27 जुलाई 2010

आधुनिक इतिहास और पारम्परिक समूहों का भविष्य

टिप्पणीः परम्पराओं और परम्परागत समूहों पर धर्म के प्रभाव, उपनिवेशवाद और धर्म के सम्बंध, आने वाले भूमंडलीकरण का आभास और उसका संस्कृति तथा भाषा पर प्रभाव, जैसे विषयों को छूने वाला ओम का यह लेख विश्व के विभिन्न देशों और संस्कृतियों पर विहंगम दृष्टि डालता है और बहुत विचारोत्तेजक है. १९७१ के आसपास लिखे इस आलेख, जो "मैं और मेरा वक्त" नाम के आलेख संग्रह का हिस्सा था, में कही कुछ बातों को इतिहास ने सही साबित किया, कुछ अन्य बातें गलत साबित हुईं. आज के समाजवादी लेखन में भारत में धर्म के विषय पर इस तरह स्पष्ट शब्दों में बात कहना शायद गलत माना जायेगा, और न ही इस तरह के विषयों पर आज कोई बहस संभव है.

मेरे अपने मन में इस लेख ने बहुत से प्रश्न उठाये, कुछ बातों से असहमती लगी, टाईप करते करते, मन ही मन उनसे बहस कर रहा था.

आधुनिक इतिहास और पारम्परिक समूहों का भविष्य, भाग 2
ओमप्रकाश दीपक (1971 के आसपास)

गोरी सभ्यता के बाहर दुनिया के लोगों का भविष्य क्या है, इस सवाल का जवाब खोजने से पहले हम इस तथ्य को देख सकते हैं कि ईसा पूर्व की छठी शताब्दी में जन्में बौद्ध धर्म ने जब दीक्षा ले कर धर्म परिवर्तन की व्यवस्था शुरु की, तो उसने धर्म और पारम्परिक संगठन में एक बड़ी क्रांती का सूत्रपात किया. तब तक राज्य, धर्म, संस्कृति और सामाजिक संगठन में सब मिल कर एक इकाई का निर्माण करते थे. धर्म में न केवल आदमी का सम्पूर्ण व्यक्तित्व बल्कि उसके सामाजिक सम्बंध भी आ जाते थे. बौद्ध धर्म ने आध्यात्मिक व्यक्तित्व को सामाजिक सम्बंधों से अलग किया. बौद्ध धर्म ने इसे सम्भव बनाया कि एक दिन पहले तक की नगरवधू, दूसरे दिन भिक्षुणी बन गयी. लेकिन इसके अलावा, बौद्ध धर्म का दार्शनिक आधार पाराम्परिक, पौराणिक समाजों के दार्शनिक आधार के काफ़ी निकट था कि वहाँ जहाँ कहीं भी फ़ैला, पराम्परिक धर्मों के साथ घुल मिल गया. संभर्ष न हुए हों ऐसा नहीं, लेकिन एक तो पाराम्परिक धर्मों की तरह बौद्ध धर्म की भी कोई एक किताब नहीं, दूसरे स्वयं बुद्ध भी ज्ञान की ऐसी अवस्था के प्रतीक हैं जिसे प्राप्त करना दूसरों के लिए भी असम्भव नहीं माना गया. "धर्म परिवर्तन" की व्यवस्था के बावजूद बौद्ध धर्म मूलतः व्यक्तिवादी है.

पाँच सौ वर्ष बाद जन्मे मसीही धर्म और उसके भी पाँच सौ वर्ष बाद बाद जन्मे इस्लाम का चरित्र भिन्न है. बुद्ध जहाँ रास्ता है, ईसा मूलतः माता है, मसीहा है. और मसीही धर्म संगठन उनका प्रतीक है, प्रतिनिधि है. पैगम्बर मोहम्मद "रसूल अल्लाह" हैं, और इस कारण आध्यात्मिकता से ले कर राजनीति तक सभी क्षेत्रों में मनुष्य के मार्ग दर्शक हैं, नेता हैं. मसीही धर्म और इस्लाम दोनो में एक अन्तिमता और एकांतिकता है जो बौद्ध धर्म और पाराम्परिक धर्मों में नहीं है. बहरहाल, यहाँ धर्मों की तुलना करना मेरा उद्देश्य नहीं. मैं इस तथय की ओर ध्यान खींचना चाहता हूँ कि दुनिया की दो तिहाई या और ज़्यादा आबादी अब इन तीन धर्मों के अंतर्गत आ गयी है. यूरोप, दोनो अमेरिका और आस्ट्रेलिया, इन चार महाद्वीपों में तो मसीही धर्म का एकक्षत्र साम्राज्य है. उत्तरी अफ्रीका, पश्चिमी एशिया तथा मध्य एशिया के कुछ भाग उसी तरह मुसलमान हैं. अफ्रीका में सहारा के दक्षिण में मसीही धर्म पराम्परिक धर्मों का स्थान लेने को सचेष्ठ है. दक्षिणी एशिया में इस्लाम, बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म के बीच एक तनावपूर्ण सह‍अस्तित्व है. चीन, मंगोलिया और जापान में ऐसे ही बौद्ध धर्म, ताओवाद, कन्फ़ूशियस मत और शिन्तो धर्म के बीच सहअस्तित्व है, लेकिन वहाँ दक्षिण एशिया जैसा तनाव नहीं.

