30 अक्तूबर 2011

उपेन्द्र नाथ अश्क


उपेन्द्र नाथ अश्क हिन्दी के सुप्रसिद्ध लेखकों में गिने जाते हैं. कुछ दिन पहले अपने पिता के कागज़ों में से मुझे उनका एक पत्र मिला, जिसे उन्होंने 20 फरवरी 1962 में लिखा था. तब वह 5 ख़ुसराबाग़ रोड, इलाहाबाद 3 में रहते थे. इस पत्र में वह अपने लेखन की बात भी करते हैं. प्रस्तुत है उनका यह पत्रः

प्रियवर दीपक जी,
आप का 30 जनवरी 1962 का कृपापत्र समय से ही मिल गया, पर आपने उस पर पता नहीं लिखा. और पित्ती साहब का वह पत्र जिस में उन्होंने आप का पता दिया था, मुझे मिला नहीं. आज सहसा जब कागज़ों में ही वह पत्र मिल गया तो मैं उसमें से पता देख कर आपको पत्र लिख रहा हूँ. अब कभी आप का बेपते का पत्र आया और मैं उत्तर न दे सका तो मुझे दोष न दीजियेगा. मेरे यहाँ बड़ी अव्यवस्था है. एक बार की गुमी हुई पुस्तक या चिट्ठी फ़िर नहीं मिलती.
मैं आप से सहमत नहीं कि हमारे यहाँ किसी को संस्मरण लिखने नहीं आते. मैं आजकल संकेत (उर्दू) की छपाई में लगा हूँ उसमें दो संस्मरण इतने अच्छे हैं कि पाँच छै बार पढ़ने पर भी फ़िर पढ़ने का मन होता है. एक इसमत चग़ताई ने अपने भाई अज़ीमबेग चग़ताई पर लिखा है और दूसरा साहिर ने देवेन्द्र सत्यार्थी पर लिखा है.
कौशल्या द्वारा भेजी गयी पुस्तक में भी बेदी, कृष्ण, मार्कण्डेय, सुधीन्द्र रस्तोगी तथा कौशल्या के संस्मरण बहुत अच्छे हैं. यों नज़र अपनी अपनी, पसन्द अपनी.
यह जान कर आश्चर्य हुआ कि आज से बीस साल पहले आप की कहानी छपी थी. शायद राजनीतिक कार्यों में फँसे रहने के कारण आप इधर ध्यान नहीं दे सके. मैं इसे हिन्दी का दुर्भाग्य ही कहूँगा. अजीब बात यह है कि आप की कोई भी कहानी मेरी नज़र से नहीं गुज़री. यद्यापि मैं प्रायः सब पत्र पत्रिकाएँ देखता हूँ. कभी कभी जब मैं अत्याधिक व्यस्त होता हूँ तो नहीं देख पाता. तो भी कभी जब आप संग्रह रूप में उन्हें प्रस्तुत करें, मैं देखना चाहूँगा.
नयी कविता अधिकांश झूठी हैं. लेकिन अच्छी कविता सदा ही कम परिभाषा (?) में रहती है ढेरों साहित्य लिखा जाता है. उच्च कोटि का अव्यक्त  कम परिमाषा (?) में निकलता है, यही बात कविता पर लागू होती है. मैंने "सड़कों में ढले साये" की भूमिका में व्यंग विनोद शैली में काफ़ी पते की बातें कहीं हैं, पर उन बातों पर विचार करने के बदले लोग चिढ़ गये और गाली गलौज पर उतर आये. बहरहाल कभी पढ़ियेगा तो ज़रूर राय दीजियेगा.
"पँलग" की कहानियों पर इधर बड़ी ले दे मची है. मैं तो समझता हूँ कि वर्षों बाद मैंने कुछ बहुत अच्छी कहानियाँलिखी हैं और मैं उनसे सन्तुष्ट भी हूँ. लेकिन लेखक की राय कोई महत्व नहीं रखती. आप पढ़ें तो ज़रूर राय दें. मैं प्रतीक्षा करूँगा.
मैं इधर "सन्केत" (उर्दू) के सिलसिले में व्यस्त हूँ. 600 पृष्ठों का संकलन है. अभी चार छै कार्य शेष हैं. छप जाये तो जान छूटे. बहुत थक गया हूँ.
इधर बीमारी ही में मैंने अपने बृहत उपन्यास "गिरती दीवारें" का दूसरा भाग "शहर में घूमता आइना" के नाम से पूरा किया है. यह साल तो उसी के revision में लगेगा. फ़रवरी 1963 में ही उसे प्रकाशित करूँगा. तब एक प्रति आप के अवलोकनार्थ भेजूँगा.
सखाऊ (?)
उपेन्द्र नाथ अश्क

