ, किसी तरह छोटा नहीं हूँ. वह अपनी स्थिति को बदलना भी चाहता है तो द्विज बनने की चेष्टा करता है. द्विज वह बन नहीं सकता, इसलिए अन्ततः आत्म सम्मान भी प्राप्त नहीं कर सकता. मन ही मन उसके अन्दर जलन और हीन भावना बनी रहती है, बढ़ती जाती है. मुझे एक मित्र ने बताया जो शूद्र हैं, और साम्यवादी नहीं हैं कि चीनी आक्रमण के समय बहुसंख्यक शूद्र मन ही मन खुश हुए थे कि चलो अच्छा है द्विजों की सत्ता समाप्त होगी. लेकिन, इस बात के अलावा कि आज के चीनी आक्रमण और दो सदी पहले के अंग्रेज़ी आक्रमण में कोई विषेश अंतर नहीं है, और अगर दुर्भाग्यवश हिन्दुस्तान फ़िर कभी गुलाम हुआ, तो नये शासक द्विजों के माध्यम से ही शासन करेंगे, यह तथ्य उससे भी बड़ा है कि शूद्रों में देश द्रोह की भी क्षमता नहीं है, देश द्रोह भी द्विज ही करते हैं. हिन्दुस्तान का शूद्र तो बिल्कुल ही झुलस गया है, स्वतंत्र रूप से कोई भी काम करने की क्षमता उसमें नहीं है.
इन्हीं मित्र ने पिछले दिनों एक खंड काव्य लिखा. कोई ऐसी असाधारण रचना नहीं फिर भी ऐसी रचनाएँ द्विज लेखक लिखते रहते हैं, और वे छपती रहती हैं. लेकिन मेरे इन मित्र की कविता कहीं नहीं छप रही.
मेरी नज़र में इससे भी बड़ा एक सवाल और है. कविता के कुछ अंश उन्होंने मुझे सुनाये. मैंने जब सीधा सवाल किया कि आप का जो प्रत्यक्ष अनुभव है, जो कुछ आप ने भोगा है, उसे ले कर आप ने कभी कुछ लिखा है, तो उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया. नहीं लिखा, क्योंकि शूद्र होने का जो अर्थ है, उसे शारिरिक तौर पर स्वीकार और नैतिक स्तर पर अस्वीकार करने के बजाय, वे मूलतः उसे नैतिक स्तर पर स्वीकार और शारीरिक स्तर पर अस्वीकार करने की चेष्टा करते हैं.
जले हुए, झुलसे हुए लोग, बिगड़ती हुई नस्ल. लेकिन दिल्ली में युगोस्लाविया के एक भूतपूर्व राजदूत ने, जो कला मर्मज्ञ भी हैं, कहा कि हिन्दुस्तान में उन्हें किसान मजदूर औरतें दिखायी ही नहीं दीं, हर हिन्दुस्तानी औरत की चाल रानियों जैसी होती है. आग में झुलसे हुए लोग, तपा हुआ सोना. मुश्किल यह है कि आदमी तो असंख्य धातुओं का बना है. जब वह स्वयं अपनी शुद्धि करता है, तब भी अक्सर बात बिगड़ जाती है. जब वह शुद्ध किया जाता है, तो हर हालत में अनिवार्य ही, इसका एक ही परिणाम होता है, आदमी का झुलस जाना. संस्कारों में हमेशा ही एक पीड़ा निहित होती है. और पीड़ा सहने की सामर्थ्य आ जाए तो मनुष्य को ऐसी भंगिमा प्रदान करती है जो बड़ी ही गरिमामयी प्रतीत होती है. लेकिन निरपेक्षता और जड़ता का अन्तर बहुधा बड़ा बारीक होता है. निरपेक्ष बनते बनते हिन्दुस्तानी आदमी जड़ हो गया है, ब्रह्मचारी तो नहीं बन सका, नपुंसक बन गया. हज़ारों साल के संस्कारों ने हिन्दुस्तानी औरत को गज़ब की चाल ढाल प्रदान की है, किसी हद तक हिन्दुस्तानी मर्द को भी. लेकिन अन्दर से मर्द औरत दोनों झुलसे हुए हैं, और यह झुलसे हुए मन बिल्कुल सड़ गये हैं.
अतीत और वर्तमान पर नज़र डालता हूँ तो एक गहरी उदासी मन में घर कर जाती है. भविष्य की ओर देखने का साहस एकत्र करने में मन एक बार काँप जाता है. हिन्दुस्तान में जिजिवषा का अर्थ बदल गया है - किसी भी तरह शरीर से चिपके रहो. शरीर रोगी हो, कोढ़ी हो, ज़न्दगी रोगी कोढ़ी हो, खुशी की एक किरण भी न हो, फ़िर भी शरीर से चिपके रहो. बचना फ़िर भी नहीं होता. हर साल लाखों आदमी हैजे से मरते हैं, चेचक से मरते हैं, निरन्तर भूखे या अधपेटे रह कर तिल तिल मरते हैं. लेकिन हैजा और चेचक और भूख को उन्होंने स्वीकार कर लिया है. चेचक निकली है, शारदा माता आयी है. पानी नहीं बरसा, यज्ञ करो. इन्हें ख़तम करने की कोशिश में खतरा है, मौत का खतरा है. हिन्दुस्तानी आदमी पीठ पर छुरा खाता है, पीठ पर छुरा मारता है, छाती पर नहीं. और कहीं कोई संकल्प नहीं है, निष्ठा नहीं है, निर्णय नहीं है. लेकिन उदासी के इस बहुत गहरे दलदल में फँसे हुए भी हार नहीं मानी जा सकती. हार मान लेने पर तो एक ही मार्ग शेष रहता है - आत्महत्या. किन्तु हार न मानने का मतलब होता है जि़न्दगी को एक स्थायी जोखिम में डाल देना. तमाम झूठे सहारों को छोड़ देना, तोड़ देना, चाहे वह इतिहास और परम्परा के हों, चाहे धर्म और नैतिकता के हों, चाहे आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा के हों. हार न मानने का मतलब है जीवन की तमाम असुरक्षाओं को स्वीकार करना, और इन असुरक्षाओं से लड़ते हुए जीवन के अंकुर को उगाना और पोसना. बहुत मुश्किल है, बहुत ही मुश्किल है, क्योंकि हर तरफ़ सुरक्षा का आश्वासन है कि हमारी शरण में आओ. जाति की सुरक्षा, धर्म की सुरक्षा, सामाजिक संगठन की सुरक्षा, राज्य की सुरक्षा, अंधविश्वासों की सुरक्षा. न जाने कितने, कैसे कैसे अंधविश्वास हैं. हमारी शरण में आओ! सुरक्षा नहीं है. कहीं किसी में नहीं है. लेकिन दिल के बहलाने को जन्नत का ख्याल तो अच्छा है ही. और जीवन के साथ जीवन की असुरक्षाओं को स्वीकार करने की तकलीफ़ से आदमी बच जाता है.
पचीस वर्ष की आयु में विधवा हो कर जिस स्त्री ने अपनी संकल्प शक्ति के सहारे ही खुद पढ़ा लिखा, और प्राथमिक पाठशाला में नौकरी करके बच्चों को पाला पढ़ाया, उसी का लड़का जब जीवन के परिचित दायरे से बाहर निकल गया, स्वीकृति मान्यताओं के दायरे से बाहर निकल गया, तो उसकी तर्क बुद्धि ने हार मान ली. अब वह नियमित रूप से मासिक "कल्याण" पढ़ती है, और जीवन के हर सवाल का उसके पास एक ही उत्तर है - जो कुछ करता है, ईश्वर करता है.
लेकिन मैं हार नहीं मान सकता. जिन कठघरों में हम जन्म लेते हैं और पलते हैं, उनसे बाहर निकलने की चेष्टा करने वाले, हार नहीं मान सकते. उनके सामने तो एक ही मार्ग है - इन कठघरों को तोड़ना, ताकि इनसे बाहर निकल कर जीवन की समस्याओं का, जीवन की असुरक्षाओं का सचमुच सामना कर सकें, उन पर विजय पाने का वास्तविक प्रयास कर सकें.
यह लड़ाई जितनी बाहरी शक्तियों से हैं, उतनी ही अपने अन्दर खुद अपने आप से भी है - अपने संस्कारों से, न जाने कितनी ऐसी बातों से, जिन्हें हम मान कर चलते हैं, जिन्हें कसौटी पर कसने का ख्याल नहीं आता, लेकिन जो अन्धविश्वासों पर आधारित हैं, केवल अंधविश्वासों पर, ऐसे अन्धविश्वासों पर, जिन्हें सामाजिक मान्यता मिली हुई है. और यह लड़ाई हर वक्त है, हर जगह है, विचारों भावनाओं में, निजि और सार्वजनिक आचरण में, संगठित और सस्वतः स्फूर्त व्यवहार में, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सम्बन्धों में.
हार हो या जीत, यह लड़ाई तो करनी ही है. हर हालत में लगातार करनी है, क्योंकि यह तो जीवन की स्वीकृति का अनिवार्य परिणाम है. हारना मृत्यु नहीं है, हार मानना मृत्यु है. और इसलिए लड़ना ही है, जो भी हो, लड़ना ही है.
पुनश्चयः पाँच अगस्त और तेईस सितम्बर के बीच युद्ध स्थल में हुई घटनाओं में क्या ऐसा कोई संकेत है जिससे इस लेख में कुछ जोड़ना या घटाना वाँछनीय हो? इस अविधि के कुछ ही पहले यह लेख लिखा गया था, और उसके बाद भी ऐसा कुछ नहीं हो रहा है जो इस लेख की स्थापनाओं को किसी तरह प्रभावित करता हो. लेकिन उस अविधि में, विषेशतः 6 सितम्बर और 23 सितम्बर के बीच के अठारह दिनों में ऐसा लगता था कि इस बूढ़े देश के शरीर में एक बार बिजली दौड़ गई है. हो सकता है दिल्ली में रहने के कारण मुझे विषेशतः ऐसा लगता है, क्योंकि दिल्ली राजधानी होने के अतिरिक्त पंजाब से लगी हुई है, और वस्तुतः सारे देश के लिए यह बात सच न हो, या उतनी सच न हो. ऐसा भी नहीं कि जो कुछ हुआ वह सब अच्छा ही था - बहुत कुछ बुरा भी था. लेकिन इतना भी क्या कम था कि चाहे यह एक प्रकार का गृह युद्ध ही था (दो राज्य होने पर भी राष्ट्र तो एक ही है), फ़िर भी यह लड़ाई साम्प्रदायिक नहीं थी, वरना राष्ट्रीयता और साम्प्रदायिकता के बीच का पुराना विरोध एक नये रूप में फ़िर से उभरा था. दूसरे, यह लड़ाई, पीठ में छुरा भोंकने की नहीं, बराबर या लगभग बराबर के हथियारों से आमने सामने लड़ने की थी. तीसरे स्वतंत्र भारत की पल्टन, अपने ही नौजवान अफसरों के नेतृत्व में पहली बार अच्छी तरह लड़ी. जीत हार का उतना महत्व नहीं, क्योंकि कुल अठारह दिन ही लड़ाई चली, और जीता हारा गया कुल रकबा लगभग उतना ही है जितना दिल्ली नगर निगम का अधिकार क्षेत्र. महत्व की बात है कि सेना अच्छी तरह लड़ी.
इस अंतिम बात को, विषेशतः जीत को बहुत अधिक महत्व दिया जा रहा है, जबकि वास्तविक महत्व इस युद्ध के राजनीतिक कारणों का है - राष्ट्रीयता और साम्प्रदायिकता का संघर्ष. और यह संघर्ष उन तमाम संघर्षों से जुड़ा हुआ है, जिनकी गवाही मैंने इस लेख में देनी चाही है.
क्या इस युद्ध से संकेत मितला है कि लोकवादी, असाम्प्रदायिक, और सामाजिक एकता पर आधारित राष्ट्रीयता की पुनः प्रतीष्ठा पर ही देश का भविष्य निर्भर है? निश्चय ही हाँ. क्या इससे यह भी संकेत मिलता है कि इस कार्य के लिए आवश्यक शक्ति, चेतना और संकल्प देश में मौजूद हैं? इस प्रश्न का उत्तर देना कुछ कठिन है, क्योंकि इतिहास के दिशा संकेतों पर भरोसा करना खतरनाक होता है, अगर उन्हें बल देने वाले संगठित और निरन्तर सक्रिय प्रयास साथ में न हों. फ़िर भी, समस्या अंततः सीधे आत्मरक्षा की है, अपने अस्तित्व को बनाये रखने की है, और जब जान खतरे में हो, तो दुर्बल से दुर्बल प्राणी भी एक बार बहादुर बन जाता है.
भरोसा तो आखिरकार कसी बात का नहीं, सिवाय इसके कि जिन्हें एहसास है, उन्हें हर हालत में लड़ना ही होगा, चाहे लड़ाई बंदूक की हो, चाहे मन की.
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27 जुलाई 2010
आधुनिक इतिहास और पारम्परिक समूहों का भविष्य
टिप्पणीः परम्पराओं और परम्परागत समूहों पर धर्म के प्रभाव, उपनिवेशवाद और धर्म के सम्बंध, आने वाले भूमंडलीकरण का आभास और उसका संस्कृति तथा भाषा पर प्रभाव, जैसे विषयों को छूने वाला ओम का यह लेख विश्व के विभिन्न देशों और संस्कृतियों पर विहंगम दृष्टि डालता है और बहुत विचारोत्तेजक है. १९७१ के आसपास लिखे इस आलेख, जो "मैं और मेरा वक्त" नाम के आलेख संग्रह का हिस्सा था, में कही कुछ बातों को इतिहास ने सही साबित किया, कुछ अन्य बातें गलत साबित हुईं. आज के समाजवादी लेखन में भारत में धर्म के विषय पर इस तरह स्पष्ट शब्दों में बात कहना शायद गलत माना जायेगा, और न ही इस तरह के विषयों पर आज कोई बहस संभव है.
मेरे अपने मन में इस लेख ने बहुत से प्रश्न उठाये, कुछ बातों से असहमती लगी, टाईप करते करते, मन ही मन उनसे बहस कर रहा था.
आधुनिक इतिहास और पारम्परिक समूहों का भविष्य, भाग 2
ओमप्रकाश दीपक (1971 के आसपास)
गोरी सभ्यता के बाहर दुनिया के लोगों का भविष्य क्या है, इस सवाल का जवाब खोजने से पहले हम इस तथ्य को देख सकते हैं कि ईसा पूर्व की छठी शताब्दी में जन्में बौद्ध धर्म ने जब दीक्षा ले कर धर्म परिवर्तन की व्यवस्था शुरु की, तो उसने धर्म और पारम्परिक संगठन में एक बड़ी क्रांती का सूत्रपात किया. तब तक राज्य, धर्म, संस्कृति और सामाजिक संगठन में सब मिल कर एक इकाई का निर्माण करते थे. धर्म में न केवल आदमी का सम्पूर्ण व्यक्तित्व बल्कि उसके सामाजिक सम्बंध भी आ जाते थे. बौद्ध धर्म ने आध्यात्मिक व्यक्तित्व को सामाजिक सम्बंधों से अलग किया. बौद्ध धर्म ने इसे सम्भव बनाया कि एक दिन पहले तक की नगरवधू, दूसरे दिन भिक्षुणी बन गयी. लेकिन इसके अलावा, बौद्ध धर्म का दार्शनिक आधार पाराम्परिक, पौराणिक समाजों के दार्शनिक आधार के काफ़ी निकट था कि वहाँ जहाँ कहीं भी फ़ैला, पराम्परिक धर्मों के साथ घुल मिल गया. संभर्ष न हुए हों ऐसा नहीं, लेकिन एक तो पाराम्परिक धर्मों की तरह बौद्ध धर्म की भी कोई एक किताब नहीं, दूसरे स्वयं बुद्ध भी ज्ञान की ऐसी अवस्था के प्रतीक हैं जिसे प्राप्त करना दूसरों के लिए भी असम्भव नहीं माना गया. "धर्म परिवर्तन" की व्यवस्था के बावजूद बौद्ध धर्म मूलतः व्यक्तिवादी है.
पाँच सौ वर्ष बाद जन्मे मसीही धर्म और उसके भी पाँच सौ वर्ष बाद बाद जन्मे इस्लाम का चरित्र भिन्न है. बुद्ध जहाँ रास्ता है, ईसा मूलतः माता है, मसीहा है. और मसीही धर्म संगठन उनका प्रतीक है, प्रतिनिधि है. पैगम्बर मोहम्मद "रसूल अल्लाह" हैं, और इस कारण आध्यात्मिकता से ले कर राजनीति तक सभी क्षेत्रों में मनुष्य के मार्ग दर्शक हैं, नेता हैं. मसीही धर्म और इस्लाम दोनो में एक अन्तिमता और एकांतिकता है जो बौद्ध धर्म और पाराम्परिक धर्मों में नहीं है. बहरहाल, यहाँ धर्मों की तुलना करना मेरा उद्देश्य नहीं. मैं इस तथय की ओर ध्यान खींचना चाहता हूँ कि दुनिया की दो तिहाई या और ज़्यादा आबादी अब इन तीन धर्मों के अंतर्गत आ गयी है. यूरोप, दोनो अमेरिका और आस्ट्रेलिया, इन चार महाद्वीपों में तो मसीही धर्म का एकक्षत्र साम्राज्य है. उत्तरी अफ्रीका, पश्चिमी एशिया तथा मध्य एशिया के कुछ भाग उसी तरह मुसलमान हैं. अफ्रीका में सहारा के दक्षिण में मसीही धर्म पराम्परिक धर्मों का स्थान लेने को सचेष्ठ है. दक्षिणी एशिया में इस्लाम, बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म के बीच एक तनावपूर्ण सहअस्तित्व है. चीन, मंगोलिया और जापान में ऐसे ही बौद्ध धर्म, ताओवाद, कन्फ़ूशियस मत और शिन्तो धर्म के बीच सहअस्तित्व है, लेकिन वहाँ दक्षिण एशिया जैसा तनाव नहीं.