ईसाइयों में गोरो से हमे यहाँ मतलब नहीं, क्योंकि गोरी सभ्यता तो उन्हीं की सभ्यता है. ऐसे अधगोरे लोगों को भी छोड़ देना चाहिये जो हर स्तर पर, पूरी तरह गोरी सभ्यता से जुड़ गये हैं. लेकिन इसके बाद ईसाइयों की बड़ी संख्या बची रहती है, गो ईसाइयों की कुल संख्या देखते हुए बहुत अधिक नहीं, दुनिया की आबादी में लगभग एक तिहाई गोरे हैं जिनके अलावा दुनिया में ईसाइयों की संख्या एक मोटे अनुमान के अनुसार पंद्रह बीस करोड़ के बीच हो सकती है. इनमे भी दो हिस्से हैं.

मसीही धर्म के विभिन्न मतों सम्प्रदायों के अपने अपने विशाल केंद्रीय संगठन हैं, जो सारे के सारे, युरोप या उत्तरी अमेरिका से संचालित होते हैं. ये संगठन मसीही धर्म का इस्तेमाल गोरी सभ्यता के एक उपकरण के रूप में करते हैं. युरोपीय भाषाएँ, युरोपीय रहन सहन और पहनावा और गोरी दुनिया के साथ आर्थिक या व्यापार सम्बंध, युरोप से संचालित केंद्रीय संगठनों के हाथ में इन बातों के साथ मसीही धर्म अनिवार्य और अभिन्न रूप में जुड़ा रहता है.

दूसरा हिस्सा ऐसे ईसाइयों का है जो निष्ठावश या अन्य किसी कारणवश ईसाई तो हो गये हैं, या पीढ़ियों से हैं, लेकिन जो मसीही धर्म के माध्यम से गोरी सभ्यता के साथ नहीं जुड़े, बल्कि जिन्होंने मसीही धर्म को अपने पाराम्परिक जीवन में समाविष्ट कर लिया, कहीं कहीं तो अपने पाराम्परिक धर्म में ही ईसा, मरियम और ईसाई सन्तों को भी उन्होंने अपने देवी देवताओं के बीच यथास्थान प्रतिष्ठित कर दिया.

कुछ ऐसे क्षेत्र भी हैं, मुख्यतः अफ्रीका में इथियोपिया और भारत में केरल, जहाँ युरोप में मसीही धर्म संगठन से सर्वथा स्वतंत्र, डेढ़ हज़ार साल या और ज़्यादा अर्से से ईसाइयों की बस्तियाँ चली आ रही हैं. इस दूसरी कोटी के सभी तरह के ईसाइयों को पराम्परिक समूहों में ही गिनना चाहिये.

इन मामलों की जानकारी में बड़ी जबर्दस्त कमी है. संयुक्त राज्य अमरीका में अब मुश्किल से पांच दस लाख के बीच आदिवासी बचे हैं, वह अभी भी अमरीकी समाज का अंग नहीं बन पाये हैं. उनकी औसत आमदनी ढाई तीन सौ डालर सालाना है (इससे दस गुनी आय तक के लोग सरकारी परिभाषा के अनुसार ग़रीब माने जाते हैं). अपनी धार्मिक मान्यताओं और धार्मिक संस्कारों को वे यथासंभव दूसरों से गुप्त रखते हैं. लेकिन उनमें ऐसे लोग बहुत कम हैं जो अपने पाराम्परिक समाज से कट गये हों. उनके गांव पहले जैसे नहीं, उनकी पौशाक पहले जैसी नहीं, और आम तौर पर उन्होंने अंग्रेज़ी बोलना सीख लिया है. लेकिन उसके अलावा उन्होंने अपने चारों ओर एक दीवार खड़ी कर रखी हैजिसमें किसी बाहरी आदमी का घुस पाना मुश्किल है. उस दायरे के अंदर पाराम्परिक नाच और अन्य संस्कार होते हैं. युद्ध (कोरिया या वियतनाम) से लौटने वाले सैनिक का कबाइली पुरोहित के द्वारा शुद्धि संस्कार होता है. लेकिन कब तक? क्या गोरे अमरीकी समाज में समा जाने के अलावा इनकी कोई और नियति भी हो सकती है? उसकी कल्पना करना कठिन है लेकिन स्वयं उनमें ऐसे लोग हैं जो ऐसा सोचते हैं कि गोरे लोग सार्थक ढंग से जीना नहीं जानते, आदिवासी उन्हें सिखा सकते हैं.