टिप्पणीः जैसा कि आप नीचे चिट्ठी के अंतिम पृष्ठ की तस्वीर से देख सकते हैं, वैसे तो अश्क जी की हस्तलिपि साफ़ थी लेकिन मात्रा लिखने का तरीका कुछ विशिष्ठ थी और कुछ शब्द समझने में मुझे कठिनाई हुई. जहाँ मुझे शब्द समझने में दिक्कत हुई वहाँ (?) का निशान लगाया है.

सुनील दीपक


Letter Hindi writer Upendra Nath Ashk

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01 अगस्त 2011

मैं और मेरा वक्त

टिप्पणी, 2011: ओमप्रकाश दीपक ने यह आलेख 1965 में भारत पाकिस्तान युद्ध से पहले लिखा था, जो शायद उसी वर्ष "क ख ग" नाम की हिन्दी पत्रिका में छपा था. उस बात को अब 45 साल हो चुके हैं. आलेख में बहुत सी बातों के वर्णन हैं जो भारत की स्वतंत्रता से दस बीस साल पहले के समाज के बारे में हैं. उनका पुरुष और नारी वाँछित गुणों के बारे में कहना, अमरीकी नीग्रो तथा भारतीय दलितों के बारे में तुलना, भारत पाकिस्तान को एक राष्ट्र के दो राज्य कहना, आदि बातें कुछ अटपटी सी लगती हैं. समय ने उनकी सोच की कई बातों को गलत साबित किया. अगर वह जीवित रहते तो शायद समय के साथ उनकी सोच बदलती?

पर जहाँ वैचारिक दृष्टि से यह आलेख मुझे तर्क से कम और भावनाओं से अधिक जुड़ा लगता है, भावनात्मक दृष्टि से यह आलेख मुझे बहुत प्रिय है क्योंकि इसमें मुझे उनके बचपन के वह दिन दिखते हैं जिसके बारे में जानकारी नहीं थी. क्या जाने, आज के इलाहाबाद में "गाड़ीवान टोला" नाम की जगह बची है या नहीं? (सुनील दीपक)
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मैं और मेरा वक्त
ओमप्रकाश दीपक

पिछले दिनों मैं जेम्स बाल्डविन की एक किताब पढ़ रहा था, "दि फायर नेक्स्ट टाईम" (अगली बार आग). पढ़ते पढ़ते मेरे मन में कई बार ख्याल आया कि हिन्दुस्तान में वर्ण भेद के बारे में कोई इस तरह क्यों नहीं लिखता. एक बार यह भी ख्याल आया कि मैं खुद लिखूँ. लेकिन ख्याल आया और चला गया. मैं द्विज हूँ. बहुत कोशिश करूँ, तो भी उस तरह नहीं लिख सकता. वह चीज़ झूठी होगी. लेकिन मैं दूसरी तरह से लिख सकता हूँ शायद.