ईसाइयों में गोरो से हमे यहाँ मतलब नहीं, क्योंकि गोरी सभ्यता तो उन्हीं की सभ्यता है. ऐसे अधगोरे लोगों को भी छोड़ देना चाहिये जो हर स्तर पर, पूरी तरह गोरी सभ्यता से जुड़ गये हैं. लेकिन इसके बाद ईसाइयों की बड़ी संख्या बची रहती है, गो ईसाइयों की कुल संख्या देखते हुए बहुत अधिक नहीं, दुनिया की आबादी में लगभग एक तिहाई गोरे हैं जिनके अलावा दुनिया में ईसाइयों की संख्या एक मोटे अनुमान के अनुसार पंद्रह बीस करोड़ के बीच हो सकती है. इनमे भी दो हिस्से हैं.
मसीही धर्म के विभिन्न मतों सम्प्रदायों के अपने अपने विशाल केंद्रीय संगठन हैं, जो सारे के सारे, युरोप या उत्तरी अमेरिका से संचालित होते हैं. ये संगठन मसीही धर्म का इस्तेमाल गोरी सभ्यता के एक उपकरण के रूप में करते हैं. युरोपीय भाषाएँ, युरोपीय रहन सहन और पहनावा और गोरी दुनिया के साथ आर्थिक या व्यापार सम्बंध, युरोप से संचालित केंद्रीय संगठनों के हाथ में इन बातों के साथ मसीही धर्म अनिवार्य और अभिन्न रूप में जुड़ा रहता है.
दूसरा हिस्सा ऐसे ईसाइयों का है जो निष्ठावश या अन्य किसी कारणवश ईसाई तो हो गये हैं, या पीढ़ियों से हैं, लेकिन जो मसीही धर्म के माध्यम से गोरी सभ्यता के साथ नहीं जुड़े, बल्कि जिन्होंने मसीही धर्म को अपने पाराम्परिक जीवन में समाविष्ट कर लिया, कहीं कहीं तो अपने पाराम्परिक धर्म में ही ईसा, मरियम और ईसाई सन्तों को भी उन्होंने अपने देवी देवताओं के बीच यथास्थान प्रतिष्ठित कर दिया.
कुछ ऐसे क्षेत्र भी हैं, मुख्यतः अफ्रीका में इथियोपिया और भारत में केरल, जहाँ युरोप में मसीही धर्म संगठन से सर्वथा स्वतंत्र, डेढ़ हज़ार साल या और ज़्यादा अर्से से ईसाइयों की बस्तियाँ चली आ रही हैं. इस दूसरी कोटी के सभी तरह के ईसाइयों को पराम्परिक समूहों में ही गिनना चाहिये.
इन मामलों की जानकारी में बड़ी जबर्दस्त कमी है. संयुक्त राज्य अमरीका में अब मुश्किल से पांच दस लाख के बीच आदिवासी बचे हैं, वह अभी भी अमरीकी समाज का अंग नहीं बन पाये हैं. उनकी औसत आमदनी ढाई तीन सौ डालर सालाना है (इससे दस गुनी आय तक के लोग सरकारी परिभाषा के अनुसार ग़रीब माने जाते हैं). अपनी धार्मिक मान्यताओं और धार्मिक संस्कारों को वे यथासंभव दूसरों से गुप्त रखते हैं. लेकिन उनमें ऐसे लोग बहुत कम हैं जो अपने पाराम्परिक समाज से कट गये हों. उनके गांव पहले जैसे नहीं, उनकी पौशाक पहले जैसी नहीं, और आम तौर पर उन्होंने अंग्रेज़ी बोलना सीख लिया है. लेकिन उसके अलावा उन्होंने अपने चारों ओर एक दीवार खड़ी कर रखी हैजिसमें किसी बाहरी आदमी का घुस पाना मुश्किल है. उस दायरे के अंदर पाराम्परिक नाच और अन्य संस्कार होते हैं. युद्ध (कोरिया या वियतनाम) से लौटने वाले सैनिक का कबाइली पुरोहित के द्वारा शुद्धि संस्कार होता है. लेकिन कब तक? क्या गोरे अमरीकी समाज में समा जाने के अलावा इनकी कोई और नियति भी हो सकती है? उसकी कल्पना करना कठिन है लेकिन स्वयं उनमें ऐसे लोग हैं जो ऐसा सोचते हैं कि गोरे लोग सार्थक ढंग से जीना नहीं जानते, आदिवासी उन्हें सिखा सकते हैं.
मध्य और दक्षिणी अमरीका का युरोपीय नामकरण "लातिनी अमरीका" अपने आप में औपनिवेशिक दिमाग का सूचक है, क्योंकि समूचे क्षेत्र में गोरों का अनुपात एक चौथाई से अधिक नहीं होगा. इससे यह ऐतिहासिक तथ्य भी छिपा रह जाता है कि उत्तरी अमरीका की तरह दक्षिणी अमरीका में भी आदिवासियों को या तो समूल नष्ट कर दिया गया है या जंगल पहाड़ और रेगिस्तान में जा कर सिर छिपाने को बाध्य कर दिया गया है. अर्जेन्टीना, उरुग्वे और दक्षिणी ब्राज़ील में अब आदिवासी नहीं के बाराबर ही रह गये हैं. चिली में भी आदिवासी तो नहीं रह गये, लेकिन बहुसंख्या गोरों की है या मिश्रित रक्त वालों की, उसके बारे में कुछ बहस है.
आदिवासियों की कुल संख्या कितनी है, इसका कुछ ठीक पता नहीं. लेकिन कुल आबादी में उनका अनुपात भी मोटे तौर पर एक चौथाई आँका जाता है. शेष आधी आबादी मिश्रित रक्त वालों की है. गोरे और मिश्रित रक्त वाले लगभग सारे ही ईसाई हैं. आदिवासियों में भी ईसाईयों की संख्या काफ़ी है. समूचे क्षेत्र में रोमक कैथोलिक मत का एकाधिपत्य है. यहाँ पाराम्परिक समूहों की स्थिति पर विचार करते समय धर्म और रक्त मिश्रण दोनो को ही ध्यान में रखना ज़रूरी है. मेक्सिको ही शायद एकमात्र ऐसा देश है जिसने कम से कम सांस्कृतिक स्तर पर अपने को पुरानी आदिवासी सभ्यताओं से जोड़ने की चेष्टा की है. लेकिन वहाँ की साक्षरता की कसौटी स्पेनी भाषा है, और राजनीतिक आर्थिक जीवन में बहुसंख्यक आदिवासी शक्ति केंद्रों से कटे हुए हैं. धर्म के क्षेत्र में एक किसी हद तक सतही होने पर भी काफ़ी महत्वपूर्ण मिसाल गुआडेलोप की प्रसिद्ध मरियम की मूर्ति है जिसमें मरियम गोरी नहीं हैं, अमरीकी आदिवासी हैं और गिरजाघर में प्रतिष्ठित मूर्तियों में एक मूर्ति आदिवासियों के पाराम्परिक सांस्कृतिक देवता की भी है. लेकिन मेक्सिको में भी पहाड़ी और रेगिस्तानी इलाकों में आदिवासी गरीब और निरक्षर हैं और अब भी अपना पाराम्परिक जीवन बिता रहे हैं.
अन्य देशों में तो आदिवासियों की स्थिति बहुत कुछ अछूतों जैसी है. वे अब भी अपनी प्राचीन भाषाएँ बोलते हैं और इस कारण एक्वाडोर और पेरू जैसे देशों में मताधिकार से भी वंचित हैं - मताधिकार के लिए स्पेनी भाषा का जानना आवश्यक है. इस प्रकार जहाँ उनका समूल नाश नहीं हुआ है, वहाँ भी उनके सामने दो ही विकल्प हैं - अपने पारम्परिक जीवन को त्याग कर अधगोरे बनें और गोरी सभ्यता में दूसरे दर्जे की नागरिकों की हैसियत प्राप्त करें, या जंगलों, पहाड़ों और रेगिस्तानों में अपने पाराम्परिक जीवन की रक्षा करने की चेष्टा करते हुए धीरे धीरे नष्ट हो जायें. इस संदर्भ में मिश्रित रक्त वालों के भी मोटे तौर पर दो हिस्से हैं. एक हिस्सा ऐसा है जो गोरों के साथ जुड़ा रहा है और उनकी शक्ति और सम्पन्नता में कम ज़्यादा हिस्सेदार है. दूसरा हिस्सा ऐसा है जो नाम करने को भले ही ईसाई है, और उसकी नसों में कुछ युरोपीय रक्त भी है लेकिन अन्यथा उसकी स्थिति भी आदिवासियों जैसी ही है और उसके सामने भी वही विकल्प हैं.
अफ्रीका के पारम्परिक समूहों के बारे में जानकारी और भी कम है. एक अनुमान के अनुसार अफ्रीका की आबादी में आधे मुसलमान हैं, एक तिहाई ईसाई और शेष, यानि कुल आबादी का केवल छठा भाग ही पारम्परिक धर्मों को मानने वाला रह गये हैं. लेकिन कुछ अफ्रीकी सूत्रों के अनुसार अफ्रीका की तीस करोड़ से कुछ अधिक आबादी में आठ दस करोड़ के बीच मुसलमान हैं, पाँच सात करोड़ के बीच ईसाई. अगर यह अनुमान सच है तो अफ्रीका की आबादी में लगभग 40-50 प्रतिशत लोग अब भी अपने पाराम्परिक धर्मों को मानते हैं.
लेकिन इन ऊपरी तथ्यों से अलग इस बारे में कोई मतभेद नहीं है के उत्तरी अफ्रीका के अरब देशों को छोड़ कर, आम तौर पर अफ्रीकी लोगों ने जहाँ इस्लाम या मसीही धर्म को स्वीकार कर लिया है वहाँ भी इससे उनकी पाराम्परिक जीवन पद्धिति में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं हुआ है. पिछले कुछ दशकों में, खास तौर पर मसीही धर्म के सम्बंध में, दो प्रवृतियाँ विषेश रूप से दिखाई पड़ी हैं. एक तो सम्भवतः राष्ट्रवाद के प्रभाव के कारण, युरोप स्थित केंद्रों के नियंत्रण से मुक्त, स्वतंत्र अफ्रीकी धर्म संगठनों के निर्माण के आंदोलन बड़े पैमाने पर हुए हैं. अफ्रीकी धर्म और दर्शन के एक ईसाई अध्यापक के अनुसार इस तरह के लगभग पाँच हज़ार संगठन पूरे महाद्वीप में बने हैं, जबकि युरोपीय केंद्रों से सम्बद्ध मसीही धर्म संगठनों की संख्या लगभग एक हज़ार है. स्वतंत्र धर्म संगठनों के अनुयायियों की संख्या अफ्रीकी ईसाईयों में कितनी हो गयी है, इसकी जानकारी नहीं है. दूसरे ऐसा भी काफ़ी बड़े पैमाने पर हुआ है कि मसीही धर्म स्वीकार करने के कुछ समय बाद लोग फ़िर अपने पाराम्परिक धर्मों में वापस चले जाते हैं. यहाँ भी हम ईसाईयों की एक दुविधा देख सकते हैं. एक स्तर पर युरोप से स्वतंत्र होने की चेष्टा, रानीतिक अधिक है, सांस्कृतिक कम. अगर आर्थिक संगठन और आर्थिक विकास के संदर्भ में लक्ष्य गोरी सभ्यता की नकल करना ही रहता है, तो अफ्रीका के मसीही धर्म संगठन स्वतंत्र भले ही जायें, अफ्रीकी लोगों का पराम्परिक जीवन कायम नहीं रह सकता. यह बात उन लोगों के लिए भी सच है जो धर्मों को अब भी मानते हैं. और मूलतः उनके सामने भी वही समस्या है जो मध्य और दक्षिणी अमरीका के आदिवासी समूहों के सामने है. इतना फर्क शायद है कि अफ्रीका में गोरों और मिश्रित रक्त वालों की संख्या बहुत कम होने के कारण पारम्परिक अफ्रीकी समूहों के समूल नष्ट होने की संभावना नहीं है. लेकिन अगर नाश नहीं, तो सड़न. गोरी सभ्यता की बंदर नकल (जिसकी प्रवृति अफ्रीकी शासक वर्ग में भी बड़े पैमाने पर दिखाई देती है) या सड़न, अभी तो यही विकल्प दिखायी देते हैं.
इस्लाम बड़े धर्मों में सबसे नया, और सबसे अधिक राजनीतिक है. मसीही धर्म के पोप मूलतः धार्मिक नेता रहे हैं, जिनकी राजनीतिक शक्ति धीरे धीरे घटती रही है, गो अब भी आम तौर पर जैसा समझा जाता है उससे बहुत अधिक है. लेकिन इस्लाम के ख़लीफ़ा मुख्यतः राजनेता थे जिनका कर्तव्य इस्लाम के प्रचार और और उसकी रक्षा के लिए राजशक्ति का इस्तेमाल करना था. धर्म संगठन की शक्ति धर्म की व्याख्या करने वाले उलमाओं के हाथ में थी और अब भी है. लेकिन इस्लाम रंगीन चमड़ी वाले लोगों का धर्म है और इसलिए राजनीतिक दृष्टि से दुर्बल है. इस्लाम के सामने इस कारण मुख्य समस्या आंतरिक है. फ़िलहाल इस्लाम में इतनी शक्ति नहीं है कि राजशक्ति के इस्तेमाल से सारी दुनिया को मुसलमान बनाने की बात सोची जाये. आंतरिक शक्ति का भी विकास होने पर यह सोचना भी संभव होता कि इस्लाम को राजनीति से उसी तरह जोड़ा जाये जैसे गोरी सभ्यता अभी भी मसीही धर्म से जुड़ी है. कुछ लोगो ने सारी दुनिया में इस्लाम और मसीही धर्म के गँठजोड़ की कल्पना भी की है. लेकिन यह तमाम बातें वस्तुस्थिति के संदर्भ में अयथार्थ प्रतीत होती हैं, क्योंकि इस्लामी समाज स्वयं एक प्रकार का पाराम्परिक समाज बन गया है, स्थिर, गतिहीन. इस्लाम का ह्वास चूँकि पिछले छः सौ सालों में ही हुआ है, इस कारण मुसलमानों के लिए इस तथ्य को स्वीकार करने में एक तरह की मानसिक अड़चन आती है कि अन्य धर्मों की तरह इस्लाम के आध्यातमिक और मानवीय मूल्यों का महत्व भी कम होगा, लेकिन इस्लामी कानून और इस्लामी राजनीति के आधार पर नयी दुनिया नहीं बनायी जा सकती. फ़िर भी यह एक असलियत है कि गैर अरब अफ्रीका में, हिन्दुस्तान में, मलयेशिया और इन्दोनेशिया में, इन क्षेत्रों के पाराम्परिक धर्मों के साथ इस्लाम का समन्वय उसी प्रकार हुआ है कि धार्मिक भावनाओं का आवेग छोड़ दें तो इन देशों के मुसलमानों और अन्य लोगों में कोई बुनियादी अंतर नहीं है. जिन देशों की सारी आबादी मुसलमान है, वे भी पाराम्परिक समाज ही हैं, चाहे मोरोक्को हो या मिस्र, ईरान हो या सऊदी अरब. इस्लाम की समस्या कुछ ज़्यादा पेचीदा इस कारण हो जाती है कि आर्थिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के साथ यहां धर्म और राजनीति के सम्बंधों की समस्या भी जुड़ गयी है. समस्या अन्य समूहों में भी है लेकिन उसका रूप भिन्न है. दक्षिण अमरीका में वह आत्मरक्षा की है. गैर अरब अफ्रीका में समस्या यह है कि राज्यों की सीमाएँ पुराने उपनिवेशों की ही सीमाएँ हैं, जिसके फ़लस्वरूप राज्यों के अन्दर प्रतिद्वन्द्विताएँ भी उभरी हैं और कई राज्यों में बटे हुए समान सांस्कृतिक परम्परा वाले लोगों के बीच एकता की इच्छा भी. उत्तरी अफ्रीका के लोगों के लिए यह तो मुमकिन है कि वे अरब और अफ्रीकी राजनीति में मेल बिठा सकें, लेकिन उनकी राजनीति अफ्रीकी है या इस्लामी, इसके बीच तो उन्हें चुनाव करना ही पड़ेगा.
हिंदुस्तान में, खास तौर पर बँगलादेश के मुक्ति संग्राम से धीरे धीरे मामला साफ़ होता नज़र आता है कि इस्लाम को राजनीति का आधार बना कर नहीं चलाया जा सकता. मलयेशिया और इंडोनेशिया में यह समस्या पहले से ही ग़भीर नहीं है.
एशिया को वास्तव में हम दो हिस्सों में बाँट सकते हैं, उत्तर और दक्षिण. सोवियत संघ का एशियाई भाग, जापान और अब चीन, इनमें पाराम्परिक समाज में परिवर्तन हुए हैं. दक्षिण एशिया अब भी पाराम्परिक है. वास्तव में गोरी सभ्यता के चलते, पाराम्परिक समाज किस सीमा तक जा सकते हैं, जापान, एशियाई सोवियत गणराज्य और चीन इसके उदाहरण हैं. ये उदाहरण भी ऐसे नहीं हैं जो हर जगह लागू किये जा सकते हों. सामन्ती जापान साम्रज्यवाद फाशीवाद के मार्ग से हो कर पूँजीवादी लोकतंत्र तक पहुँचा है. यह मार्ग अपवाद ही हो सकता है, नियम नहीं. दूसरे अगर यहाँ सन्तोष की बात कोई है तो यही कि जापान कम से कम शक्तिशाली तो बन गया है. किसी वक्त जापान में फाशीवाद के उदय की एक व्याख्या शिन्तो धर्म के सन्दर्भ में भी की गयी थी. जापानी सम्राट सूर्यपुत्र हैं और जापानी लोगों पर ईश्वर की विषेश अनुकम्पा है, जनसाधारण के इस विश्वास के कारण जापानी शासक वर्ग लोगों को फाशीवाद के कठोर सैनिक अनुशासन में बाँध सका. लेकिन अगर यह सच हो तो फ़िर जापान में पूँजीवादी लोकतंत्र का आधार भी शिन्तो धर्म को ही मानना पड़ेगा. वास्तविकता इसके सर्वथा विपरीत है. शिन्तो धर्म से न फाशीवाद का उदय हुआ न पूँजीवादी लोकतंत्र का. बल्कि गोरी सभ्यता की राजनीतिक व्यवस्थाओं को अपनाने के फ़लस्वरूप स्वयं जापानी समाज का चरित्र बदल गया है. पाराम्परिक संस्कृति के अवशेष अभी हैं, लेकिन ऐसे अवशेष तो युरोप के हर देश में भी हैं, जो पूँजीवाद विकास की होड़ में जापान से बहुत पहले शामिल हुए थे.