मध्य और दक्षिणी अमरीका का युरोपीय नामकरण "लातिनी अमरीका" अपने आप में औपनिवेशिक दिमाग का सूचक है, क्योंकि समूचे क्षेत्र में गोरों का अनुपात एक चौथाई से अधिक नहीं होगा. इससे यह ऐतिहासिक तथ्य भी छिपा रह जाता है कि उत्तरी अमरीका की तरह दक्षिणी अमरीका में भी आदिवासियों को या तो समूल नष्ट कर दिया गया है या जंगल पहाड़ और रेगिस्तान में जा कर सिर छिपाने को बाध्य कर दिया गया है. अर्जेन्टीना, उरुग्वे और दक्षिणी ब्राज़ील में अब आदिवासी नहीं के बाराबर ही रह गये हैं. चिली में भी आदिवासी तो नहीं रह गये, लेकिन बहुसंख्या गोरों की है या मिश्रित रक्त वालों की, उसके बारे में कुछ बहस है.

आदिवासियों की कुल संख्या कितनी है, इसका कुछ ठीक पता नहीं. लेकिन कुल आबादी में उनका अनुपात भी मोटे तौर पर एक चौथाई आँका जाता है. शेष आधी आबादी मिश्रित रक्त वालों की है. गोरे और मिश्रित रक्त वाले लगभग सारे ही ईसाई हैं. आदिवासियों में भी ईसाईयों की संख्या काफ़ी है. समूचे क्षेत्र में रोमक कैथोलिक मत का एकाधिपत्य है. यहाँ पाराम्परिक समूहों की स्थिति पर विचार करते समय धर्म और रक्त मिश्रण दोनो को ही ध्यान में रखना ज़रूरी है. मेक्सिको ही शायद एकमात्र ऐसा देश है जिसने कम से कम सांस्कृतिक स्तर पर अपने को पुरानी आदिवासी सभ्यताओं से जोड़ने की चेष्टा की है. लेकिन वहाँ की साक्षरता की कसौटी स्पेनी भाषा है, और राजनीतिक आर्थिक जीवन में बहुसंख्यक आदिवासी शक्ति केंद्रों से कटे हुए हैं. धर्म के क्षेत्र में एक किसी हद तक सतही होने पर भी काफ़ी महत्वपूर्ण मिसाल गुआडेलोप की प्रसिद्ध मरियम की मूर्ति है जिसमें मरियम गोरी नहीं हैं, अमरीकी आदिवासी हैं और गिरजाघर में प्रतिष्ठित मूर्तियों में एक मूर्ति आदिवासियों के पाराम्परिक सांस्कृतिक देवता की भी है. लेकिन मेक्सिको में भी पहाड़ी और रेगिस्तानी इलाकों में आदिवासी गरीब और निरक्षर हैं और अब भी अपना पाराम्परिक जीवन बिता रहे हैं.

अन्य देशों में तो आदिवासियों की स्थिति बहुत कुछ अछूतों जैसी है. वे अब भी अपनी प्राचीन भाषाएँ बोलते हैं और इस कारण एक्वाडोर और पेरू जैसे देशों में मताधिकार से भी वंचित हैं - मताधिकार के लिए स्पेनी भाषा का जानना आवश्यक है. इस प्रकार जहाँ उनका समूल नाश नहीं हुआ है, वहाँ भी उनके सामने दो ही विकल्प हैं - अपने पारम्परिक जीवन को त्याग कर अधगोरे बनें और गोरी सभ्यता में दूसरे दर्जे की नागरिकों की हैसियत प्राप्त करें, या जंगलों, पहाड़ों और रेगिस्तानों में अपने पाराम्परिक जीवन की रक्षा करने की चेष्टा करते हुए धीरे धीरे नष्ट हो जायें. इस संदर्भ में मिश्रित रक्त वालों के भी मोटे तौर पर दो हिस्से हैं. एक हिस्सा ऐसा है जो गोरों के साथ जुड़ा रहा है और उनकी शक्ति और सम्पन्नता में कम ज़्यादा हिस्सेदार है. दूसरा हिस्सा ऐसा है जो नाम करने को भले ही ईसाई है, और उसकी नसों में कुछ युरोपीय रक्त भी है लेकिन अन्यथा उसकी स्थिति भी आदिवासियों जैसी ही है और उसके सामने भी वही विकल्प हैं.