बाल्डविन की पुस्तक पढ़ते समय मन में एक अज़ीब सी जलन उठी थी, बाल्डविन के मन की जलन, जो शब्दों के माध्यम से उसने मुझ तक पहुँचा दी थी. कुछ देर मुझे भ्रम रहा कि वह मेरे अपने मन की जलन है, लेकिन थी नहीं. लिखने बैठा, और मन पीछे को मुड़ा, चलता चला गया उन दिनों को जब इलाहाबाद के गाड़ीवान टोला मुहल्ले में बिजली नहीं आयी थी, और कमीज़ के नीचे धोती बाँधे एक छोटा सा लड़का गलियों में कम ही निकलता था. उसकी विधवा माँ और दो बहनों को बहुत डर था उसके बिगड़ जाने का (और सारे एहतियात के बावजूद वह बिगड़ ही गया). उसके घर की एक बिल्कुल नकली दुनिया थी, जो नाकाम कोशिश करती थी कि उस लड़के के साथ साथ बाहर की दुनिया में जाये, और बाहर की असलियत थी कि हरदम इस दुनिया को चीर कर इसमें घुसी आती थी. लेकिन उसके लिए दोनो ही संसार सच थे - एक में वह रहता था, दूसरे में उसे जाना पड़ता था. (उन दिनों को तीस पैंतीस साल बीत गये हैं और अब एक तीसरी दुनिया भी है, उस लड़के के मन की, और इन तीनों में अब भी मेल नहीं है, शायद कभी नहीं होगा.) और वापस मुड़ कर जाते हुए, अगल बगल देखते हुए, मेरे मन में कोई जलन नहीं उठी, एक बहुत गहरी उदासी मन में घर गई. "अगली बार आग", अग्नि प्रलय, जिसमें कुछ नहीं बचता. पानी कितना भी अधिक हो, उस पर कुछ चीज़ें तैरती रहती हैं, जल में स्वयं भी प्राणी रहते हैं. ठंड कितनी भी अधिक हो, बर्फ़ जब पिघलती है, तो कोंपलें फ़िर फूट निकलती हैं. बर्फ़ जमाती है. पानी गलाता है, सड़ाता है, लेकिन आग जलाती है, झुलसाती है, जिससे एक हद के वाद कोई नहीं बचता, कुछ नहीं बचता. केवल वह चीज़ बचती है जिसे वैज्ञानिकों ने "ब्रह्म धूलि" का नाम दिया है. "अगली बार आग", अग्नि प्रलय.

अगली बार! लेकिन कोई "अगली बार" आती है क्या? मन में एक बहुत, बहुत गहरी उदासी घर कर जाती है - हम सब तो जले हुए, झुलसे हुए लोग हैं. शम्बूक का वध करने की राम को आवश्यकता नहीं थी, शम्बूक की तपस्या ही उसकी मृत्यु थी. उसे जीवन तो तब मिलता जब राम तपस्या करते, शम्बूक बनने के लिए. लेकिन वैसा हुआ नहीं और शिव के हाथों सृष्टि का सबसे बड़ा पाप हुआ - कितना व्यंग है कि अन्यथा जो पाप रहित था, अद्धनारीश्वर था, नर नारी के प्रेम का सर्वोत्तम प्रतीक था, उसी ने प्रेम के देवता को जला कर राख कर दिया.

प्रेम का देवता जल कर राख हो गया, और हमारे झुलसे हुए हृदयों पर प्रेम की वर्षा करने की तपस्याएँ विफल हो गयीं. रति है, प्रेम नहीं है. संयम करो, बुद्ध ने सिखाया, गाँधी ने भी सिखाया. रति में संयम और अनंग, अशरीरी प्रेम. गांधी स्वय मन में शंका लिये हुए ही शहीद हो गये. प्रेम और रति का संयोग, है कोई जो सिखाये. लेकिन झुलसा हुआ मन प्रेम कैसे करे? प्रेम का देवता तो जल कर राख हो गया.

स्त्रियाँ कहीं किसी जगह सब एक जैसी होती हैं. अपनी शत्रु होने में भी एक जैसी होती हैं. और इसलिए एक दूसरे के सामने अपना दुखड़ा रोने में भी एक जैसी होती हैं. लेकिन मैंने अपनी माँ को अपना दुखड़ा किसी के आगे रोते नहीं देखा. अब वह साठ साल की हैं और अब भी सुन्दर हैं! तैरह चौदह साल पहले मेरी शादी में कुछ लोगों ने दीदी को बड़ी बहन समझा था, और माँ को छोटी. पैंतीस साल पहले कैसी रही होंगी? मैं कभी कभी उसे देखता हूँ और सोचता हूँ कि अगर वह डेढ़ सौ साल पहले हुई होती, तो पच्चीस वर्ष की आयु में ज़िन्दा ही जला दी गयी होती. लेकिन अब भी, लेकिन अभी भी वह अपना दुखड़ा नहीं रोती, क्योंकि उसका दुखड़ा तो इतना व्यक्त है, इतना साफ़ दिखाई देता है कि उसका रोना क्या.