सोवियत संघ के एशियाई हिस्से में भी ऐसे परिवर्तन हुए हैं कि अब उन्हें पराम्परिक समाज कहना सही नहीं होगा. सोवियत संघ एक ऐसा संयुक्त परिवार है जिसके बजुर्ग उसके युरोपीय सदस्य हैं, और उनमें भी "कर्ता" का स्थान मस्क्वा के इलाके को हासिल है. सोवियत संघ के एशियाई गणराज्यों की हैसियत पिछले पचास सालों में परिवार के "आश्रितों" की रही है, और जहाँ तक भविष्य को देखा जा सकता है इस स्थिति में परिवर्तन की कोई सम्भावना नहीं दिखाई देती. रूस की साम्यवादी तानाशाही की व्याख्या भी अक्सर बाइज़ेनटाइन सभ्यता के संदर्भ में की गयी है. लेकिन फ़िर वर्तमान मध्य एशिया की व्याख्या समरकंद के संदर्भ में कैसे होगी? मार्कसवाद की युरोप केंद्रित दृष्टि के कारण साम्यवाद के अंतर्गत इसके अलावा और कुछ हो भी नहीं सकता कि गोरी सभ्यता के बाहर के लोग बच्चे जैसे समझे जायें और साम्यवाद उनकी प्रगति में सहायक हो. लेकिन इस प्रक्रिया में सम्बंधित ग़ैर युरोपीय समूहों का व्यक्तित्व भले बदल जाये, युरोप के साथ बराबरी नामुमकिन है.
साम्यवादी चीन में चल रही उथल पथल शायद मूलतः इस स्थिति के खिलाफ़ विद्रोह की अभिव्यक्ति है. पूर्वी युरोप के छोटे छोटे देशों को या अज़रबाइजान और उज़बेकिस्तान के आश्रित बना कर रखा जा सकता था. लेकिन विशालकाय चीन को नहीं. साम्यवादी चीन ने जो विकल्प चुना है वह बहुत कुछ वैसा ही है जैसे दोनो महायुद्धों के बीच की अविधि में जापान ने चुना था. तमाम अटकलों और अख़बारी पतंगबाज़ी को छोड़ दें तो आखिर में तथ्य यही सामने आता है कि साम्यवादी चीन में दल और सेना की मिली जुली तानाशाही स्थापित हो रही है जिसका लक्ष्य एक ऐसे शासक वर्ग का निर्माण करना है जिसमें दल और सेना के अलावा, विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले चुने हुए लोग हों. आगे चल कर इनमें भी कोई फर्क न रह जाये. दल के चुने हुए नेता, सेना के चुने हुए लोग भी हों, और विभिन्न उत्पादन क्षेत्रों के चुने हुए लोग भी. क्राँतिकारी परिषद का हर सदस्य एक साथ ही राजनीतिक कार्यकर्ता भी हो, सैनिक भी, उत्पादक भी. इस तरह चीन और क्यूबा के बीच का सैद्धांतिक फ़र्क घटा है.
चीन की साम्यवादी तानाशाही की व्याख्या अब कुछ लोग कन्फूशियस के व्यवहारवाद के सन्दर्भ में करने लगे हैं, खास तौर पर भारतीय अध्यात्मिकता की तुलना में. लेकिन जापान और रूस की तरह, इस व्याख्या का भी कोई खास मतलब नहीं है. मैं समझता हूँ कि अगर भारत में किसी प्रकार की कोई तानाशाही स्थापित हो जाये, तो जातिप्रथा के सन्दर्भ में उसकी व्याख्या बहुत आसानी से की जा सकेगी और उतनी ही एकाँगी तथा बेमतलब होगी. बहरहाल, चीन में जो नयी तानाशाही बन रही है, संस्कृति समेत चीन के पारम्परिक जीवन को नष्ट कर देना उसका घोषित उद्देश्य है, ताकि एक बिल्कुल नयी संस्कृति का निर्माण किया जा सके. लेकिन सैनिक, राजनीतिक, आर्थिक तानाशाही के द्वारा निर्मित संस्कृति, वह भी सारी दुनिया की एक ही संस्कृति, इससे अधिक राक्षिसी कल्पना और क्या हो सकती है?
भारत, पाकिस्तान से ले कर लाओस, कम्बोदिया और इंडोनेशिया तक एक संस्कृति क्षेत्र है. वियतनाम उस क्षेत्र और चीन के बीच का संधिक्षेत्र है. पारम्परिक समूहों के सामने इस समय जो समस्या है, वह अपने सभी रूपों में इस क्षेत्र में वर्तमान है. अमेज़न के जँगलों और एन्डीस पर्वतमाला में दुनिया से कटे हुए अमरीकी आदिवासियों की तरह, इस क्षेत्र में भी ऐसे आदिवासी समूह हैं जो इतिहास की आक्रामक लहरों से बचने के लिए जंगलों पहाड़ों में छिप गये, और अभी भी बाहर की दुनिया से उनका कोई सम्बंध नहीं है. ऐसे समूह भी हैं जिनकी तुलना अफ्रीकी पारम्परिक समूहों से की जा सकती है, वे बाहर की दुनिया से कटे हुए नहीं हैं, लेकिन जिनका सामाजिक संगठन अब भी वही पुराना पारम्परिक और पौराणिक है. बाहरी दुनिया के साथ सम्पर्क उनके पारम्परिक जीवन में दरारें पैदा कर रहा है. जंगलों की जगह बागानो और खादानो ने ले ली है. शराब अब उत्सव का अंग नहीं रही, उदासी से भागने का उपाय बन गयी है. स्वच्छंद जीवन को बाहरी दुनिया के सम्पर्क ने यौन रोगों से ज़हरीला बना दिया. फ़िर भी उनका पारम्परिक जीवन उन्हें ऐसी सुरक्षा प्रदान करता है जिसमें जीवन का रस बिल्कुल सूख नहीं गया है, लेकिन कब तक.
इसके अलावा इस क्षेत्र में दुनिया के चारों बड़े धर्म (इस्लाम, मसीही धर्म और बौद्ध धर्म के अलावा हिन्दू धर्म भी) सक्रिय हैं. हिन्दूस्तान में आधी सदी से अधिक समय तक हिन्दू मस्लिम तनाव अपनी चरम परिणितियों तक जा कर अब बँगला देश मुक्ति संग्राम के जरिये शायद ऐसी जगह आ रहा है जहाँ दोनो धर्मों के बीच एक नया सम्नवयपूर्ण सम्बंध संभव होगा. युरोपीय केन्द्रों से संचालित मसीही धर्म इस क्षेत्र में बहुत अधिक नहीं फ़ैल सका, लेकिन जहाँ वह अपने पाँव जमा सका (जैसे भारत के उत्तर पूर्वी कबाइली इलाके में) वहाँ उसने काफ़ी जहरीले बीज बोये. वियतनाम में उसका असर रहा है. लेकिन गोरी सभ्यता को मसीही धर्म से कहीं अधिक सहायता इस क्षेत्र के उस प्रभावशाली वर्ग से मिली है (यहाँ भी किसी हद तक अफ्रीकी शासक वर्ग से तुलना की जा सकती है) जिसने धर्म तो नहीं बदला, लेकिन भाषा, रहन सहन, पोशाक और उपभोग में गोरों की नकल करना सीख लिया है. यह एक तरह की असंस्कृतिकरण की प्रक्रिया है जो आधुनिकरण के नाम पर चलाई जा रही है. अगर यह सफल हो जाये तो किसी की कोई भाषा नहीं रह जायेगी, लोग बहुत कुछ उसी भाषा का इस्तेमाल करने लगेंगे जो किसी समय अँग्रेज साहबों के खानसामा साहबों के साथ इस्तेमाल किया करते थे. संभव है कि मेरी बात कुछ अत्युक्तिपूर्ण लगे लेकिन भाषा के छिछली और अर्थहीन होने के खतरे के बारे में कोई शक नहीं है. अभी ही हमारी भाषा बहुत हद तक पंगु हो गयी है. पारम्परिक जीवन में परिवर्तन के नाम पर रोज़ नये नये बाबा, सिद्ध, योगी, महायोगी और अवतार जन्म लेते रहेंगे. कीर्तन, भजन, जागरण, यज्ञ, मंदिरों में चढ़ावा, यह सब चलता रहेगा, बल्कि बलि की प्रथा फ़िर चल सकती है. लेकिन पारम्परिक धर्म के मूल्य नष्ट होने की कौन कहे, लोग धीरे धीरे भूलते जायेंगे कि कोई मूल्य थे भी. हिन्दुस्तान की गर्मी में, मई जून के महीने में आधुनिक व्यक्ति कोट पतलून पहने, टाई बाँधे, तो अब भी देखे जा सकते हैं. यह तो जंगलीपन भी नहीं है, आदमी का चिम्पांजी की सतह पर उतर जाना है.
संक्षेप में दक्षिण एशिया के क्षेत्र में एक ओर तो सामाजिक संगठन के विभिन्न स्तरों पर जमे हुए रूप हैं, दूसरी ओर विभिन्न पाराम्परिक धर्मों के परस्पर सम्बंधों में समन्वय की समस्या है, तीसरे समाज और धर्म दोनो में व्याप्त जड़ता है और चौथे गोरी सभ्यता का हमला है जो अप्रत्यक्ष साम्राज्यवाद का रूप लेने के बाद और भी तीव्र हो गया है. इस हमले की शुरुआत होती है अर्थव्यवस्था के तथाकथित आधुनिकीकरण से, जिसमें स्थानीय अर्थ व्यवस्था की पूरक और सहायक मात्र रह जाती है, मुख्यतः सस्ता श्रम और कच्चा माल देने वाली और नतीजे के तौर पर अन्ततः यही लक्ष्य पहली और आखिरी कसौटी बन जाता है, जिसमें आदमी चिम्पांजी से बहुत बेहतर स्थिति में नहीं रहता.
दुनिया के अन्य पाराम्परिक समूहों के सामने भी इसी तरह की चुनौतियाँ हैं, लेकिन किसी अन्य क्षेत्र में चारों एक साथ नहीं हैं. गोरी दुनिया ने जो विकल्प रखे हैं, उनके अलावा पारम्परिक समूहों के सामने एक ही विकल्प है, आन्तरिक परिवर्तन के द्वारा शक्ति और गतिशीलता हासिल करना. कैसे? इसका ज़वाब विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को खुद ही खोजना पड़ेगा. दक्षिण एशिया में चुनौती सबसे गम्भीर है, क्या इससे यह सोचा जा सकता है दक्षिण एशिया के लोग दूसरों की अपेक्षा ज़्यादा जल्दी सचेत होंगे और कुछ करेंगे? मैं इसकी आशा करता हूँ, लेकिन इस आशा के कारण जितने वस्तुपरक हैं, शायद उतने ही वैयक्तिक भी. बहरहाल, कुछ न करने के नतीजे मैं जो देख पाता हूँ, उनको समझ लेने के बाद उन्हें स्वीकार करने की कल्पना तो मैं तभी कर सकता हूँ जब मैं खूद अपनी और अपने बच्चों की चिम्पांजी बनने की नियती को स्वीकार कर लूँ, जो जाहिर है मैं नहीं कर सकता.
मेरे अपने मन में इस लेख ने बहुत से प्रश्न उठाये, कुछ बातों से असहमती लगी, टाईप करते करते, मन ही मन उनसे बहस कर रहा था.
आधुनिक इतिहास और पारम्परिक समूहों का भविष्य, भाग 2
ओमप्रकाश दीपक (1971 के आसपास)
गोरी सभ्यता के बाहर दुनिया के लोगों का भविष्य क्या है, इस सवाल का जवाब खोजने से पहले हम इस तथ्य को देख सकते हैं कि ईसा पूर्व की छठी शताब्दी में जन्में बौद्ध धर्म ने जब दीक्षा ले कर धर्म परिवर्तन की व्यवस्था शुरु की, तो उसने धर्म और पारम्परिक संगठन में एक बड़ी क्रांती का सूत्रपात किया. तब तक राज्य, धर्म, संस्कृति और सामाजिक संगठन में सब मिल कर एक इकाई का निर्माण करते थे. धर्म में न केवल आदमी का सम्पूर्ण व्यक्तित्व बल्कि उसके सामाजिक सम्बंध भी आ जाते थे. बौद्ध धर्म ने आध्यात्मिक व्यक्तित्व को सामाजिक सम्बंधों से अलग किया. बौद्ध धर्म ने इसे सम्भव बनाया कि एक दिन पहले तक की नगरवधू, दूसरे दिन भिक्षुणी बन गयी. लेकिन इसके अलावा, बौद्ध धर्म का दार्शनिक आधार पाराम्परिक, पौराणिक समाजों के दार्शनिक आधार के काफ़ी निकट था कि वहाँ जहाँ कहीं भी फ़ैला, पराम्परिक धर्मों के साथ घुल मिल गया. संभर्ष न हुए हों ऐसा नहीं, लेकिन एक तो पाराम्परिक धर्मों की तरह बौद्ध धर्म की भी कोई एक किताब नहीं, दूसरे स्वयं बुद्ध भी ज्ञान की ऐसी अवस्था के प्रतीक हैं जिसे प्राप्त करना दूसरों के लिए भी असम्भव नहीं माना गया. "धर्म परिवर्तन" की व्यवस्था के बावजूद बौद्ध धर्म मूलतः व्यक्तिवादी है.
पाँच सौ वर्ष बाद जन्मे मसीही धर्म और उसके भी पाँच सौ वर्ष बाद बाद जन्मे इस्लाम का चरित्र भिन्न है. बुद्ध जहाँ रास्ता है, ईसा मूलतः माता है, मसीहा है. और मसीही धर्म संगठन उनका प्रतीक है, प्रतिनिधि है. पैगम्बर मोहम्मद "रसूल अल्लाह" हैं, और इस कारण आध्यात्मिकता से ले कर राजनीति तक सभी क्षेत्रों में मनुष्य के मार्ग दर्शक हैं, नेता हैं. मसीही धर्म और इस्लाम दोनो में एक अन्तिमता और एकांतिकता है जो बौद्ध धर्म और पाराम्परिक धर्मों में नहीं है. बहरहाल, यहाँ धर्मों की तुलना करना मेरा उद्देश्य नहीं. मैं इस तथय की ओर ध्यान खींचना चाहता हूँ कि दुनिया की दो तिहाई या और ज़्यादा आबादी अब इन तीन धर्मों के अंतर्गत आ गयी है. यूरोप, दोनो अमेरिका और आस्ट्रेलिया, इन चार महाद्वीपों में तो मसीही धर्म का एकक्षत्र साम्राज्य है. उत्तरी अफ्रीका, पश्चिमी एशिया तथा मध्य एशिया के कुछ भाग उसी तरह मुसलमान हैं. अफ्रीका में सहारा के दक्षिण में मसीही धर्म पराम्परिक धर्मों का स्थान लेने को सचेष्ठ है. दक्षिणी एशिया में इस्लाम, बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म के बीच एक तनावपूर्ण सहअस्तित्व है. चीन, मंगोलिया और जापान में ऐसे ही बौद्ध धर्म, ताओवाद, कन्फ़ूशियस मत और शिन्तो धर्म के बीच सहअस्तित्व है, लेकिन वहाँ दक्षिण एशिया जैसा तनाव नहीं.
ईसाइयों में गोरो से हमे यहाँ मतलब नहीं, क्योंकि गोरी सभ्यता तो उन्हीं की सभ्यता है. ऐसे अधगोरे लोगों को भी छोड़ देना चाहिये जो हर स्तर पर, पूरी तरह गोरी सभ्यता से जुड़ गये हैं. लेकिन इसके बाद ईसाइयों की बड़ी संख्या बची रहती है, गो ईसाइयों की कुल संख्या देखते हुए बहुत अधिक नहीं, दुनिया की आबादी में लगभग एक तिहाई गोरे हैं जिनके अलावा दुनिया में ईसाइयों की संख्या एक मोटे अनुमान के अनुसार पंद्रह बीस करोड़ के बीच हो सकती है. इनमे भी दो हिस्से हैं.
मसीही धर्म के विभिन्न मतों सम्प्रदायों के अपने अपने विशाल केंद्रीय संगठन हैं, जो सारे के सारे, युरोप या उत्तरी अमेरिका से संचालित होते हैं. ये संगठन मसीही धर्म का इस्तेमाल गोरी सभ्यता के एक उपकरण के रूप में करते हैं. युरोपीय भाषाएँ, युरोपीय रहन सहन और पहनावा और गोरी दुनिया के साथ आर्थिक या व्यापार सम्बंध, युरोप से संचालित केंद्रीय संगठनों के हाथ में इन बातों के साथ मसीही धर्म अनिवार्य और अभिन्न रूप में जुड़ा रहता है.
दूसरा हिस्सा ऐसे ईसाइयों का है जो निष्ठावश या अन्य किसी कारणवश ईसाई तो हो गये हैं, या पीढ़ियों से हैं, लेकिन जो मसीही धर्म के माध्यम से गोरी सभ्यता के साथ नहीं जुड़े, बल्कि जिन्होंने मसीही धर्म को अपने पाराम्परिक जीवन में समाविष्ट कर लिया, कहीं कहीं तो अपने पाराम्परिक धर्म में ही ईसा, मरियम और ईसाई सन्तों को भी उन्होंने अपने देवी देवताओं के बीच यथास्थान प्रतिष्ठित कर दिया.