अफ्रीका के पारम्परिक समूहों के बारे में जानकारी और भी कम है. एक अनुमान के अनुसार अफ्रीका की आबादी में आधे मुसलमान हैं, एक तिहाई ईसाई और शेष, यानि कुल आबादी का केवल छठा भाग ही पारम्परिक धर्मों को मानने वाला रह गये हैं. लेकिन कुछ अफ्रीकी सूत्रों के अनुसार अफ्रीका की तीस करोड़ से कुछ अधिक आबादी में आठ दस करोड़ के बीच मुसलमान हैं, पाँच सात करोड़ के बीच ईसाई. अगर यह अनुमान सच है तो अफ्रीका की आबादी में लगभग 40-50 प्रतिशत लोग अब भी अपने पाराम्परिक धर्मों को मानते हैं.

लेकिन इन ऊपरी तथ्यों से अलग इस बारे में कोई मतभेद नहीं है के उत्तरी अफ्रीका के अरब देशों को छोड़ कर, आम तौर पर अफ्रीकी लोगों ने जहाँ इस्लाम या मसीही धर्म को स्वीकार कर लिया है वहाँ भी इससे उनकी पाराम्परिक जीवन पद्धिति में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं हुआ है. पिछले कुछ दशकों में, खास तौर पर मसीही धर्म के सम्बंध में, दो प्रवृतियाँ विषेश रूप से दिखाई पड़ी हैं. एक तो सम्भवतः राष्ट्रवाद के प्रभाव के कारण, युरोप स्थित केंद्रों के नियंत्रण से मुक्त, स्वतंत्र अफ्रीकी धर्म संगठनों के निर्माण के आंदोलन बड़े पैमाने पर हुए हैं. अफ्रीकी धर्म और दर्शन के एक ईसाई अध्यापक के अनुसार इस तरह के लगभग पाँच हज़ार संगठन पूरे महाद्वीप में बने हैं, जबकि युरोपीय केंद्रों से सम्बद्ध मसीही धर्म संगठनों की संख्या लगभग एक हज़ार है. स्वतंत्र धर्म संगठनों के अनुयायियों की संख्या अफ्रीकी ईसाईयों में कितनी हो गयी है, इसकी जानकारी नहीं है. दूसरे ऐसा भी काफ़ी बड़े पैमाने पर हुआ है कि मसीही धर्म स्वीकार करने के कुछ समय बाद लोग फ़िर अपने पाराम्परिक धर्मों में वापस चले जाते हैं. यहाँ भी हम ईसाईयों की एक दुविधा देख सकते हैं. एक स्तर पर युरोप से स्वतंत्र होने की चेष्टा, रानीतिक अधिक है, सांस्कृतिक कम. अगर आर्थिक संगठन और आर्थिक विकास के संदर्भ में लक्ष्य गोरी सभ्यता की नकल करना ही रहता है, तो अफ्रीका के मसीही धर्म संगठन स्वतंत्र भले ही जायें, अफ्रीकी लोगों का पराम्परिक जीवन कायम नहीं रह सकता. यह बात उन लोगों के लिए भी सच है जो धर्मों को अब भी मानते हैं. और मूलतः उनके सामने भी वही समस्या है जो मध्य और दक्षिणी अमरीका के आदिवासी समूहों के सामने है. इतना फर्क शायद है कि अफ्रीका में गोरों और मिश्रित रक्त वालों की संख्या बहुत कम होने के कारण पारम्परिक अफ्रीकी समूहों के समूल नष्ट होने की संभावना नहीं है. लेकिन अगर नाश नहीं, तो सड़न. गोरी सभ्यता की बंदर नकल (जिसकी प्रवृति अफ्रीकी शासक वर्ग में भी बड़े पैमाने पर दिखाई देती है) या सड़न, अभी तो यही विकल्प दिखायी देते हैं.