दिल्ली के अजमलखाँ पार्क में सारा साल लोग शाम को जमा होते हैं. कथाएँ होती है, भजन कीर्तन और प्रवचन होते हैं. एक जगह कुछ लोग बैठ कर राजनीतिक सामाजिक प्रश्नों की चर्चा भी करते हैं. उस चर्चा में एक दिन मैंने सुना एक सज्जन कह रहे थे कि सती प्रथा इसलिए थी कि स्त्रियाँ पतियों के स्वास्थ्य का ध्यान रखें, ठीक से खीलाएँ पिलायें, कहीं जहर न दे दें. मेरे जी में आया कि पूछूँ फ़िर पत्नी के साथ पति को जलाने की व्यवस्था क्यों न शुरु की जाये ताकि पति लोग अपनी पत्नियों के स्वास्थ्य का ध्यान रखें, उन्हें बेमौत न मारें. और, एक बार मैंने एक पत्र में अपनी पत्नि को लिख दिया कि अगर में आज मर जाईँ तो मुझे ज़रा रंज नहीं होगा. मेरी मंशा थी कि ज़िन्दगी को मैंने भरपूर जिया है. इसलिए जब भी मौत आयेगी मुझे अफ़सोस नहीं होगा. (गो अब कभी कभी लगता है कि पाँव उतने मजबूत नहीं रहे). बहरहाल, पत्नि ने उत्तर दिया, हाँ तुमको क्यों रंज होगा, तुम्हें तो छुट्टी मिल जायेगी, बिलखना तो होगा मेरे बच्चों को. स्वाभीमानी है इसलिए अपनी बात नहीं कही. लेकिन हिन्दुस्तानी औरत की ज़िन्दगी का सबसे बड़ा सच यही है. पति के अमंगल का भर भूत की तरह उसके सर चढ़ा रहता है. और इस भय ने हिन्दुस्तानी औरत को तो भीरू बनाया ही है - गो अब भी समान स्थितियों में, हिन्दुस्तानी औरत शायद हिन्दुस्तानी मर्द से अधिक साहस का परिचय देती है - लेकिन, इससे भी अधिक, उसने सारी कौम को नपुसंक बना दिया है. जिजीवषा का अर्थ हो गया है किसी भी तरह किसी भी हालत में शरीर से चिपके रहना.

मैं जानता हूँ कि लोग राष्ट्रीय आंदोलन का हवाला देंगे. मैंने पन्द्रह साल की उम्र में हथकड़ी पहनी थी, और लगभग बीस साल तक मैं भी दृष्टिभ्रम का शिकार रहा. हिन्दुस्तान का राष्ट्रीय आन्दोलन का काफ़ी हिस्सा केवल एक दृष्टिभ्रम था. हमारे आन्दोलन जब दिखावे से आगे बढ़ते थे तो आत्म पीड़न बन जाते थे. गाँधी जी के बावजूद, हिन्दुस्तान ने अहिँसा को स्वेच्छा से नहीं मजबूरी में स्वीकार किया था. और मुझे अब इसमें और ज़रा भी सन्देह नहीं रह गया है कि मजबूरी की अहिँसा बहुत गन्दी चीज़ होती है. मजबूरी की अहिँसा अगर कायरता नहीं होती तो आत्म पीड़न होती है. और राष्ट्रीय आन्दोलन की परिणती हुई हत्या, लूट, बलात्कार और आगज़नी में, ऐसी जो इतिहास में अभूतपूर्व थी. गाँधी जी के भारतीय राजनीति में प्रवेश करने के तीस वर्ष बाद हिन्दुस्तानी आदमी ने लड़ना नहीं सीखा, सीखा अकेले आदमी की पीठ में छुरा भोंक देना. गाँधी स्वयं खोटा सिक्का हो गये. मजबूरी की अहिँसा वाले राष्ट्रीय आन्दोलन के "चौधरी" ज्यादा अक्लमंद थे. उन्होंने मौके को हाथ से नहीं जाने दिया. डेढ़ सौ साल बाद जुआ उतरा, तो पिछले अठारह सालों से बधिया बैल फ़िर पसरा हुआ जुगाली कर रहा है. कभी कभी ज़ोर से सिर हिला कर झौकारता और निरीह बच्चों को सींग मार कर अपने पुसंत्व का प्रमाण देता रहा है, और जब भी किसी साँड ने आ कर सींग अड़ाये हैं, तो जनखों की तरह गुहार लगाता रहा है, "हाय देखो ये मुझे छेड़ता है." और दुनिया हँसती रही है, क्योंकि बधिया बैल और बधिया कौम की हरकतों पर हँसा ही जा सकता है.