कुछ ऐसे क्षेत्र भी हैं, मुख्यतः अफ्रीका में इथियोपिया और भारत में केरल, जहाँ युरोप में मसीही धर्म संगठन से सर्वथा स्वतंत्र, डेढ़ हज़ार साल या और ज़्यादा अर्से से ईसाइयों की बस्तियाँ चली आ रही हैं. इस दूसरी कोटी के सभी तरह के ईसाइयों को पराम्परिक समूहों में ही गिनना चाहिये.
इन मामलों की जानकारी में बड़ी जबर्दस्त कमी है. संयुक्त राज्य अमरीका में अब मुश्किल से पांच दस लाख के बीच आदिवासी बचे हैं, वह अभी भी अमरीकी समाज का अंग नहीं बन पाये हैं. उनकी औसत आमदनी ढाई तीन सौ डालर सालाना है (इससे दस गुनी आय तक के लोग सरकारी परिभाषा के अनुसार ग़रीब माने जाते हैं). अपनी धार्मिक मान्यताओं और धार्मिक संस्कारों को वे यथासंभव दूसरों से गुप्त रखते हैं. लेकिन उनमें ऐसे लोग बहुत कम हैं जो अपने पाराम्परिक समाज से कट गये हों. उनके गांव पहले जैसे नहीं, उनकी पौशाक पहले जैसी नहीं, और आम तौर पर उन्होंने अंग्रेज़ी बोलना सीख लिया है. लेकिन उसके अलावा उन्होंने अपने चारों ओर एक दीवार खड़ी कर रखी हैजिसमें किसी बाहरी आदमी का घुस पाना मुश्किल है. उस दायरे के अंदर पाराम्परिक नाच और अन्य संस्कार होते हैं. युद्ध (कोरिया या वियतनाम) से लौटने वाले सैनिक का कबाइली पुरोहित के द्वारा शुद्धि संस्कार होता है. लेकिन कब तक? क्या गोरे अमरीकी समाज में समा जाने के अलावा इनकी कोई और नियति भी हो सकती है? उसकी कल्पना करना कठिन है लेकिन स्वयं उनमें ऐसे लोग हैं जो ऐसा सोचते हैं कि गोरे लोग सार्थक ढंग से जीना नहीं जानते, आदिवासी उन्हें सिखा सकते हैं.
मध्य और दक्षिणी अमरीका का युरोपीय नामकरण "लातिनी अमरीका" अपने आप में औपनिवेशिक दिमाग का सूचक है, क्योंकि समूचे क्षेत्र में गोरों का अनुपात एक चौथाई से अधिक नहीं होगा. इससे यह ऐतिहासिक तथ्य भी छिपा रह जाता है कि उत्तरी अमरीका की तरह दक्षिणी अमरीका में भी आदिवासियों को या तो समूल नष्ट कर दिया गया है या जंगल पहाड़ और रेगिस्तान में जा कर सिर छिपाने को बाध्य कर दिया गया है. अर्जेन्टीना, उरुग्वे और दक्षिणी ब्राज़ील में अब आदिवासी नहीं के बाराबर ही रह गये हैं. चिली में भी आदिवासी तो नहीं रह गये, लेकिन बहुसंख्या गोरों की है या मिश्रित रक्त वालों की, उसके बारे में कुछ बहस है.
आदिवासियों की कुल संख्या कितनी है, इसका कुछ ठीक पता नहीं. लेकिन कुल आबादी में उनका अनुपात भी मोटे तौर पर एक चौथाई आँका जाता है. शेष आधी आबादी मिश्रित रक्त वालों की है. गोरे और मिश्रित रक्त वाले लगभग सारे ही ईसाई हैं. आदिवासियों में भी ईसाईयों की संख्या काफ़ी है. समूचे क्षेत्र में रोमक कैथोलिक मत का एकाधिपत्य है. यहाँ पाराम्परिक समूहों की स्थिति पर विचार करते समय धर्म और रक्त मिश्रण दोनो को ही ध्यान में रखना ज़रूरी है. मेक्सिको ही शायद एकमात्र ऐसा देश है जिसने कम से कम सांस्कृतिक स्तर पर अपने को पुरानी आदिवासी सभ्यताओं से जोड़ने की चेष्टा की है. लेकिन वहाँ की साक्षरता की कसौटी स्पेनी भाषा है, और राजनीतिक आर्थिक जीवन में बहुसंख्यक आदिवासी शक्ति केंद्रों से कटे हुए हैं. धर्म के क्षेत्र में एक किसी हद तक सतही होने पर भी काफ़ी महत्वपूर्ण मिसाल गुआडेलोप की प्रसिद्ध मरियम की मूर्ति है जिसमें मरियम गोरी नहीं हैं, अमरीकी आदिवासी हैं और गिरजाघर में प्रतिष्ठित मूर्तियों में एक मूर्ति आदिवासियों के पाराम्परिक सांस्कृतिक देवता की भी है. लेकिन मेक्सिको में भी पहाड़ी और रेगिस्तानी इलाकों में आदिवासी गरीब और निरक्षर हैं और अब भी अपना पाराम्परिक जीवन बिता रहे हैं.
अन्य देशों में तो आदिवासियों की स्थिति बहुत कुछ अछूतों जैसी है. वे अब भी अपनी प्राचीन भाषाएँ बोलते हैं और इस कारण एक्वाडोर और पेरू जैसे देशों में मताधिकार से भी वंचित हैं - मताधिकार के लिए स्पेनी भाषा का जानना आवश्यक है. इस प्रकार जहाँ उनका समूल नाश नहीं हुआ है, वहाँ भी उनके सामने दो ही विकल्प हैं - अपने पारम्परिक जीवन को त्याग कर अधगोरे बनें और गोरी सभ्यता में दूसरे दर्जे की नागरिकों की हैसियत प्राप्त करें, या जंगलों, पहाड़ों और रेगिस्तानों में अपने पाराम्परिक जीवन की रक्षा करने की चेष्टा करते हुए धीरे धीरे नष्ट हो जायें. इस संदर्भ में मिश्रित रक्त वालों के भी मोटे तौर पर दो हिस्से हैं. एक हिस्सा ऐसा है जो गोरों के साथ जुड़ा रहा है और उनकी शक्ति और सम्पन्नता में कम ज़्यादा हिस्सेदार है. दूसरा हिस्सा ऐसा है जो नाम करने को भले ही ईसाई है, और उसकी नसों में कुछ युरोपीय रक्त भी है लेकिन अन्यथा उसकी स्थिति भी आदिवासियों जैसी ही है और उसके सामने भी वही विकल्प हैं.
अफ्रीका के पारम्परिक समूहों के बारे में जानकारी और भी कम है. एक अनुमान के अनुसार अफ्रीका की आबादी में आधे मुसलमान हैं, एक तिहाई ईसाई और शेष, यानि कुल आबादी का केवल छठा भाग ही पारम्परिक धर्मों को मानने वाला रह गये हैं. लेकिन कुछ अफ्रीकी सूत्रों के अनुसार अफ्रीका की तीस करोड़ से कुछ अधिक आबादी में आठ दस करोड़ के बीच मुसलमान हैं, पाँच सात करोड़ के बीच ईसाई. अगर यह अनुमान सच है तो अफ्रीका की आबादी में लगभग 40-50 प्रतिशत लोग अब भी अपने पाराम्परिक धर्मों को मानते हैं.
लेकिन इन ऊपरी तथ्यों से अलग इस बारे में कोई मतभेद नहीं है के उत्तरी अफ्रीका के अरब देशों को छोड़ कर, आम तौर पर अफ्रीकी लोगों ने जहाँ इस्लाम या मसीही धर्म को स्वीकार कर लिया है वहाँ भी इससे उनकी पाराम्परिक जीवन पद्धिति में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं हुआ है. पिछले कुछ दशकों में, खास तौर पर मसीही धर्म के सम्बंध में, दो प्रवृतियाँ विषेश रूप से दिखाई पड़ी हैं. एक तो सम्भवतः राष्ट्रवाद के प्रभाव के कारण, युरोप स्थित केंद्रों के नियंत्रण से मुक्त, स्वतंत्र अफ्रीकी धर्म संगठनों के निर्माण के आंदोलन बड़े पैमाने पर हुए हैं. अफ्रीकी धर्म और दर्शन के एक ईसाई अध्यापक के अनुसार इस तरह के लगभग पाँच हज़ार संगठन पूरे महाद्वीप में बने हैं, जबकि युरोपीय केंद्रों से सम्बद्ध मसीही धर्म संगठनों की संख्या लगभग एक हज़ार है. स्वतंत्र धर्म संगठनों के अनुयायियों की संख्या अफ्रीकी ईसाईयों में कितनी हो गयी है, इसकी जानकारी नहीं है. दूसरे ऐसा भी काफ़ी बड़े पैमाने पर हुआ है कि मसीही धर्म स्वीकार करने के कुछ समय बाद लोग फ़िर अपने पाराम्परिक धर्मों में वापस चले जाते हैं. यहाँ भी हम ईसाईयों की एक दुविधा देख सकते हैं. एक स्तर पर युरोप से स्वतंत्र होने की चेष्टा, रानीतिक अधिक है, सांस्कृतिक कम. अगर आर्थिक संगठन और आर्थिक विकास के संदर्भ में लक्ष्य गोरी सभ्यता की नकल करना ही रहता है, तो अफ्रीका के मसीही धर्म संगठन स्वतंत्र भले ही जायें, अफ्रीकी लोगों का पराम्परिक जीवन कायम नहीं रह सकता. यह बात उन लोगों के लिए भी सच है जो धर्मों को अब भी मानते हैं. और मूलतः उनके सामने भी वही समस्या है जो मध्य और दक्षिणी अमरीका के आदिवासी समूहों के सामने है. इतना फर्क शायद है कि अफ्रीका में गोरों और मिश्रित रक्त वालों की संख्या बहुत कम होने के कारण पारम्परिक अफ्रीकी समूहों के समूल नष्ट होने की संभावना नहीं है. लेकिन अगर नाश नहीं, तो सड़न. गोरी सभ्यता की बंदर नकल (जिसकी प्रवृति अफ्रीकी शासक वर्ग में भी बड़े पैमाने पर दिखाई देती है) या सड़न, अभी तो यही विकल्प दिखायी देते हैं.
इस्लाम बड़े धर्मों में सबसे नया, और सबसे अधिक राजनीतिक है. मसीही धर्म के पोप मूलतः धार्मिक नेता रहे हैं, जिनकी राजनीतिक शक्ति धीरे धीरे घटती रही है, गो अब भी आम तौर पर जैसा समझा जाता है उससे बहुत अधिक है. लेकिन इस्लाम के ख़लीफ़ा मुख्यतः राजनेता थे जिनका कर्तव्य इस्लाम के प्रचार और और उसकी रक्षा के लिए राजशक्ति का इस्तेमाल करना था. धर्म संगठन की शक्ति धर्म की व्याख्या करने वाले उलमाओं के हाथ में थी और अब भी है. लेकिन इस्लाम रंगीन चमड़ी वाले लोगों का धर्म है और इसलिए राजनीतिक दृष्टि से दुर्बल है. इस्लाम के सामने इस कारण मुख्य समस्या आंतरिक है. फ़िलहाल इस्लाम में इतनी शक्ति नहीं है कि राजशक्ति के इस्तेमाल से सारी दुनिया को मुसलमान बनाने की बात सोची जाये. आंतरिक शक्ति का भी विकास होने पर यह सोचना भी संभव होता कि इस्लाम को राजनीति से उसी तरह जोड़ा जाये जैसे गोरी सभ्यता अभी भी मसीही धर्म से जुड़ी है. कुछ लोगो ने सारी दुनिया में इस्लाम और मसीही धर्म के गँठजोड़ की कल्पना भी की है. लेकिन यह तमाम बातें वस्तुस्थिति के संदर्भ में अयथार्थ प्रतीत होती हैं, क्योंकि इस्लामी समाज स्वयं एक प्रकार का पाराम्परिक समाज बन गया है, स्थिर, गतिहीन. इस्लाम का ह्वास चूँकि पिछले छः सौ सालों में ही हुआ है, इस कारण मुसलमानों के लिए इस तथ्य को स्वीकार करने में एक तरह की मानसिक अड़चन आती है कि अन्य धर्मों की तरह इस्लाम के आध्यातमिक और मानवीय मूल्यों का महत्व भी कम होगा, लेकिन इस्लामी कानून और इस्लामी राजनीति के आधार पर नयी दुनिया नहीं बनायी जा सकती. फ़िर भी यह एक असलियत है कि गैर अरब अफ्रीका में, हिन्दुस्तान में, मलयेशिया और इन्दोनेशिया में, इन क्षेत्रों के पाराम्परिक धर्मों के साथ इस्लाम का समन्वय उसी प्रकार हुआ है कि धार्मिक भावनाओं का आवेग छोड़ दें तो इन देशों के मुसलमानों और अन्य लोगों में कोई बुनियादी अंतर नहीं है. जिन देशों की सारी आबादी मुसलमान है, वे भी पाराम्परिक समाज ही हैं, चाहे मोरोक्को हो या मिस्र, ईरान हो या सऊदी अरब. इस्लाम की समस्या कुछ ज़्यादा पेचीदा इस कारण हो जाती है कि आर्थिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के साथ यहां धर्म और राजनीति के सम्बंधों की समस्या भी जुड़ गयी है. समस्या अन्य समूहों में भी है लेकिन उसका रूप भिन्न है. दक्षिण अमरीका में वह आत्मरक्षा की है. गैर अरब अफ्रीका में समस्या यह है कि राज्यों की सीमाएँ पुराने उपनिवेशों की ही सीमाएँ हैं, जिसके फ़लस्वरूप राज्यों के अन्दर प्रतिद्वन्द्विताएँ भी उभरी हैं और कई राज्यों में बटे हुए समान सांस्कृतिक परम्परा वाले लोगों के बीच एकता की इच्छा भी. उत्तरी अफ्रीका के लोगों के लिए यह तो मुमकिन है कि वे अरब और अफ्रीकी राजनीति में मेल बिठा सकें, लेकिन उनकी राजनीति अफ्रीकी है या इस्लामी, इसके बीच तो उन्हें चुनाव करना ही पड़ेगा.
हिंदुस्तान में, खास तौर पर बँगलादेश के मुक्ति संग्राम से धीरे धीरे मामला साफ़ होता नज़र आता है कि इस्लाम को राजनीति का आधार बना कर नहीं चलाया जा सकता. मलयेशिया और इंडोनेशिया में यह समस्या पहले से ही ग़भीर नहीं है.
एशिया को वास्तव में हम दो हिस्सों में बाँट सकते हैं, उत्तर और दक्षिण. सोवियत संघ का एशियाई भाग, जापान और अब चीन, इनमें पाराम्परिक समाज में परिवर्तन हुए हैं. दक्षिण एशिया अब भी पाराम्परिक है. वास्तव में गोरी सभ्यता के चलते, पाराम्परिक समाज किस सीमा तक जा सकते हैं, जापान, एशियाई सोवियत गणराज्य और चीन इसके उदाहरण हैं. ये उदाहरण भी ऐसे नहीं हैं जो हर जगह लागू किये जा सकते हों. सामन्ती जापान साम्रज्यवाद फाशीवाद के मार्ग से हो कर पूँजीवादी लोकतंत्र तक पहुँचा है. यह मार्ग अपवाद ही हो सकता है, नियम नहीं. दूसरे अगर यहाँ सन्तोष की बात कोई है तो यही कि जापान कम से कम शक्तिशाली तो बन गया है. किसी वक्त जापान में फाशीवाद के उदय की एक व्याख्या शिन्तो धर्म के सन्दर्भ में भी की गयी थी. जापानी सम्राट सूर्यपुत्र हैं और जापानी लोगों पर ईश्वर की विषेश अनुकम्पा है, जनसाधारण के इस विश्वास के कारण जापानी शासक वर्ग लोगों को फाशीवाद के कठोर सैनिक अनुशासन में बाँध सका. लेकिन अगर यह सच हो तो फ़िर जापान में पूँजीवादी लोकतंत्र का आधार भी शिन्तो धर्म को ही मानना पड़ेगा. वास्तविकता इसके सर्वथा विपरीत है. शिन्तो धर्म से न फाशीवाद का उदय हुआ न पूँजीवादी लोकतंत्र का. बल्कि गोरी सभ्यता की राजनीतिक व्यवस्थाओं को अपनाने के फ़लस्वरूप स्वयं जापानी समाज का चरित्र बदल गया है. पाराम्परिक संस्कृति के अवशेष अभी हैं, लेकिन ऐसे अवशेष तो युरोप के हर देश में भी हैं, जो पूँजीवाद विकास की होड़ में जापान से बहुत पहले शामिल हुए थे.
सोवियत संघ के एशियाई हिस्से में भी ऐसे परिवर्तन हुए हैं कि अब उन्हें पराम्परिक समाज कहना सही नहीं होगा. सोवियत संघ एक ऐसा संयुक्त परिवार है जिसके बजुर्ग उसके युरोपीय सदस्य हैं, और उनमें भी "कर्ता" का स्थान मस्क्वा के इलाके को हासिल है. सोवियत संघ के एशियाई गणराज्यों की हैसियत पिछले पचास सालों में परिवार के "आश्रितों" की रही है, और जहाँ तक भविष्य को देखा जा सकता है इस स्थिति में परिवर्तन की कोई सम्भावना नहीं दिखाई देती. रूस की साम्यवादी तानाशाही की व्याख्या भी अक्सर बाइज़ेनटाइन सभ्यता के संदर्भ में की गयी है. लेकिन फ़िर वर्तमान मध्य एशिया की व्याख्या समरकंद के संदर्भ में कैसे होगी? मार्कसवाद की युरोप केंद्रित दृष्टि के कारण साम्यवाद के अंतर्गत इसके अलावा और कुछ हो भी नहीं सकता कि गोरी सभ्यता के बाहर के लोग बच्चे जैसे समझे जायें और साम्यवाद उनकी प्रगति में सहायक हो. लेकिन इस प्रक्रिया में सम्बंधित ग़ैर युरोपीय समूहों का व्यक्तित्व भले बदल जाये, युरोप के साथ बराबरी नामुमकिन है.