इस्लाम बड़े धर्मों में सबसे नया, और सबसे अधिक राजनीतिक है. मसीही धर्म के पोप मूलतः धार्मिक नेता रहे हैं, जिनकी राजनीतिक शक्ति धीरे धीरे घटती रही है, गो अब भी आम तौर पर जैसा समझा जाता है उससे बहुत अधिक है. लेकिन इस्लाम के ख़लीफ़ा मुख्यतः राजनेता थे जिनका कर्तव्य इस्लाम के प्रचार और और उसकी रक्षा के लिए राजशक्ति का इस्तेमाल करना था. धर्म संगठन की शक्ति धर्म की व्याख्या करने वाले उलमाओं के हाथ में थी और अब भी है. लेकिन इस्लाम रंगीन चमड़ी वाले लोगों का धर्म है और इसलिए राजनीतिक दृष्टि से दुर्बल है. इस्लाम के सामने इस कारण मुख्य समस्या आंतरिक है. फ़िलहाल इस्लाम में इतनी शक्ति नहीं है कि राजशक्ति के इस्तेमाल से सारी दुनिया को मुसलमान बनाने की बात सोची जाये. आंतरिक शक्ति का भी विकास होने पर यह सोचना भी संभव होता कि इस्लाम को राजनीति से उसी तरह जोड़ा जाये जैसे गोरी सभ्यता अभी भी मसीही धर्म से जुड़ी है. कुछ लोगो ने सारी दुनिया में इस्लाम और मसीही धर्म के गँठजोड़ की कल्पना भी की है. लेकिन यह तमाम बातें वस्तुस्थिति के संदर्भ में अयथार्थ प्रतीत होती हैं, क्योंकि इस्लामी समाज स्वयं एक प्रकार का पाराम्परिक समाज बन गया है, स्थिर, गतिहीन. इस्लाम का ह्वास चूँकि पिछले छः सौ सालों में ही हुआ है, इस कारण मुसलमानों के लिए इस तथ्य को स्वीकार करने में एक तरह की मानसिक अड़चन आती है कि अन्य धर्मों की तरह इस्लाम के आध्यातमिक और मानवीय मूल्यों का महत्व भी कम होगा, लेकिन इस्लामी कानून और इस्लामी राजनीति के आधार पर नयी दुनिया नहीं बनायी जा सकती. फ़िर भी यह एक असलियत है कि गैर अरब अफ्रीका में, हिन्दुस्तान में, मलयेशिया और इन्दोनेशिया में, इन क्षेत्रों के पाराम्परिक धर्मों के साथ इस्लाम का समन्वय उसी प्रकार हुआ है कि धार्मिक भावनाओं का आवेग छोड़ दें तो इन देशों के मुसलमानों और अन्य लोगों में कोई बुनियादी अंतर नहीं है. जिन देशों की सारी आबादी मुसलमान है, वे भी पाराम्परिक समाज ही हैं, चाहे मोरोक्को हो या मिस्र, ईरान हो या सऊदी अरब. इस्लाम की समस्या कुछ ज़्यादा पेचीदा इस कारण हो जाती है कि आर्थिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के साथ यहां धर्म और राजनीति के सम्बंधों की समस्या भी जुड़ गयी है. समस्या अन्य समूहों में भी है लेकिन उसका रूप भिन्न है. दक्षिण अमरीका में वह आत्मरक्षा की है. गैर अरब अफ्रीका में समस्या यह है कि राज्यों की सीमाएँ पुराने उपनिवेशों की ही सीमाएँ हैं, जिसके फ़लस्वरूप राज्यों के अन्दर प्रतिद्वन्द्विताएँ भी उभरी हैं और कई राज्यों में बटे हुए समान सांस्कृतिक परम्परा वाले लोगों के बीच एकता की इच्छा भी. उत्तरी अफ्रीका के लोगों के लिए यह तो मुमकिन है कि वे अरब और अफ्रीकी राजनीति में मेल बिठा सकें, लेकिन उनकी राजनीति अफ्रीकी है या इस्लामी, इसके बीच तो उन्हें चुनाव करना ही पड़ेगा.

हिंदुस्तान में, खास तौर पर बँगलादेश के मुक्ति संग्राम से धीरे धीरे मामला साफ़ होता नज़र आता है कि इस्लाम को राजनीति का आधार बना कर नहीं चलाया जा सकता. मलयेशिया और इंडोनेशिया में यह समस्या पहले से ही ग़भीर नहीं है.

एशिया को वास्तव में हम दो हिस्सों में बाँट सकते हैं, उत्तर और दक्षिण. सोवियत संघ का एशियाई भाग, जापान और अब चीन, इनमें पाराम्परिक समाज में परिवर्तन हुए हैं. दक्षिण एशिया अब भी पाराम्परिक है. वास्तव में गोरी सभ्यता के चलते, पाराम्परिक समाज किस सीमा तक जा सकते हैं, जापान, एशियाई सोवियत गणराज्य और चीन इसके उदाहरण हैं. ये उदाहरण भी ऐसे नहीं हैं जो हर जगह लागू किये जा सकते हों. सामन्ती जापान साम्रज्यवाद फाशीवाद के मार्ग से हो कर पूँजीवादी लोकतंत्र तक पहुँचा है. यह मार्ग अपवाद ही हो सकता है, नियम नहीं. दूसरे अगर यहाँ सन्तोष की बात कोई है तो यही कि जापान कम से कम शक्तिशाली तो बन गया है. किसी वक्त जापान में फाशीवाद के उदय की एक व्याख्या शिन्तो धर्म के सन्दर्भ में भी की गयी थी. जापानी सम्राट सूर्यपुत्र हैं और जापानी लोगों पर ईश्वर की विषेश अनुकम्पा है, जनसाधारण के इस विश्वास के कारण जापानी शासक वर्ग लोगों को फाशीवाद के कठोर सैनिक अनुशासन में बाँध सका. लेकिन अगर यह सच हो तो फ़िर जापान में पूँजीवादी लोकतंत्र का आधार भी शिन्तो धर्म को ही मानना पड़ेगा. वास्तविकता इसके सर्वथा विपरीत है. शिन्तो धर्म से न फाशीवाद का उदय हुआ न पूँजीवादी लोकतंत्र का. बल्कि गोरी सभ्यता की राजनीतिक व्यवस्थाओं को अपनाने के फ़लस्वरूप स्वयं जापानी समाज का चरित्र बदल गया है. पाराम्परिक संस्कृति के अवशेष अभी हैं, लेकिन ऐसे अवशेष तो युरोप के हर देश में भी हैं, जो पूँजीवाद विकास की होड़ में जापान से बहुत पहले शामिल हुए थे.

सोवियत संघ के एशियाई हिस्से में भी ऐसे परिवर्तन हुए हैं कि अब उन्हें पराम्परिक समाज कहना सही नहीं होगा. सोवियत संघ एक ऐसा संयुक्त परिवार है जिसके बजुर्ग उसके युरोपीय सदस्य हैं, और उनमें भी "कर्ता" का स्थान मस्क्वा के इलाके को हासिल है. सोवियत संघ के एशियाई गणराज्यों की हैसियत पिछले पचास सालों में परिवार के "आश्रितों" की रही है, और जहाँ तक भविष्य को देखा जा सकता है इस स्थिति में परिवर्तन की कोई सम्भावना नहीं दिखाई देती. रूस की साम्यवादी तानाशाही की व्याख्या भी अक्सर बाइज़ेनटाइन सभ्यता के संदर्भ में की गयी है. लेकिन फ़िर वर्तमान मध्य एशिया की व्याख्या समरकंद के संदर्भ में कैसे होगी? मार्कसवाद की युरोप केंद्रित दृष्टि के कारण साम्यवाद के अंतर्गत इसके अलावा और कुछ हो भी नहीं सकता कि गोरी सभ्यता के बाहर के लोग बच्चे जैसे समझे जायें और साम्यवाद उनकी प्रगति में सहायक हो. लेकिन इस प्रक्रिया में सम्बंधित ग़ैर युरोपीय समूहों का व्यक्तित्व भले बदल जाये, युरोप के साथ बराबरी नामुमकिन है.

साम्यवादी चीन में चल रही उथल पथल शायद मूलतः इस स्थिति के खिलाफ़ विद्रोह की अभिव्यक्ति है. पूर्वी युरोप के छोटे छोटे देशों को या अज़रबाइजान और उज़बेकिस्तान के आश्रित बना कर रखा जा सकता था. लेकिन विशालकाय चीन को नहीं. साम्यवादी चीन ने जो विकल्प चुना है वह बहुत कुछ वैसा ही है जैसे दोनो महायुद्धों के बीच की अविधि में जापान ने चुना था. तमाम अटकलों और अख़बारी पतंगबाज़ी को छोड़ दें तो आखिर में तथ्य यही सामने आता है कि साम्यवादी चीन में दल और सेना की मिली जुली तानाशाही स्थापित हो रही है जिसका लक्ष्य एक ऐसे शासक वर्ग का निर्माण करना है जिसमें दल और सेना के अलावा, विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले चुने हुए लोग हों. आगे चल कर इनमें भी कोई फर्क न रह जाये. दल के चुने हुए नेता, सेना के चुने हुए लोग भी हों, और विभिन्न उत्पादन क्षेत्रों के चुने हुए लोग भी. क्राँतिकारी परिषद का हर सदस्य एक साथ ही राजनीतिक कार्यकर्ता भी हो, सैनिक भी, उत्पादक भी. इस तरह चीन और क्यूबा के बीच का सैद्धांतिक फ़र्क घटा है.