साम्यवादी चीन में चल रही उथल पथल शायद मूलतः इस स्थिति के खिलाफ़ विद्रोह की अभिव्यक्ति है. पूर्वी युरोप के छोटे छोटे देशों को या अज़रबाइजान और उज़बेकिस्तान के आश्रित बना कर रखा जा सकता था. लेकिन विशालकाय चीन को नहीं. साम्यवादी चीन ने जो विकल्प चुना है वह बहुत कुछ वैसा ही है जैसे दोनो महायुद्धों के बीच की अविधि में जापान ने चुना था. तमाम अटकलों और अख़बारी पतंगबाज़ी को छोड़ दें तो आखिर में तथ्य यही सामने आता है कि साम्यवादी चीन में दल और सेना की मिली जुली तानाशाही स्थापित हो रही है जिसका लक्ष्य एक ऐसे शासक वर्ग का निर्माण करना है जिसमें दल और सेना के अलावा, विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले चुने हुए लोग हों. आगे चल कर इनमें भी कोई फर्क न रह जाये. दल के चुने हुए नेता, सेना के चुने हुए लोग भी हों, और विभिन्न उत्पादन क्षेत्रों के चुने हुए लोग भी. क्राँतिकारी परिषद का हर सदस्य एक साथ ही राजनीतिक कार्यकर्ता भी हो, सैनिक भी, उत्पादक भी. इस तरह चीन और क्यूबा के बीच का सैद्धांतिक फ़र्क घटा है.
चीन की साम्यवादी तानाशाही की व्याख्या अब कुछ लोग कन्फूशियस के व्यवहारवाद के सन्दर्भ में करने लगे हैं, खास तौर पर भारतीय अध्यात्मिकता की तुलना में. लेकिन जापान और रूस की तरह, इस व्याख्या का भी कोई खास मतलब नहीं है. मैं समझता हूँ कि अगर भारत में किसी प्रकार की कोई तानाशाही स्थापित हो जाये, तो जातिप्रथा के सन्दर्भ में उसकी व्याख्या बहुत आसानी से की जा सकेगी और उतनी ही एकाँगी तथा बेमतलब होगी. बहरहाल, चीन में जो नयी तानाशाही बन रही है, संस्कृति समेत चीन के पारम्परिक जीवन को नष्ट कर देना उसका घोषित उद्देश्य है, ताकि एक बिल्कुल नयी संस्कृति का निर्माण किया जा सके. लेकिन सैनिक, राजनीतिक, आर्थिक तानाशाही के द्वारा निर्मित संस्कृति, वह भी सारी दुनिया की एक ही संस्कृति, इससे अधिक राक्षिसी कल्पना और क्या हो सकती है?
भारत, पाकिस्तान से ले कर लाओस, कम्बोदिया और इंडोनेशिया तक एक संस्कृति क्षेत्र है. वियतनाम उस क्षेत्र और चीन के बीच का संधिक्षेत्र है. पारम्परिक समूहों के सामने इस समय जो समस्या है, वह अपने सभी रूपों में इस क्षेत्र में वर्तमान है. अमेज़न के जँगलों और एन्डीस पर्वतमाला में दुनिया से कटे हुए अमरीकी आदिवासियों की तरह, इस क्षेत्र में भी ऐसे आदिवासी समूह हैं जो इतिहास की आक्रामक लहरों से बचने के लिए जंगलों पहाड़ों में छिप गये, और अभी भी बाहर की दुनिया से उनका कोई सम्बंध नहीं है. ऐसे समूह भी हैं जिनकी तुलना अफ्रीकी पारम्परिक समूहों से की जा सकती है, वे बाहर की दुनिया से कटे हुए नहीं हैं, लेकिन जिनका सामाजिक संगठन अब भी वही पुराना पारम्परिक और पौराणिक है. बाहरी दुनिया के साथ सम्पर्क उनके पारम्परिक जीवन में दरारें पैदा कर रहा है. जंगलों की जगह बागानो और खादानो ने ले ली है. शराब अब उत्सव का अंग नहीं रही, उदासी से भागने का उपाय बन गयी है. स्वच्छंद जीवन को बाहरी दुनिया के सम्पर्क ने यौन रोगों से ज़हरीला बना दिया. फ़िर भी उनका पारम्परिक जीवन उन्हें ऐसी सुरक्षा प्रदान करता है जिसमें जीवन का रस बिल्कुल सूख नहीं गया है, लेकिन कब तक.
इसके अलावा इस क्षेत्र में दुनिया के चारों बड़े धर्म (इस्लाम, मसीही धर्म और बौद्ध धर्म के अलावा हिन्दू धर्म भी) सक्रिय हैं. हिन्दूस्तान में आधी सदी से अधिक समय तक हिन्दू मस्लिम तनाव अपनी चरम परिणितियों तक जा कर अब बँगला देश मुक्ति संग्राम के जरिये शायद ऐसी जगह आ रहा है जहाँ दोनो धर्मों के बीच एक नया सम्नवयपूर्ण सम्बंध संभव होगा. युरोपीय केन्द्रों से संचालित मसीही धर्म इस क्षेत्र में बहुत अधिक नहीं फ़ैल सका, लेकिन जहाँ वह अपने पाँव जमा सका (जैसे भारत के उत्तर पूर्वी कबाइली इलाके में) वहाँ उसने काफ़ी जहरीले बीज बोये. वियतनाम में उसका असर रहा है. लेकिन गोरी सभ्यता को मसीही धर्म से कहीं अधिक सहायता इस क्षेत्र के उस प्रभावशाली वर्ग से मिली है (यहाँ भी किसी हद तक अफ्रीकी शासक वर्ग से तुलना की जा सकती है) जिसने धर्म तो नहीं बदला, लेकिन भाषा, रहन सहन, पोशाक और उपभोग में गोरों की नकल करना सीख लिया है. यह एक तरह की असंस्कृतिकरण की प्रक्रिया है जो आधुनिकरण के नाम पर चलाई जा रही है. अगर यह सफल हो जाये तो किसी की कोई भाषा नहीं रह जायेगी, लोग बहुत कुछ उसी भाषा का इस्तेमाल करने लगेंगे जो किसी समय अँग्रेज साहबों के खानसामा साहबों के साथ इस्तेमाल किया करते थे. संभव है कि मेरी बात कुछ अत्युक्तिपूर्ण लगे लेकिन भाषा के छिछली और अर्थहीन होने के खतरे के बारे में कोई शक नहीं है. अभी ही हमारी भाषा बहुत हद तक पंगु हो गयी है. पारम्परिक जीवन में परिवर्तन के नाम पर रोज़ नये नये बाबा, सिद्ध, योगी, महायोगी और अवतार जन्म लेते रहेंगे. कीर्तन, भजन, जागरण, यज्ञ, मंदिरों में चढ़ावा, यह सब चलता रहेगा, बल्कि बलि की प्रथा फ़िर चल सकती है. लेकिन पारम्परिक धर्म के मूल्य नष्ट होने की कौन कहे, लोग धीरे धीरे भूलते जायेंगे कि कोई मूल्य थे भी. हिन्दुस्तान की गर्मी में, मई जून के महीने में आधुनिक व्यक्ति कोट पतलून पहने, टाई बाँधे, तो अब भी देखे जा सकते हैं. यह तो जंगलीपन भी नहीं है, आदमी का चिम्पांजी की सतह पर उतर जाना है.
संक्षेप में दक्षिण एशिया के क्षेत्र में एक ओर तो सामाजिक संगठन के विभिन्न स्तरों पर जमे हुए रूप हैं, दूसरी ओर विभिन्न पाराम्परिक धर्मों के परस्पर सम्बंधों में समन्वय की समस्या है, तीसरे समाज और धर्म दोनो में व्याप्त जड़ता है और चौथे गोरी सभ्यता का हमला है जो अप्रत्यक्ष साम्राज्यवाद का रूप लेने के बाद और भी तीव्र हो गया है. इस हमले की शुरुआत होती है अर्थव्यवस्था के तथाकथित आधुनिकीकरण से, जिसमें स्थानीय अर्थ व्यवस्था की पूरक और सहायक मात्र रह जाती है, मुख्यतः सस्ता श्रम और कच्चा माल देने वाली और नतीजे के तौर पर अन्ततः यही लक्ष्य पहली और आखिरी कसौटी बन जाता है, जिसमें आदमी चिम्पांजी से बहुत बेहतर स्थिति में नहीं रहता.
दुनिया के अन्य पाराम्परिक समूहों के सामने भी इसी तरह की चुनौतियाँ हैं, लेकिन किसी अन्य क्षेत्र में चारों एक साथ नहीं हैं. गोरी दुनिया ने जो विकल्प रखे हैं, उनके अलावा पारम्परिक समूहों के सामने एक ही विकल्प है, आन्तरिक परिवर्तन के द्वारा शक्ति और गतिशीलता हासिल करना. कैसे? इसका ज़वाब विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को खुद ही खोजना पड़ेगा. दक्षिण एशिया में चुनौती सबसे गम्भीर है, क्या इससे यह सोचा जा सकता है दक्षिण एशिया के लोग दूसरों की अपेक्षा ज़्यादा जल्दी सचेत होंगे और कुछ करेंगे? मैं इसकी आशा करता हूँ, लेकिन इस आशा के कारण जितने वस्तुपरक हैं, शायद उतने ही वैयक्तिक भी. बहरहाल, कुछ न करने के नतीजे मैं जो देख पाता हूँ, उनको समझ लेने के बाद उन्हें स्वीकार करने की कल्पना तो मैं तभी कर सकता हूँ जब मैं खूद अपनी और अपने बच्चों की चिम्पांजी बनने की नियती को स्वीकार कर लूँ, जो जाहिर है मैं नहीं कर सकता.
27 मई 2010
आधुनिक इतिहास और पाराम्परिक समूहों का भविष्य (1)
"मैं और मेरा वक्त" आलेख संग्रह के लिए लिखा गया ओम प्रकाश दीपक का यह विश्व की संस्कृति और सभ्यताओं के बीच होड़ तथा प्रभुत्व की आकाक्षाओं के विकास से उन्नीस सौ सत्तर के दशक तक के इतिहास का विषलेषण करते, आलेख का पहला हिस्सा प्रस्तुत है, जिसमें वह पश्चिमी सभ्यता द्वारा, पहले मसीही धर्म के नाम पर और फ़िर तकनीकी प्रगति के नाम पर हुए शोषण की बात करते हैं. यह आलेख शायद 1972-73 के आसपास लिखा गया था, (हस्तलिपि पर कोई तारीख नहीं है).
बहुत सी बातों में आलेख के लिखे जाने से आज तक आये विश्व परिवर्तन की बात सोच कर मुझे इसकी बातें अब भी सार्थक लगती हैं, लेकिन लिखते लिखते मन में प्रश्न भी उठे. जैसे कि तकनीकी को सभ्यता मानना, क्या विज्ञान को सभ्यता मानना नहीं है? पर क्या विज्ञान केवल औज़ार नहीं है, जिसे विभिन्न देशों के लोग अलग अलग तरीकों से इस्तमाल नहीं कर सकते? वैसे ही, जब आधुनिक औद्योगिक सभ्यता की बात होती है, तो मानवाधिकार या फ़िर समाज में नारी का स्थान और स्वतंत्रता, जैसी बातों को कहाँ रखा जाये? मैंने यह आलेख पहले नहीं पढ़ा था, इसलिए यह सोच कर थोड़ा दुख हुआ कि इन बातों पर उनसे बहस नहीं कर पाऊँगा.
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बीसवीं सदी के आरम्भ तक पश्चिम के, यानि गोरी दुनिया के विद्वान युरोप की वर्तमान औपनिवेशिक सभ्यता के बाहर की सभी पुरानी सभ्यताओं का अध्ययन करते नृतत्व शास्त्रीय संग्रहालयों की तरह करते थे, ये जानने की कोशिश में कि यूरोप की गोरी, ईसाई, और औद्योगिक सभ्यता में मनुष्य की चरम, श्रेष्ठतम उपलब्धियों के पहले मनुष्य लड़खड़ाते कदमों से सभ्यता की किन छोटी चोटी सीढ़ियों पर चढ़ा था. यूरोप की नयी सभ्यता के बाहर के समाजों का अध्ययन, मनुष्य के इतिहास से भिन्न "प्राकृतिक इतिहास" विषय के अन्तर्गत किया जाता था. उसमें धर्म का भी शायद कुछ हाथ था, क्योंकि मसीही विश्वास के अनुसार जिन लोगों की पापमुक्ति के लिए ईश्वर ने न कोई मसीहा या पैगम्बर भेजा था, न कोई "किताब" दी थी, वे निश्चय ही यूरोपीय ईसाईसियों से भिन्न कोटी के जीव थे. इसी के अनुसार उन्नीसवीं सदी तक युरोप के "उदार" कहलाने वाले विद्वान भी दुनिया के रंगीन चमड़ी वाले तमाम लोगों को तीन मुख्य हिस्सों में बाँटते थेः "आदिम" समाजों के लोग, जो "सभ्यता" से सर्वथा अपरिचित थे, और बौद्धिक दृष्टि से भी अविकसित थे. मिस्र और पश्चिमी एशिया तथा मध्य और दक्षिणी अमेरिका की पुरानी अनगढ़ सभ्यताएँ, जो बहुत पहले नष्ट हो चुकीं, और इन इलाकों के लोग इन्सान कहलाने के लायक हैं तो धर्म के प्रभाव के कारण - उत्तरी अफ्रीका और पश्चिमी एशिया में इस्लाम, और अमरीका में मसीही धर्म. तीसरे, चीन और हिन्दुस्तान जैसे देशों के "अर्ध सभ्य" लोग.
यूरोपीय देशों के औपनिवेशिक विस्तार के साथ ही इन गैर यूरोपीय क्षेत्रों को ले कर झगड़े भी शुरु हो गये थे, और अक्सर ऐतिहासिक अध्ययन इन झगड़ों को ले कर ही केंन्द्रित रहते थे - स्पेनियों द्वारा रक्त मिश्रिण, या अंग्रेज़ों-फ्राँसीसियों द्वारा सामूहिक हत्या, अमरीकी आदिवासी समाजों को खत़म करने का कौन सा तरीका ज़्यादा बुरा था? एशिया, अफ्रीका और अमरीका में विभिन्न यूरोपीय देशों के आचरण का तुलनात्मक अध्ययन दिलचस्प ही नहीं शिक्षाप्रद भी हो सकता है, लेकिन यहाँ मैं ध्यान इस ओर खींचना चाहता हूँ कि बाकी दुनिया के बारे में यूरोपीय देशों के बीच चाहे जो भी मतभेद रहे हों, एक बात पर सभी सहमत थे कि अगर कुछ गलतियाँ हुई भी थीं, तो ऐतिहासिक दृष्टि से उनका कोई विषेश महत्व नहीं था. औपनिवेशिक साम्राज्यों और विभिन्न क्षेत्रों में बसने या काम करने वाले गोरे व्यवसायियों और पादरियों के माध्यम से मसीही सभ्यता के कल्याणकारी प्रभाव के ज़रिये ही दुनिया के असभ्य और अर्ध सभ्य लोग अपनी बौद्धिक और आध्यात्मिक क्षमता की हद तक सभ्य बन सकते थे. स्वभावतः, उसका तो कोई सवाल नहीं उठता था कि वे कभी सभ्य गोरी जातियों के समकक्ष भी आ सकते थे.
जिसे यूरोप का "नवजागरण" काल कहा जाता है (वास्तव में उसे केवल "जागरण" काल कहना चाहिए) उसके प्रारम्भ होने तक, यानि तैहरवीं चौदहवीं सदी तक, यूरोप के लोगों का सम्पर्क अधिकांश अरब लोगों के साथ ही था, जो उस काल में (11वीं से 18वीं सदी तक) ज्ञान विज्ञान के सभी क्षेत्रों में युरोप के गुरु बन सकते थे. प्राचीन यूनान, खास तौर पर अरस्तु के दर्शन और विज्ञान से युरोपवासियों का वास्तविक परिचय भी स्पेन विजय करने वाले मुसलमान अरबों के माध्यम से हुआ था. उस समय युरोप को, जिसमें नयी स्फूर्ति और शक्ती का संचार हो रहा था, एक चीज़ की कमी बहुत अखर रही थी - इतिहास की. रोम का साम्राज्य, मसीही धर्म का विस्तार, इनमें ऐतिहासिक सामग्री काफ़ी थी, लेकिन मनुष्य की एकमात्र श्रेष्ठतम सभ्यता के लिए पर्याप्त ऐतिहासिक आधार नहीं था. सेन्ट थामस ऐक्वीनास ने अरस्तु के विज्ञान को रोमन कैथोलिक धर्मशास्त्र के साथ जोड़ कर इस कमी को पूरा किया. प्राचीन यूनान की बौद्धिकता, रोम साम्राज्य का संगठन, और मसीही धर्म, इन महान आधारों पर निर्मित होने और उनकी उत्तराधिकारी होने का दावा करने वाली युरोपीय सभ्यता मनुष्य की एकमात्र सभ्यता हो गयी, अन्य सभ्यताएँ तो केवल "अर्ध सभ्यताएँ" थीं, अक्षम समूहों का असफल प्रयत्न.