चीन की साम्यवादी तानाशाही की व्याख्या अब कुछ लोग कन्फूशियस के व्यवहारवाद के सन्दर्भ में करने लगे हैं, खास तौर पर भारतीय अध्यात्मिकता की तुलना में. लेकिन जापान और रूस की तरह, इस व्याख्या का भी कोई खास मतलब नहीं है. मैं समझता हूँ कि अगर भारत में किसी प्रकार की कोई तानाशाही स्थापित हो जाये, तो जातिप्रथा के सन्दर्भ में उसकी व्याख्या बहुत आसानी से की जा सकेगी और उतनी ही एकाँगी तथा बेमतलब होगी. बहरहाल, चीन में जो नयी तानाशाही बन रही है, संस्कृति समेत चीन के पारम्परिक जीवन को नष्ट कर देना उसका घोषित उद्देश्य है, ताकि एक बिल्कुल नयी संस्कृति का निर्माण किया जा सके. लेकिन सैनिक, राजनीतिक, आर्थिक तानाशाही के द्वारा निर्मित संस्कृति, वह भी सारी दुनिया की एक ही संस्कृति, इससे अधिक राक्षिसी कल्पना और क्या हो सकती है?

भारत, पाकिस्तान से ले कर लाओस, कम्बोदिया और इंडोनेशिया तक एक संस्कृति क्षेत्र है. वियतनाम उस क्षेत्र और चीन के बीच का संधिक्षेत्र है. पारम्परिक समूहों के सामने इस समय जो समस्या है, वह अपने सभी रूपों में इस क्षेत्र में वर्तमान है. अमेज़न के जँगलों और एन्डीस पर्वतमाला में दुनिया से कटे हुए अमरीकी आदिवासियों की तरह, इस क्षेत्र में भी ऐसे आदिवासी समूह हैं जो इतिहास की आक्रामक लहरों से बचने के लिए जंगलों पहाड़ों में छिप गये, और अभी भी बाहर की दुनिया से उनका कोई सम्बंध नहीं है. ऐसे समूह भी हैं जिनकी तुलना अफ्रीकी पारम्परिक समूहों से की जा सकती है, वे बाहर की दुनिया से कटे हुए नहीं हैं, लेकिन जिनका सामाजिक संगठन अब भी वही पुराना पारम्परिक और पौराणिक है. बाहरी दुनिया के साथ सम्पर्क उनके पारम्परिक जीवन में दरारें पैदा कर रहा है. जंगलों की जगह बागानो और खादानो ने ले ली है. शराब अब उत्सव का अंग नहीं रही, उदासी से भागने का उपाय बन गयी है. स्वच्छंद जीवन को बाहरी दुनिया के सम्पर्क ने यौन रोगों से ज़हरीला बना दिया. फ़िर भी उनका पारम्परिक जीवन उन्हें ऐसी सुरक्षा प्रदान करता है जिसमें जीवन का रस बिल्कुल सूख नहीं गया है, लेकिन कब तक.

इसके अलावा इस क्षेत्र में दुनिया के चारों बड़े धर्म (इस्लाम, मसीही धर्म और बौद्ध धर्म के अलावा हिन्दू धर्म भी) सक्रिय हैं. हिन्दूस्तान में आधी सदी से अधिक समय तक हिन्दू मस्लिम तनाव अपनी चरम परिणितियों तक जा कर अब बँगला देश मुक्ति संग्राम के जरिये शायद ऐसी जगह आ रहा है जहाँ दोनो धर्मों के बीच एक नया सम्नवयपूर्ण सम्बंध संभव होगा. युरोपीय केन्द्रों से संचालित मसीही धर्म इस क्षेत्र में बहुत अधिक नहीं फ़ैल सका, लेकिन जहाँ वह अपने पाँव जमा सका (जैसे भारत के उत्तर पूर्वी कबाइली इलाके में) वहाँ उसने काफ़ी जहरीले बीज बोये. वियतनाम में उसका असर रहा है. लेकिन गोरी सभ्यता को मसीही धर्म से कहीं अधिक सहायता इस क्षेत्र के उस प्रभावशाली वर्ग से मिली है (यहाँ भी किसी हद तक अफ्रीकी शासक वर्ग से तुलना की जा सकती है) जिसने धर्म तो नहीं बदला, लेकिन भाषा, रहन सहन, पोशाक और उपभोग में गोरों की नकल करना सीख लिया है. यह एक तरह की असंस्कृतिकरण की प्रक्रिया है जो आधुनिकरण के नाम पर चलाई जा रही है. अगर यह सफल हो जाये तो किसी की कोई भाषा नहीं रह जायेगी, लोग बहुत कुछ उसी भाषा का इस्तेमाल करने लगेंगे जो किसी समय अँग्रेज साहबों के खानसामा साहबों के साथ इस्तेमाल किया करते थे. संभव है कि मेरी बात कुछ अत्युक्तिपूर्ण लगे लेकिन भाषा के छिछली और अर्थहीन होने के खतरे के बारे में कोई शक नहीं है. अभी ही हमारी भाषा बहुत हद तक पंगु हो गयी है. पारम्परिक जीवन में परिवर्तन के नाम पर रोज़ नये नये बाबा, सिद्ध, योगी, महायोगी और अवतार जन्म लेते रहेंगे. कीर्तन, भजन, जागरण, यज्ञ, मंदिरों में चढ़ावा, यह सब चलता रहेगा, बल्कि बलि की प्रथा फ़िर चल सकती है. लेकिन पारम्परिक धर्म के मूल्य नष्ट होने की कौन कहे, लोग धीरे धीरे भूलते जायेंगे कि कोई मूल्य थे भी. हिन्दुस्तान की गर्मी में, मई जून के महीने में आधुनिक व्यक्ति कोट पतलून पहने, टाई बाँधे, तो अब भी देखे जा सकते हैं. यह तो जंगलीपन भी नहीं है, आदमी का चिम्पांजी की सतह पर उतर जाना है.

संक्षेप में दक्षिण एशिया के क्षेत्र में एक ओर तो सामाजिक संगठन के विभिन्न स्तरों पर जमे हुए रूप हैं, दूसरी ओर विभिन्न पाराम्परिक धर्मों के परस्पर सम्बंधों में समन्वय की समस्या है, तीसरे समाज और धर्म दोनो में व्याप्त जड़ता है और चौथे गोरी सभ्यता का हमला है जो अप्रत्यक्ष साम्राज्यवाद का रूप लेने के बाद और भी तीव्र हो गया है. इस हमले की शुरुआत होती है अर्थव्यवस्था के तथाकथित आधुनिकीकरण से, जिसमें स्थानीय अर्थ व्यवस्था की पूरक और सहायक मात्र रह जाती है, मुख्यतः सस्ता श्रम और कच्चा माल देने वाली और नतीजे के तौर पर अन्ततः यही लक्ष्य पहली और आखिरी कसौटी बन जाता है, जिसमें आदमी चिम्पांजी से बहुत बेहतर स्थिति में नहीं रहता.

दुनिया के अन्य पाराम्परिक समूहों के सामने भी इसी तरह की चुनौतियाँ हैं, लेकिन किसी अन्य क्षेत्र में चारों एक साथ नहीं हैं. गोरी दुनिया ने जो विकल्प रखे हैं, उनके अलावा पारम्परिक समूहों के सामने एक ही विकल्प है, आन्तरिक परिवर्तन के द्वारा शक्ति और गतिशीलता हासिल करना. कैसे? इसका ज़वाब विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को खुद ही खोजना पड़ेगा. दक्षिण एशिया में चुनौती सबसे गम्भीर है, क्या इससे यह सोचा जा सकता है दक्षिण एशिया के लोग दूसरों की अपेक्षा ज़्यादा जल्दी सचेत होंगे और कुछ करेंगे? मैं इसकी आशा करता हूँ, लेकिन इस आशा के कारण जितने वस्तुपरक हैं, शायद उतने ही वैयक्तिक भी. बहरहाल, कुछ न करने के नतीजे मैं जो देख पाता हूँ, उनको समझ लेने के बाद उन्हें स्वीकार करने की कल्पना तो मैं तभी कर सकता हूँ जब मैं खूद अपनी और अपने बच्चों की चिम्पांजी बनने की नियती को स्वीकार कर लूँ, जो जाहिर है मैं नहीं कर सकता.

1 टिप्पणी:

  1. साधुवाद उन्हें जिनके मार्फत हम यह आलेख पढ़ सके....,

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