इस संदर्भ में क्या युरोप के सामूहिक अवचेतन की किसी हीन भावना के कारण ही युरोप की मूलतः औपनिवेशिक सभ्यता के विद्वानों का दिमाग बराबर इतिहास दर्शन पर, इतिहास की व्याख्या करने की चेष्टाओं पर केंद्रित रहा है? आधुनिक युरोपीय सभ्यता के मूल उत्स से इन चेष्टाओं का कोई सम्बंध हो, यह ज़रूरी नहीं. बल्कि कोई महत्वपूर्ण सम्बंध शायद नहीं ही है. लेकिन इतिहास की व्याख्याओं में आम तौर पर और जो भी विवाद रहे हों, एक बात पर व्यापक सहमति रही है कि सभ्यता का अर्थ है युरोप और वह हमेशा से विश्व का नेता और गुरु रहा है. (भारत को विश्व गुरु का दर्जा देने दिलाने के इच्छुक लोग ज़रा इस तरह की बातों पर सोचा करें तो अच्छा हो.) इतिहास दर्शन की यह परम्परा उन्नीसवीं सदी के अन्त तक चलती रही, और मार्क्स शायद इसके अंतिम प्रवक्ता थे. एक विश्व व्यवस्था के रूप में पूँजीवाद के विस्तार और समाजवादी क्रांती में यह अन्तर्निहित था कि इस क्रम में युरोपीय सभ्यता अन्य "असभ्य" समाजों में जागरण लाती हुई (पहले पूँजीवादी, फ़िर समाजवादी रूपों में) विश्व सभ्यता बन जायेगी.
बीसवीं सदी की पहली चौथाई में ही यूरोप उत्तरी अमरीका के कुछ संवेदनशील लोगों के दृष्टिकोण में कुछ परिवर्तन दिखाई देने लगा. इसकी अभिव्यक्ति अगर एक स्तर पर स्पेंगलर की "डिक्लाईन ओफ दी वेस्ट" में हुई तो दूसरे स्तर पर ही एस. इलियट की "वैस्टलैंड" में. 1939-45 के युद्ध के पहले हिन्दुस्तान, चीन और मेक्सिको की राजनीतिक घटनाओं का, और काफ़ी हद तक तुर्की, मिस्र तथा कुछ दक्षिण अमरीकी देशों में होने वाली हलचलों का भी प्रभाव पड़ा. पुरातत्व, नृतत्व शास्त्र, समाजशास्त्र और मनोविज्ञान में हुए अध्ययन और खोजकार्य से भी दृष्टिसुधार में सहायता मिली. बहरहाल दूसरे महायुद्ध के तत्काल बाद 1945 और 1950 के बीच के पाँच वर्षों में ऐसा प्रतीत हुआ जैसे युरोप उत्तरी अमरीका में कम से कम, चोटी के विद्वानों में, एक नये बौद्धिक वातावरण का निर्माण हुआ है जिसमें युरोपीय श्रेष्ठता की भावना का पूर्ण रूप से परित्याग कर दिया गया है. उसमें दार्शिनकों और इतिहासकारों दोनों ने ही प्रमुख योग दिया.
इस नये बौद्धिक वातावरण की एक ख़ास मिसाल (यूँ इसके बहुसंख्यक उदाहरण हैं) अमरीकी दार्शनिक नारथ्राप की "दी मीटिंग आफ़ ईस्ट ऐन्ड वेस्ट" में देखी जा सकती है जिसके पहले अध्याय के प्रारम्भिक वाक्यों में ही 1939-45 के युद्ध के बारे में कहा गया है कि "ठीक ठीक कहें तो यह पहला विश्व युद्ध है." (रेखांकन मूल पुस्तक में) अर्थात 1914-18 का युद्ध विश्व युद्ध नहीं था, केवल युरोपीय देशों का आपस में युद्ध था. यहां यह आपत्ती उठायी जा सकती है कि 1939-45 का युद्ध भी विश्व युद्ध नहीं था, मूलतः 1914-18 के युद्ध का ही भौगोलिक दृष्टि से अधिक विस्तृत रूप था. इस भौगोलिक विस्तार के कारण उसे विश्व युद्ध कहना उचित है या नहीं, इसकी बहस यहाँ अप्रसांगिक होगी. नारथ्राप की बात का असली महत्व इस स्पष्ट स्वीकृति में है कि यूरोप के लोग एक लम्बे अरसे से अपने अनुभवों को, अपनी संस्थाओं और अवधारणाओं को, जो यूरोपीय सभ्यता के बाहर वैध या सार्थक नहीं थीं, बिल्कुल नकली और गलत ढंग से सार्विकता का जामा पहना कर सारी दुनिया पर लागू करते चले आ रहे थे.
लेकिन यह बौद्धिक वातावरण कायम नहीं रहा. इसका मूल कारण यही है कि कुछ ख़ास व्यक्तियों और छोटे छोटे समूहों को छोड़ कर, जिनका अपने समाज पर कोई निर्णायक प्रभाव नहीं है, इस बौद्धिक वातावरण के पीछे मूल भावना भय की थी. दो बड़े युद्धों और उनके बीच होने वाली घटनाओं ने गोरी दुनिया के अंदर यह भय उत्पन्न कर दिया कि उनकी सभ्यता कहीं आत्महत्या की ओर तो नहीं बढ़ रही है. अपने आपसी झगड़ों का निपटारा न कर पाने के कारण यूरोप के देश दो बड़े युद्धों में फँसे, जिनमें यूरोप की अपार क्षति हुई. 1905 में रूस पर जापान की विजय आधुनिक युग में किसी यूरोपीय महाशक्ति पर किसी एशियाई देश की पहली विजय थी, और दोनो युद्धों के बीच जापान स्वयं एक औद्यौगिक और सामरिक महाशक्ति बन गया था. 1947 की क्रांती के बाद, कम से कम पहले दौर में साम्यवादी रूस यूरोपीय सभ्यता से अलग एक नये प्रकार के समाज का निर्माण करता प्रतीत हो रहा था. कई देशों में साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष काफ़ी तीव्र हो गया था, और दूसरे महायुद्ध में हालैन्ड, बेलजियम और फ्रांस की पराजय से उनके उपनिवेशों की स्वतंत्रता वैसे ही अनिवार्य प्रतीत होने लगी थी जैसे डेढ़ सौ साल पहले नेपोलियन के हाथों स्पेन की पराजय के बाद स्पेन के अमरीकी उपनिवेशों की स्वतंत्रता अनिवार्य हो गयी थी.
लेकिन 1950 के बाद यह भय दूर हो गया. मार्शल योजना के फलस्वरूप पश्चिमी यूरोप के देश शीघ्र ही दोबारा अपने पावों पर खड़े हो गये, बल्कि उनकी समृद्धि उत्तरोतर बढ़ने लगी. रूस अमरीका के शीत युद्ध और उसके फलस्वरूप यूरोप के विभाजन से चाहे जो भी तनाव पैदा हुए, इससे यह भी साबित हो गया कि सोवियत रूस का लक्ष्य यूरोपीय सभ्यता का शक्तिशाली अंग बनना ही था. पराजित जापान में यूरोपीय राजनीतिक संस्थाओं और समाजिक संगठन के प्रतिरोपण में कोई कठिनाई अमरीका को नहीं हुई.
1950 के बाद यह भी स्पष्ट हो गया कि दूसरे महायुद्ध के बाद स्वतंत्र होने वाले देशों से गोरी सभ्यता को कोई खतरा नहीं था. अमरीका में उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में स्वतंत्र होने वाले देशों को संयुक्त राज्य अमरीका ने तत्काल अपने संरक्षण में ले लिया था. मेक्सिको से ले कर चिली तक मध्य और दक्षिणी अमरीका के बीस देशों में से अधिकांश में नये शासक या तो स्पेन पुर्तगाल से आ कर बसे हुए लोग थे या मिश्रित रक्त के लोग. समूचे महाद्वीप के आदिवासियों का राजनीतिक सामाजिक संगठन बिखर गया था. मेक्सिको के जुआरेज़ को छोड़ कर सारे महाद्वीप में एक भी बड़ा आदिवासी नेता सामने नहीं आया. स्वतंत्र राज्यों में भी आदिवासी पहले की तरह शक्ति केन्द्रों से दूर, गरीबी और शोषण के शिकार रहे. मसीही धर्म नये राज्यों के साथ भी जुड़ा रहा. शायद केवल मेक्सिको में ही उसने एक विशिष्ठ रूप ग्रहण किया. लेकिन मेक्सिको में भी राज्यशक्ति अधिकांश गोरे अधगोरे लोगों के हाथ में ही केंद्रित रही. विदेशी सत्ता को समाप्त करने में आदिवासियों ने बहुधा प्रमुख योग दिया, लेकिन देश में शक्ति और सत्ता एक यूरोप अभिमुख अभिजात वर्ग में ही केंद्रित रही.
एशिया और अफ्रीका में जातीय स्थिति ऐसी नहीं थी. लेकिन बीसवीं सदी के उत्तरार्ध तक, चार सौ साल दुनिया में राज करने के बाद गोरी सभ्यता ने सारी दुनिया की स्थिति को चार बुनियादी मामलों में बदल डाला था - जापान के अपवाद को छोड़ कर, तमाम रंगीन चमड़ी वाले लोगों की उत्पादन व्यवस्थाएँ नष्ट हो गयीं थीं. उनकी जगह ऐसी व्यवस्थाओं ने ले ली थी जिनका उद्देश्य यूरोप की ओद्योगिक व्यवस्था की ज़रूरतों को पूरा करना था. दूसरे गोरों की आबादी का अनुपात दुनिया की आबादी के दसवें हिस्से से बढ़ कर तीसरे हिस्से पर पहुँच गया था. (इसपर क़यामत है कि अच्छे भले लोग रंगीन चमड़ी के लोगों में जनसंख्या वृद्धि को विश्व युद्ध के खतरे के बाद दुनिया का सबसे बड़ा खतरा मनाते हैं!) तीसरे, साम्राज्यवाद के ज़रिये गोरी सभ्यता ने अपनी उत्पादन प्रणाली का ऐसा विकास कर लिया कि गोरे मज़दूर की औसत उत्पादकता एशिया अफ्रीका के मज़दूर से बीस गुनी तक अधिक हो गयी. चौथे, उपनिवेशवाद ने अपने अधीन सभी देशों में नौकरशाही, व्यापार और सेना में एक ऐसे छोटे से वर्ग का निर्माण किया जो बोली, रहन सहन, और सतही विचारों में (जीवन के बुनियादी मूल्य नहीं) गोरे लोगों की बन्दर नकल को ही जीवन की श्रेष्ठतम उपलब्धि मानने लगा. यह वर्ग पहले उपनिवेशवाद को कायम रखने का औज़ार था, फ़िर स्वतंत्र देशों में गोरी दुनिया के अप्रत्यक्ष साम्राज्यवाद को क़ायम रखने का औज़ार बन गया.
साम्यवादी चीन ने मूलतः वही मार्ग अपनाया है जो दूसरे महायुद्ध के पहले जापान ने अपनाया था - क्रूर सैनिक राजनीतिक तानाशाही के माध्यम से शक्ति और साधनों का केन्द्रीकरण, और इस केन्द्रित शक्ति के इस्तेमाल सामरिक शक्ति का विकास करके अपने को विश्व के राष्ट्रों के बीच एक महाशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करना. विस्तारवाद का परिचय तो साम्यवादी चीन ने 1950 में तिब्बत पर सैनिक अभियान के द्वारा कब्ज़ा करके ही दे दिया था. भारतीय भूमि पर अधिकार और 1962 में भारत पर आक्रमण उसी नीति की कणियाँ थीं. चीन को इतनी सफलता मिली है कि आम तौर पर उसे अब एक महाशक्ति के रूप में स्वीकार कर लिया गया है. अमरीका द्वारा चीन से सम्बंध सुधारने की कोशिश, सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता और संयुक्त राष्ट्र संघ से ताइवान का निष्कासन इस स्विकृति के औपचारिक परिणाम हैं. अब यह अपेक्षा की जा सकती है कि चीन धीरे धीरे सम्पूर्ण दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव क्षेत्र स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील होगा.
इस सिलसिले का नतीज़ा बुनियादी तौर पर यह निकला है कि गोरी सभ्यता ही अब भी "असली" सभ्यता है, और सारी दुनिया को उसी के अनुरूप अपना विकास करना है. लेकिन आग्रह बदल गया है. अब यह सभ्यता उन्नीसवीं सदी की, या बीसवीं सदी कके पहले दशकों की "मसीही" सभ्यता नहीं है, वरन् "आधुनिक औद्योगिक" सभ्यता है. लेकिन इससे रंगीन चमड़ी वाले लोगों की दिक्कतें किसी तरह कम नहीं होतीं. अभी भी कुछ ऐसे लोग हैं जिनकी गिनती "आधुनिक" विचारकों में होती है, जो यह मानते हैं कि दुनिया के गोरे लोग अन्य लोगों से श्रेष्ठ हैं. कारण बदल गये हैं. गोरे लोग श्रेष्ठ ईसा मसीह की कृपा से नहीं हैं वरन् इस लिए हैं कि अपनी सभ्यता के माध्यम से वे दुनिया के अन्य सभी लोगों से श्रेष्ठ प्राणी के रूप में विकसित हुए हैं - प्राणीशास्त्रीय विकासवाद के अनुसार.
इसके समकक्ष, राजनीति में, अफ्रीकी महाद्वीप के दक्षिणी भाग में कालाहारी मरुस्थल के चारों ओर, इन श्रेष्ठ गोरों के द्वारा एक नये शक्तिकेंद्र का निर्माण किया जा रहा है. ब्रितानिया, हालैंड और पुर्तगाल से आ कर बसे लोग ज़िम्बाबवे (द. रोडेशिया), दक्षिणी अफ्रीका, नामिबिया (दक्षिणी पश्चिमी अफ्रीका), अंगोला और मोज़ाम्बीक में मिल कर गोरी सभ्यता के एक नये गढ़ का निर्माण कर रहे हैं. यह सभ्यता अपने इस गढ़ में "मसीही" भी है, "औद्योगिक" भी, "गोरी" भी. और यहाँ कैथोलिक-प्रोटेस्टेंट, लोकतंत्र-तानाशाही, लातिन-ऐग्लोसेक्सन, इन सब का कोई महत्व वास्तव में है नहीं, महत्व है सिर्फ यूरोपीय वंशज होने का.
बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो सिद्धांत रूप में अब गोरी दुनिया की श्रेष्ठता का दावा नहीं करते. लेकिन यह सब निहायत भले और सज्जन लोग, यह मान कर चलते हैं कि औद्योगिक विकास ही सभ्यता का आधार है. जाने अनजाने यह भूल कर कि जिसे "आधुनिक" औद्योगिक व्यवस्था कहा जाता है, वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष साम्राज्यवाद के माध्यम से ही निर्मित हुई है. यह भले लोग निहायत मासूमियत के साथ दुनिया के तमाम ग़रीब देशों की तरफ़ देख कर सवाल उठाते हैं - इनका औद्योगिक विकास क्यों नहीं हो रहा? अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, सामाजिक मनोविज्ञान, राजनीति, सभी दृष्टियों और पहलुओं से इस प्रश्न पर विचार करने के बाद यह सज्जन मूलतः इसी नतीजे पर पहुँचते हैं कि रंगीन चमड़ी वाले लोग अपना आधुनिकीकरण करें, तभी उनमें औद्योगिक विकास हो सकता है. "पाराम्परिक समाजों का आधुनिकीकरण" यह पश्चिमी चिंतन की एक केंद्रीयसमस्या बन गयी है. यह समस्या ही इसी लिए है कि तथाकथित "पाराम्परिक" समाजों की कुछ खासियतें ऐसी हैं, जो उनके आधुनिकीकरन में बाधक हैं. इस चिंतन के नतीजे अलग अलग निकलते हैं. कुछ शुभचिंतक कहते हैं कि जो अपना आधुनिकीकरण नहीं करेंगे, नुकसान उन्हीं का होगा. कुछ को तकलीफ़ होती है कि पश्चिमी सभ्यता सार्विकता के अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पा रही. कुछ की राय में पाराम्परिक समाजों में बस इतना ही परिवर्तन काफ़ी है कि उनमें औद्योगीकरण हो सके. लेकिन औद्योगीकरण की स्वतःस्फूर्त प्रक्रिया के लिए, कुछ लोगों की राय में आमूल और व्यापक परिवर्तन आवश्यक है, यानी आधुनिक मूल्यों की प्रतिष्ठा के बिना औद्योगीकरण भी नहीं हो सकता, गो ये "मूल्य" कौन से हैं इस पर सहमती केवल एक बात को ले कर है - तकनालाजी. यूरोप उत्तरी अमरीका की उत्पादन पद्धति आधुनिकता की बुनियादी शर्त है.
घूम फिर कर हम फिर उसी जगह वापस आ गये हैं. चार सौ साल तक बाक़ी दुनिया को जो अपनी ज़रूरत के मुताबिक गढ़ने की कोशिश, और इसमें बाधक सभी तत्वों कको नष्ट करने के बावज़ूद, बीसवीं सदी में इस दावे को जारी रखना संभव नहीं गया था कि गोरी सभ्यता ही एकमात्र "सभ्यता" है, और यूरोप हमेशा से दुनिया का नेता और गुरु रहा है, अब भी है. लेकिन सिद्धांत रूप में मनुष्य की समानता, और अतीत की अन्य सभ्यताओं की उपलब्धियों की स्वीकृति के बावज़ूद, गोरी सभ्यता अपनी आधुनिक "तकनालाजी" के कारण श्रेष्ठ है, और अगर व्यवहार में दुनिया के लोगों में समानता स्थापित करनी है, तो यह तभी हो सकता है जब सारी दुनिया इस तकनालाजी को अपना ले. अगर रंगीन चमड़ी वाले लोग ऐसा नहीं कर पाते तो ज़ाहिर है कि उनमें, उनके समाजों में, उनकी सभ्यता में कुछ बड़ी कमियाँ हैं. गोरी दुनिया को पहले ख़ुदा ने श्रेष्ठ बनाया, अब तकनालाजी ने श्रेष्ठ बना रखा रखा है.
कुछ थोड़े से गिने चुने लोग पश्चिम में ऐसे भी ज़रूर हैं, जो अगर पूरी तरह अपनी सभ्यता को अस्वीकार नहीं करते (गो पूर्ण अस्वीकृति वाले लोग भी हैं) तो कम से कम उसके वर्तमान रूप की सार्विकता से इन्कार करते हैं. इनमें बहुत तरह के लोग हैं, लेकिन मोटे तौर पर उनमें दो श्रेणियाँ हैं. एक प्रकार के लोग वे हैं जो अनुभव करते हैं कि यूरोप उत्तरी अमरीका के "समृद्ध", "उपभोत्ता" समाज ने न सिर्फ़ आदमी को मशीन का ग़ुलाम बना दिया है, बल्कि उसके मानसिक या आध्यात्मिक जीवन में शून्यता उत्पन्न कर दी है, जिसके फ़लस्वरूप पूरी सभ्यता ही खंडित व्यक्तित्व का शिकार हो गयी है. दूसरी ओर ऐसे लोग हैं जो अनुभव करते हैं कि उनकी पूरी सभ्यता जातीय विषमता और औपनिवेशिक शोषण की नींव पर ही खड़ी है. लेकिन ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है जो इस बात को भी समझते हैं कि यह दोनो पहलू एक दूसरे से बहुत गहरे जुड़े हुए हैं. ऐसे लोगों ने स्वभावतः सभ्यता की समस्या को विश्व संदर्भ में देखा है, और कुछ ने इसे "संस्कृति का संकट" कहा है, इस अर्थ में कि मनुष्य की अब तक की कोई भी सभ्यता ऐसी नहीं रही है कि उसमें मनुष्य का बहुमुखी व्यक्तित्व उसमें पूरी तरह विकसित हो सकता. हर सभ्यता किसी एक दिशा में ही विकसित हुई. फलस्वरूप विश्व का भौगोलिक विभाजन उसका सांस्कृतिक विभाजन भी है.
ऐसी हालत में, किसी ऐसी विश्व सभ्यता का निर्माण क्या संभव है जिसमें दुनिया की अलग अलग संस्कृतियाँ एक दूसरे से सीख कर अपने अभावों की पूर्ती कर सकें? सिद्धांत रूप में अगर इसे मान भी लिया जाये, तो दुनिया की मौजूदा विषमता और भिन्नताओं को देखते हुए, इसे व्यवहार में कैसे लाया जा सकता है? इन प्रश्नों का उत्तर देना आसान नहीं है, और बहुत कम लोगों ने उसका जोख़िम उठाया है. उनकी विषेश चर्चा यहाँ अनावश्यक है. एक ऐतिहासिक अनीवार्यता की चर्चा भी इस संद्रभ में की गयी है - हथियारों की विध्वंसक शक्ति इतनी बढ़ गयी है या फ़िर इन हथियारों का इस्तमाल मौजूदा सभ्यता को ही ख़तम कर देगा. शायद एक विकल्प और भी है - एक शक्ति आधारित अंतर्राष्ट्रीय जाति प्रथा. पिछले पच्चीस वर्षों का इतिहास दिखाता है कि इस तरह की जाति प्रथा चलाई जा सकती है और शक्ति सम्बंधों में परिवर्तन के अनुसार उसमें थोड़ा बहुत हेर फ़ेर भी हो सकता है. मिसाल के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद के अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ा दी गयी क्योंकि संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्य संख्या दोगुनी से भी ज़्यादा हो गयी है. इसके साथ ही अमरीका की हैसियत कुछ घटी है. साम्यवादी चीन दुनिया के द्विज राष्ट्रों की कोटि में आ गया है. लेकिन क्या किसी ऐसी व्यवस्था को अनिश्चित काल के तक चलाया जा सकता है जिसमें स्वयं को अपने निकट अतीत की तुलना में तो लगभग सभी देशों की स्थिति सुधरेगी, लेकिन विभिन्न देशों के बीच विषमता बढ़ती ही चली जायेगी? मिसाल के लिए निकट भविष्य में ही, जापान और जर्मनी की हैसियत का सवाल इस व्यवस्था के लिए बड़ी झंझट पैदा कर सकता है.
बहरहाल ऐतिहासिक अनिवार्यताओं की बात छोड़ें, हर हालत में किसी विश्व सभ्यता का निर्माण और विकास उस समस्या के हल से जुड़ा हुआ है, जिसे "संस्कृति का संकट" कहा गया है, यानि राष्ट्र के अंदर ही नहीं, राष्ट्रों के बीच भी समता हो. सम्भावतः धर्म इस "संस्कृति के संकट" का एक महत्वपूर्ण पक्ष है, यद्यपि पश्चिमी विद्वान अक्सर इस पक्ष की उपेक्षा कर जाते हैं. इधर फ्राँसिसी नृतत्वशास्त्री क्लाउड लेवी स्ट्रास के अध्ययनों ने इस संकट के एक नये आयाम को उजागर किया है - जो समाज अभी तक लगभग सभी लोगों द्वारा असभ्य और जँगली समझे जाते रहे हैं (जो निरक्षर हैं, और जिन्हें लेवी स्ट्रास भी "पूर्व कालिक" कहते हैं) उनकी बौद्धिक प्रक्रियाएँ उतनी ही विकसित और पेचीदा हैं जितनी की "सभ्य" कहलाने वाले समूहों की. अर्थात ये "कबाइली" कहलाने वाला जीवन बिताने वाले लोग भी दरअसल उतने ही सभ्य हैं जितने कि प्राचीन सभ्यताओं के वारिस, या कि वर्तमान गोरी सभ्यता के लोग. लेकिन उनका भविष्य क्या है?
बहुत सी बातों में आलेख के लिखे जाने से आज तक आये विश्व परिवर्तन की बात सोच कर मुझे इसकी बातें अब भी सार्थक लगती हैं, लेकिन लिखते लिखते मन में प्रश्न भी उठे. जैसे कि तकनीकी को सभ्यता मानना, क्या विज्ञान को सभ्यता मानना नहीं है? पर क्या विज्ञान केवल औज़ार नहीं है, जिसे विभिन्न देशों के लोग अलग अलग तरीकों से इस्तमाल नहीं कर सकते? वैसे ही, जब आधुनिक औद्योगिक सभ्यता की बात होती है, तो मानवाधिकार या फ़िर समाज में नारी का स्थान और स्वतंत्रता, जैसी बातों को कहाँ रखा जाये? मैंने यह आलेख पहले नहीं पढ़ा था, इसलिए यह सोच कर थोड़ा दुख हुआ कि इन बातों पर उनसे बहस नहीं कर पाऊँगा.
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बीसवीं सदी के आरम्भ तक पश्चिम के, यानि गोरी दुनिया के विद्वान युरोप की वर्तमान औपनिवेशिक सभ्यता के बाहर की सभी पुरानी सभ्यताओं का अध्ययन करते नृतत्व शास्त्रीय संग्रहालयों की तरह करते थे, ये जानने की कोशिश में कि यूरोप की गोरी, ईसाई, और औद्योगिक सभ्यता में मनुष्य की चरम, श्रेष्ठतम उपलब्धियों के पहले मनुष्य लड़खड़ाते कदमों से सभ्यता की किन छोटी चोटी सीढ़ियों पर चढ़ा था. यूरोप की नयी सभ्यता के बाहर के समाजों का अध्ययन, मनुष्य के इतिहास से भिन्न "प्राकृतिक इतिहास" विषय के अन्तर्गत किया जाता था. उसमें धर्म का भी शायद कुछ हाथ था, क्योंकि मसीही विश्वास के अनुसार जिन लोगों की पापमुक्ति के लिए ईश्वर ने न कोई मसीहा या पैगम्बर भेजा था, न कोई "किताब" दी थी, वे निश्चय ही यूरोपीय ईसाईसियों से भिन्न कोटी के जीव थे. इसी के अनुसार उन्नीसवीं सदी तक युरोप के "उदार" कहलाने वाले विद्वान भी दुनिया के रंगीन चमड़ी वाले तमाम लोगों को तीन मुख्य हिस्सों में बाँटते थेः "आदिम" समाजों के लोग, जो "सभ्यता" से सर्वथा अपरिचित थे, और बौद्धिक दृष्टि से भी अविकसित थे. मिस्र और पश्चिमी एशिया तथा मध्य और दक्षिणी अमेरिका की पुरानी अनगढ़ सभ्यताएँ, जो बहुत पहले नष्ट हो चुकीं, और इन इलाकों के लोग इन्सान कहलाने के लायक हैं तो धर्म के प्रभाव के कारण - उत्तरी अफ्रीका और पश्चिमी एशिया में इस्लाम, और अमरीका में मसीही धर्म. तीसरे, चीन और हिन्दुस्तान जैसे देशों के "अर्ध सभ्य" लोग.
यूरोपीय देशों के औपनिवेशिक विस्तार के साथ ही इन गैर यूरोपीय क्षेत्रों को ले कर झगड़े भी शुरु हो गये थे, और अक्सर ऐतिहासिक अध्ययन इन झगड़ों को ले कर ही केंन्द्रित रहते थे - स्पेनियों द्वारा रक्त मिश्रिण, या अंग्रेज़ों-फ्राँसीसियों द्वारा सामूहिक हत्या, अमरीकी आदिवासी समाजों को खत़म करने का कौन सा तरीका ज़्यादा बुरा था? एशिया, अफ्रीका और अमरीका में विभिन्न यूरोपीय देशों के आचरण का तुलनात्मक अध्ययन दिलचस्प ही नहीं शिक्षाप्रद भी हो सकता है, लेकिन यहाँ मैं ध्यान इस ओर खींचना चाहता हूँ कि बाकी दुनिया के बारे में यूरोपीय देशों के बीच चाहे जो भी मतभेद रहे हों, एक बात पर सभी सहमत थे कि अगर कुछ गलतियाँ हुई भी थीं, तो ऐतिहासिक दृष्टि से उनका कोई विषेश महत्व नहीं था. औपनिवेशिक साम्राज्यों और विभिन्न क्षेत्रों में बसने या काम करने वाले गोरे व्यवसायियों और पादरियों के माध्यम से मसीही सभ्यता के कल्याणकारी प्रभाव के ज़रिये ही दुनिया के असभ्य और अर्ध सभ्य लोग अपनी बौद्धिक और आध्यात्मिक क्षमता की हद तक सभ्य बन सकते थे. स्वभावतः, उसका तो कोई सवाल नहीं उठता था कि वे कभी सभ्य गोरी जातियों के समकक्ष भी आ सकते थे.
जिसे यूरोप का "नवजागरण" काल कहा जाता है (वास्तव में उसे केवल "जागरण" काल कहना चाहिए) उसके प्रारम्भ होने तक, यानि तैहरवीं चौदहवीं सदी तक, यूरोप के लोगों का सम्पर्क अधिकांश अरब लोगों के साथ ही था, जो उस काल में (11वीं से 18वीं सदी तक) ज्ञान विज्ञान के सभी क्षेत्रों में युरोप के गुरु बन सकते थे. प्राचीन यूनान, खास तौर पर अरस्तु के दर्शन और विज्ञान से युरोपवासियों का वास्तविक परिचय भी स्पेन विजय करने वाले मुसलमान अरबों के माध्यम से हुआ था. उस समय युरोप को, जिसमें नयी स्फूर्ति और शक्ती का संचार हो रहा था, एक चीज़ की कमी बहुत अखर रही थी - इतिहास की. रोम का साम्राज्य, मसीही धर्म का विस्तार, इनमें ऐतिहासिक सामग्री काफ़ी थी, लेकिन मनुष्य की एकमात्र श्रेष्ठतम सभ्यता के लिए पर्याप्त ऐतिहासिक आधार नहीं था. सेन्ट थामस ऐक्वीनास ने अरस्तु के विज्ञान को रोमन कैथोलिक धर्मशास्त्र के साथ जोड़ कर इस कमी को पूरा किया. प्राचीन यूनान की बौद्धिकता, रोम साम्राज्य का संगठन, और मसीही धर्म, इन महान आधारों पर निर्मित होने और उनकी उत्तराधिकारी होने का दावा करने वाली युरोपीय सभ्यता मनुष्य की एकमात्र सभ्यता हो गयी, अन्य सभ्यताएँ तो केवल "अर्ध सभ्यताएँ" थीं, अक्षम समूहों का असफल प्रयत्न.
इस संदर्भ में क्या युरोप के सामूहिक अवचेतन की किसी हीन भावना के कारण ही युरोप की मूलतः औपनिवेशिक सभ्यता के विद्वानों का दिमाग बराबर इतिहास दर्शन पर, इतिहास की व्याख्या करने की चेष्टाओं पर केंद्रित रहा है? आधुनिक युरोपीय सभ्यता के मूल उत्स से इन चेष्टाओं का कोई सम्बंध हो, यह ज़रूरी नहीं. बल्कि कोई महत्वपूर्ण सम्बंध शायद नहीं ही है. लेकिन इतिहास की व्याख्याओं में आम तौर पर और जो भी विवाद रहे हों, एक बात पर व्यापक सहमति रही है कि सभ्यता का अर्थ है युरोप और वह हमेशा से विश्व का नेता और गुरु रहा है. (भारत को विश्व गुरु का दर्जा देने दिलाने के इच्छुक लोग ज़रा इस तरह की बातों पर सोचा करें तो अच्छा हो.) इतिहास दर्शन की यह परम्परा उन्नीसवीं सदी के अन्त तक चलती रही, और मार्क्स शायद इसके अंतिम प्रवक्ता थे. एक विश्व व्यवस्था के रूप में पूँजीवाद के विस्तार और समाजवादी क्रांती में यह अन्तर्निहित था कि इस क्रम में युरोपीय सभ्यता अन्य "असभ्य" समाजों में जागरण लाती हुई (पहले पूँजीवादी, फ़िर समाजवादी रूपों में) विश्व सभ्यता बन जायेगी.
बीसवीं सदी की पहली चौथाई में ही यूरोप उत्तरी अमरीका के कुछ संवेदनशील लोगों के दृष्टिकोण में कुछ परिवर्तन दिखाई देने लगा. इसकी अभिव्यक्ति अगर एक स्तर पर स्पेंगलर की "डिक्लाईन ओफ दी वेस्ट" में हुई तो दूसरे स्तर पर ही एस. इलियट की "वैस्टलैंड" में. 1939-45 के युद्ध के पहले हिन्दुस्तान, चीन और मेक्सिको की राजनीतिक घटनाओं का, और काफ़ी हद तक तुर्की, मिस्र तथा कुछ दक्षिण अमरीकी देशों में होने वाली हलचलों का भी प्रभाव पड़ा. पुरातत्व, नृतत्व शास्त्र, समाजशास्त्र और मनोविज्ञान में हुए अध्ययन और खोजकार्य से भी दृष्टिसुधार में सहायता मिली. बहरहाल दूसरे महायुद्ध के तत्काल बाद 1945 और 1950 के बीच के पाँच वर्षों में ऐसा प्रतीत हुआ जैसे युरोप उत्तरी अमरीका में कम से कम, चोटी के विद्वानों में, एक नये बौद्धिक वातावरण का निर्माण हुआ है जिसमें युरोपीय श्रेष्ठता की भावना का पूर्ण रूप से परित्याग कर दिया गया है. उसमें दार्शिनकों और इतिहासकारों दोनों ने ही प्रमुख योग दिया.
इस नये बौद्धिक वातावरण की एक ख़ास मिसाल (यूँ इसके बहुसंख्यक उदाहरण हैं) अमरीकी दार्शनिक नारथ्राप की "दी मीटिंग आफ़ ईस्ट ऐन्ड वेस्ट" में देखी जा सकती है जिसके पहले अध्याय के प्रारम्भिक वाक्यों में ही 1939-45 के युद्ध के बारे में कहा गया है कि "ठीक ठीक कहें तो यह पहला विश्व युद्ध है." (रेखांकन मूल पुस्तक में) अर्थात 1914-18 का युद्ध विश्व युद्ध नहीं था, केवल युरोपीय देशों का आपस में युद्ध था. यहां यह आपत्ती उठायी जा सकती है कि 1939-45 का युद्ध भी विश्व युद्ध नहीं था, मूलतः 1914-18 के युद्ध का ही भौगोलिक दृष्टि से अधिक विस्तृत रूप था. इस भौगोलिक विस्तार के कारण उसे विश्व युद्ध कहना उचित है या नहीं, इसकी बहस यहाँ अप्रसांगिक होगी. नारथ्राप की बात का असली महत्व इस स्पष्ट स्वीकृति में है कि यूरोप के लोग एक लम्बे अरसे से अपने अनुभवों को, अपनी संस्थाओं और अवधारणाओं को, जो यूरोपीय सभ्यता के बाहर वैध या सार्थक नहीं थीं, बिल्कुल नकली और गलत ढंग से सार्विकता का जामा पहना कर सारी दुनिया पर लागू करते चले आ रहे थे.
लेकिन यह बौद्धिक वातावरण कायम नहीं रहा. इसका मूल कारण यही है कि कुछ ख़ास व्यक्तियों और छोटे छोटे समूहों को छोड़ कर, जिनका अपने समाज पर कोई निर्णायक प्रभाव नहीं है, इस बौद्धिक वातावरण के पीछे मूल भावना भय की थी. दो बड़े युद्धों और उनके बीच होने वाली घटनाओं ने गोरी दुनिया के अंदर यह भय उत्पन्न कर दिया कि उनकी सभ्यता कहीं आत्महत्या की ओर तो नहीं बढ़ रही है. अपने आपसी झगड़ों का निपटारा न कर पाने के कारण यूरोप के देश दो बड़े युद्धों में फँसे, जिनमें यूरोप की अपार क्षति हुई. 1905 में रूस पर जापान की विजय आधुनिक युग में किसी यूरोपीय महाशक्ति पर किसी एशियाई देश की पहली विजय थी, और दोनो युद्धों के बीच जापान स्वयं एक औद्यौगिक और सामरिक महाशक्ति बन गया था. 1947 की क्रांती के बाद, कम से कम पहले दौर में साम्यवादी रूस यूरोपीय सभ्यता से अलग एक नये प्रकार के समाज का निर्माण करता प्रतीत हो रहा था. कई देशों में साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष काफ़ी तीव्र हो गया था, और दूसरे महायुद्ध में हालैन्ड, बेलजियम और फ्रांस की पराजय से उनके उपनिवेशों की स्वतंत्रता वैसे ही अनिवार्य प्रतीत होने लगी थी जैसे डेढ़ सौ साल पहले नेपोलियन के हाथों स्पेन की पराजय के बाद स्पेन के अमरीकी उपनिवेशों की स्वतंत्रता अनिवार्य हो गयी थी.
लेकिन 1950 के बाद यह भय दूर हो गया. मार्शल योजना के फलस्वरूप पश्चिमी यूरोप के देश शीघ्र ही दोबारा अपने पावों पर खड़े हो गये, बल्कि उनकी समृद्धि उत्तरोतर बढ़ने लगी. रूस अमरीका के शीत युद्ध और उसके फलस्वरूप यूरोप के विभाजन से चाहे जो भी तनाव पैदा हुए, इससे यह भी साबित हो गया कि सोवियत रूस का लक्ष्य यूरोपीय सभ्यता का शक्तिशाली अंग बनना ही था. पराजित जापान में यूरोपीय राजनीतिक संस्थाओं और समाजिक संगठन के प्रतिरोपण में कोई कठिनाई अमरीका को नहीं हुई.
1950 के बाद यह भी स्पष्ट हो गया कि दूसरे महायुद्ध के बाद स्वतंत्र होने वाले देशों से गोरी सभ्यता को कोई खतरा नहीं था. अमरीका में उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में स्वतंत्र होने वाले देशों को संयुक्त राज्य अमरीका ने तत्काल अपने संरक्षण में ले लिया था. मेक्सिको से ले कर चिली तक मध्य और दक्षिणी अमरीका के बीस देशों में से अधिकांश में नये शासक या तो स्पेन पुर्तगाल से आ कर बसे हुए लोग थे या मिश्रित रक्त के लोग. समूचे महाद्वीप के आदिवासियों का राजनीतिक सामाजिक संगठन बिखर गया था. मेक्सिको के जुआरेज़ को छोड़ कर सारे महाद्वीप में एक भी बड़ा आदिवासी नेता सामने नहीं आया. स्वतंत्र राज्यों में भी आदिवासी पहले की तरह शक्ति केन्द्रों से दूर, गरीबी और शोषण के शिकार रहे. मसीही धर्म नये राज्यों के साथ भी जुड़ा रहा. शायद केवल मेक्सिको में ही उसने एक विशिष्ठ रूप ग्रहण किया. लेकिन मेक्सिको में भी राज्यशक्ति अधिकांश गोरे अधगोरे लोगों के हाथ में ही केंद्रित रही. विदेशी सत्ता को समाप्त करने में आदिवासियों ने बहुधा प्रमुख योग दिया, लेकिन देश में शक्ति और सत्ता एक यूरोप अभिमुख अभिजात वर्ग में ही केंद्रित रही.
एशिया और अफ्रीका में जातीय स्थिति ऐसी नहीं थी. लेकिन बीसवीं सदी के उत्तरार्ध तक, चार सौ साल दुनिया में राज करने के बाद गोरी सभ्यता ने सारी दुनिया की स्थिति को चार बुनियादी मामलों में बदल डाला था - जापान के अपवाद को छोड़ कर, तमाम रंगीन चमड़ी वाले लोगों की उत्पादन व्यवस्थाएँ नष्ट हो गयीं थीं. उनकी जगह ऐसी व्यवस्थाओं ने ले ली थी जिनका उद्देश्य यूरोप की ओद्योगिक व्यवस्था की ज़रूरतों को पूरा करना था. दूसरे गोरों की आबादी का अनुपात दुनिया की आबादी के दसवें हिस्से से बढ़ कर तीसरे हिस्से पर पहुँच गया था. (इसपर क़यामत है कि अच्छे भले लोग रंगीन चमड़ी के लोगों में जनसंख्या वृद्धि को विश्व युद्ध के खतरे के बाद दुनिया का सबसे बड़ा खतरा मनाते हैं!) तीसरे, साम्राज्यवाद के ज़रिये गोरी सभ्यता ने अपनी उत्पादन प्रणाली का ऐसा विकास कर लिया कि गोरे मज़दूर की औसत उत्पादकता एशिया अफ्रीका के मज़दूर से बीस गुनी तक अधिक हो गयी. चौथे, उपनिवेशवाद ने अपने अधीन सभी देशों में नौकरशाही, व्यापार और सेना में एक ऐसे छोटे से वर्ग का निर्माण किया जो बोली, रहन सहन, और सतही विचारों में (जीवन के बुनियादी मूल्य नहीं) गोरे लोगों की बन्दर नकल को ही जीवन की श्रेष्ठतम उपलब्धि मानने लगा. यह वर्ग पहले उपनिवेशवाद को कायम रखने का औज़ार था, फ़िर स्वतंत्र देशों में गोरी दुनिया के अप्रत्यक्ष साम्राज्यवाद को क़ायम रखने का औज़ार बन गया.
साम्यवादी चीन ने मूलतः वही मार्ग अपनाया है जो दूसरे महायुद्ध के पहले जापान ने अपनाया था - क्रूर सैनिक राजनीतिक तानाशाही के माध्यम से शक्ति और साधनों का केन्द्रीकरण, और इस केन्द्रित शक्ति के इस्तेमाल सामरिक शक्ति का विकास करके अपने को विश्व के राष्ट्रों के बीच एक महाशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करना. विस्तारवाद का परिचय तो साम्यवादी चीन ने 1950 में तिब्बत पर सैनिक अभियान के द्वारा कब्ज़ा करके ही दे दिया था. भारतीय भूमि पर अधिकार और 1962 में भारत पर आक्रमण उसी नीति की कणियाँ थीं. चीन को इतनी सफलता मिली है कि आम तौर पर उसे अब एक महाशक्ति के रूप में स्वीकार कर लिया गया है. अमरीका द्वारा चीन से सम्बंध सुधारने की कोशिश, सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता और संयुक्त राष्ट्र संघ से ताइवान का निष्कासन इस स्विकृति के औपचारिक परिणाम हैं. अब यह अपेक्षा की जा सकती है कि चीन धीरे धीरे सम्पूर्ण दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव क्षेत्र स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील होगा.
इस सिलसिले का नतीज़ा बुनियादी तौर पर यह निकला है कि गोरी सभ्यता ही अब भी "असली" सभ्यता है, और सारी दुनिया को उसी के अनुरूप अपना विकास करना है. लेकिन आग्रह बदल गया है. अब यह सभ्यता उन्नीसवीं सदी की, या बीसवीं सदी कके पहले दशकों की "मसीही" सभ्यता नहीं है, वरन् "आधुनिक औद्योगिक" सभ्यता है. लेकिन इससे रंगीन चमड़ी वाले लोगों की दिक्कतें किसी तरह कम नहीं होतीं. अभी भी कुछ ऐसे लोग हैं जिनकी गिनती "आधुनिक" विचारकों में होती है, जो यह मानते हैं कि दुनिया के गोरे लोग अन्य लोगों से श्रेष्ठ हैं. कारण बदल गये हैं. गोरे लोग श्रेष्ठ ईसा मसीह की कृपा से नहीं हैं वरन् इस लिए हैं कि अपनी सभ्यता के माध्यम से वे दुनिया के अन्य सभी लोगों से श्रेष्ठ प्राणी के रूप में विकसित हुए हैं - प्राणीशास्त्रीय विकासवाद के अनुसार.
इसके समकक्ष, राजनीति में, अफ्रीकी महाद्वीप के दक्षिणी भाग में कालाहारी मरुस्थल के चारों ओर, इन श्रेष्ठ गोरों के द्वारा एक नये शक्तिकेंद्र का निर्माण किया जा रहा है. ब्रितानिया, हालैंड और पुर्तगाल से आ कर बसे लोग ज़िम्बाबवे (द. रोडेशिया), दक्षिणी अफ्रीका, नामिबिया (दक्षिणी पश्चिमी अफ्रीका), अंगोला और मोज़ाम्बीक में मिल कर गोरी सभ्यता के एक नये गढ़ का निर्माण कर रहे हैं. यह सभ्यता अपने इस गढ़ में "मसीही" भी है, "औद्योगिक" भी, "गोरी" भी. और यहाँ कैथोलिक-प्रोटेस्टेंट, लोकतंत्र-तानाशाही, लातिन-ऐग्लोसेक्सन, इन सब का कोई महत्व वास्तव में है नहीं, महत्व है सिर्फ यूरोपीय वंशज होने का.
बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो सिद्धांत रूप में अब गोरी दुनिया की श्रेष्ठता का दावा नहीं करते. लेकिन यह सब निहायत भले और सज्जन लोग, यह मान कर चलते हैं कि औद्योगिक विकास ही सभ्यता का आधार है. जाने अनजाने यह भूल कर कि जिसे "आधुनिक" औद्योगिक व्यवस्था कहा जाता है, वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष साम्राज्यवाद के माध्यम से ही निर्मित हुई है. यह भले लोग निहायत मासूमियत के साथ दुनिया के तमाम ग़रीब देशों की तरफ़ देख कर सवाल उठाते हैं - इनका औद्योगिक विकास क्यों नहीं हो रहा? अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, सामाजिक मनोविज्ञान, राजनीति, सभी दृष्टियों और पहलुओं से इस प्रश्न पर विचार करने के बाद यह सज्जन मूलतः इसी नतीजे पर पहुँचते हैं कि रंगीन चमड़ी वाले लोग अपना आधुनिकीकरण करें, तभी उनमें औद्योगिक विकास हो सकता है. "पाराम्परिक समाजों का आधुनिकीकरण" यह पश्चिमी चिंतन की एक केंद्रीयसमस्या बन गयी है. यह समस्या ही इसी लिए है कि तथाकथित "पाराम्परिक" समाजों की कुछ खासियतें ऐसी हैं, जो उनके आधुनिकीकरन में बाधक हैं. इस चिंतन के नतीजे अलग अलग निकलते हैं. कुछ शुभचिंतक कहते हैं कि जो अपना आधुनिकीकरण नहीं करेंगे, नुकसान उन्हीं का होगा. कुछ को तकलीफ़ होती है कि पश्चिमी सभ्यता सार्विकता के अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पा रही. कुछ की राय में पाराम्परिक समाजों में बस इतना ही परिवर्तन काफ़ी है कि उनमें औद्योगीकरण हो सके. लेकिन औद्योगीकरण की स्वतःस्फूर्त प्रक्रिया के लिए, कुछ लोगों की राय में आमूल और व्यापक परिवर्तन आवश्यक है, यानी आधुनिक मूल्यों की प्रतिष्ठा के बिना औद्योगीकरण भी नहीं हो सकता, गो ये "मूल्य" कौन से हैं इस पर सहमती केवल एक बात को ले कर है - तकनालाजी. यूरोप उत्तरी अमरीका की उत्पादन पद्धति आधुनिकता की बुनियादी शर्त है.
घूम फिर कर हम फिर उसी जगह वापस आ गये हैं. चार सौ साल तक बाक़ी दुनिया को जो अपनी ज़रूरत के मुताबिक गढ़ने की कोशिश, और इसमें बाधक सभी तत्वों कको नष्ट करने के बावज़ूद, बीसवीं सदी में इस दावे को जारी रखना संभव नहीं गया था कि गोरी सभ्यता ही एकमात्र "सभ्यता" है, और यूरोप हमेशा से दुनिया का नेता और गुरु रहा है, अब भी है. लेकिन सिद्धांत रूप में मनुष्य की समानता, और अतीत की अन्य सभ्यताओं की उपलब्धियों की स्वीकृति के बावज़ूद, गोरी सभ्यता अपनी आधुनिक "तकनालाजी" के कारण श्रेष्ठ है, और अगर व्यवहार में दुनिया के लोगों में समानता स्थापित करनी है, तो यह तभी हो सकता है जब सारी दुनिया इस तकनालाजी को अपना ले. अगर रंगीन चमड़ी वाले लोग ऐसा नहीं कर पाते तो ज़ाहिर है कि उनमें, उनके समाजों में, उनकी सभ्यता में कुछ बड़ी कमियाँ हैं. गोरी दुनिया को पहले ख़ुदा ने श्रेष्ठ बनाया, अब तकनालाजी ने श्रेष्ठ बना रखा रखा है.
कुछ थोड़े से गिने चुने लोग पश्चिम में ऐसे भी ज़रूर हैं, जो अगर पूरी तरह अपनी सभ्यता को अस्वीकार नहीं करते (गो पूर्ण अस्वीकृति वाले लोग भी हैं) तो कम से कम उसके वर्तमान रूप की सार्विकता से इन्कार करते हैं. इनमें बहुत तरह के लोग हैं, लेकिन मोटे तौर पर उनमें दो श्रेणियाँ हैं. एक प्रकार के लोग वे हैं जो अनुभव करते हैं कि यूरोप उत्तरी अमरीका के "समृद्ध", "उपभोत्ता" समाज ने न सिर्फ़ आदमी को मशीन का ग़ुलाम बना दिया है, बल्कि उसके मानसिक या आध्यात्मिक जीवन में शून्यता उत्पन्न कर दी है, जिसके फ़लस्वरूप पूरी सभ्यता ही खंडित व्यक्तित्व का शिकार हो गयी है. दूसरी ओर ऐसे लोग हैं जो अनुभव करते हैं कि उनकी पूरी सभ्यता जातीय विषमता और औपनिवेशिक शोषण की नींव पर ही खड़ी है. लेकिन ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है जो इस बात को भी समझते हैं कि यह दोनो पहलू एक दूसरे से बहुत गहरे जुड़े हुए हैं. ऐसे लोगों ने स्वभावतः सभ्यता की समस्या को विश्व संदर्भ में देखा है, और कुछ ने इसे "संस्कृति का संकट" कहा है, इस अर्थ में कि मनुष्य की अब तक की कोई भी सभ्यता ऐसी नहीं रही है कि उसमें मनुष्य का बहुमुखी व्यक्तित्व उसमें पूरी तरह विकसित हो सकता. हर सभ्यता किसी एक दिशा में ही विकसित हुई. फलस्वरूप विश्व का भौगोलिक विभाजन उसका सांस्कृतिक विभाजन भी है.
ऐसी हालत में, किसी ऐसी विश्व सभ्यता का निर्माण क्या संभव है जिसमें दुनिया की अलग अलग संस्कृतियाँ एक दूसरे से सीख कर अपने अभावों की पूर्ती कर सकें? सिद्धांत रूप में अगर इसे मान भी लिया जाये, तो दुनिया की मौजूदा विषमता और भिन्नताओं को देखते हुए, इसे व्यवहार में कैसे लाया जा सकता है? इन प्रश्नों का उत्तर देना आसान नहीं है, और बहुत कम लोगों ने उसका जोख़िम उठाया है. उनकी विषेश चर्चा यहाँ अनावश्यक है. एक ऐतिहासिक अनीवार्यता की चर्चा भी इस संद्रभ में की गयी है - हथियारों की विध्वंसक शक्ति इतनी बढ़ गयी है या फ़िर इन हथियारों का इस्तमाल मौजूदा सभ्यता को ही ख़तम कर देगा. शायद एक विकल्प और भी है - एक शक्ति आधारित अंतर्राष्ट्रीय जाति प्रथा. पिछले पच्चीस वर्षों का इतिहास दिखाता है कि इस तरह की जाति प्रथा चलाई जा सकती है और शक्ति सम्बंधों में परिवर्तन के अनुसार उसमें थोड़ा बहुत हेर फ़ेर भी हो सकता है. मिसाल के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद के अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ा दी गयी क्योंकि संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्य संख्या दोगुनी से भी ज़्यादा हो गयी है. इसके साथ ही अमरीका की हैसियत कुछ घटी है. साम्यवादी चीन दुनिया के द्विज राष्ट्रों की कोटि में आ गया है. लेकिन क्या किसी ऐसी व्यवस्था को अनिश्चित काल के तक चलाया जा सकता है जिसमें स्वयं को अपने निकट अतीत की तुलना में तो लगभग सभी देशों की स्थिति सुधरेगी, लेकिन विभिन्न देशों के बीच विषमता बढ़ती ही चली जायेगी? मिसाल के लिए निकट भविष्य में ही, जापान और जर्मनी की हैसियत का सवाल इस व्यवस्था के लिए बड़ी झंझट पैदा कर सकता है.
बहरहाल ऐतिहासिक अनिवार्यताओं की बात छोड़ें, हर हालत में किसी विश्व सभ्यता का निर्माण और विकास उस समस्या के हल से जुड़ा हुआ है, जिसे "संस्कृति का संकट" कहा गया है, यानि राष्ट्र के अंदर ही नहीं, राष्ट्रों के बीच भी समता हो. सम्भावतः धर्म इस "संस्कृति के संकट" का एक महत्वपूर्ण पक्ष है, यद्यपि पश्चिमी विद्वान अक्सर इस पक्ष की उपेक्षा कर जाते हैं. इधर फ्राँसिसी नृतत्वशास्त्री क्लाउड लेवी स्ट्रास के अध्ययनों ने इस संकट के एक नये आयाम को उजागर किया है - जो समाज अभी तक लगभग सभी लोगों द्वारा असभ्य और जँगली समझे जाते रहे हैं (जो निरक्षर हैं, और जिन्हें लेवी स्ट्रास भी "पूर्व कालिक" कहते हैं) उनकी बौद्धिक प्रक्रियाएँ उतनी ही विकसित और पेचीदा हैं जितनी की "सभ्य" कहलाने वाले समूहों की. अर्थात ये "कबाइली" कहलाने वाला जीवन बिताने वाले लोग भी दरअसल उतने ही सभ्य हैं जितने कि प्राचीन सभ्यताओं के वारिस, या कि वर्तमान गोरी सभ्यता के लोग. लेकिन उनका भविष्य क्या है?
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