मैं अपनी माँ को देखता हूँ जिसके मन का सबसे बड़ा भय है कि पति की मृत्यु देखने वाली उसकी आँखों को कहीं बेटे की मृत्यु भी न देखनी पड़े. अपनी पत्नी को देखता हूँ, "पति जैसा भी है पति है, उसका सहारा न छूटे." यह भी देखता हूँ कि अपने बेटे को वह किस तरह बाँधे रखना चाहती है, हर खतरे से दूर रखना चाहती है. खीजता हूँ कभी कभी, बहुत खीजता हूँ. लेकिन उनकी कितनी पुरखिनों को ज़िन्दा जला दिया गया होगा, और जलाने वाले उनके बेटे, भाई, बाप और ससुर रहे होंगे. मेरे मन में क्रोध नहीं उठता, जलन नहीं होती, एक बहुत गहरी उदासी घर कर जाती है.

गाड़ीवान टोला की उस गली को कैथाना कहते थे. गली में कैथा का एक पेड़ था और बचपन में मैं कैथाना की व्यत्पत्ति कैथा से हुई समझता था - कायस्थ और कैथाना का सम्बन्ध मुझे बहुत बाद में मालूम हुआ. कायस्थ, बनिये, ब्राह्मण, एक दो परिवार ठाकुरों के, एक नाई और एक कहार, बस. मेरे देखते देखते भी द्विज परिवारों का धन बढ़ा. एक दो परिवारों की हालत अगर कुछ बिगड़ी भी, तो कायस्थ की जगह बनिये ने ले ली. सारी गली में पक्के मकान केवल द्विजों के पास थे (गो कुछ द्विज कच्चे घरों में भी थे), और जब बिजली आई तो उन्ही घरों में, रेडियो आया तो उन्ही घरों में.

कहार का नाम था महादेव, कहारिन का नाम मुझे नहीं मालूम. बरसों तक वह औरत मेरे घर काम करने दिन में दो बार आती रही, और उसका नाम मुझे नहीं मालूम. बहुत ही व्यावहारिक, आती, काम करती, (बल्कि सारा परिवार काम करता, कभी इक्ट्ठे, कभी कई घरों में बँट कर) और चली जाती. उसे खुलते हुए मैंने एक ही बार देखा. घर में कोई शादी थी और लड़कियाँ बिना किसी बाजे के ही बैठ कर गा रही थीं. दबे दबे गले से गाने वाली शहरी द्विज लड़कियाँ. कहारिन आयी, तो काम खतम करके अचानक बोली, "जरा खुल के गाओ." और स्वयं स्टूल खींच कर उस पर ढोलक की थाप देने लगी, "किन्नो लियो रे गोरी, तिहारो रस." "अरे कहारिन तो छिपी रुस्तम है", किसी ने कहा और कहारिन उठ गयी. बस. न उसके पहले कुछ, न बाद में.

उसका एक लड़का था, मेरी ही उम्र का छोटेलाल. माँ बाप से ले कर गली मोहल्ले के सभी लोग उसे "छोटइया" कहते थे. छोटे हर बात में मुझसे तेज था, सिवाय पढ़ायी के. उसके स्कूल जाने की नौबत ही नहीं आयी, परिवार में किसी भी बच्चे के स्कूल जाने की नौबत नहीं आई. दौड़ना, कबड्डी या गेंद बल्ला खेलना, पेड़ पर चढ़ना, कुश्ती लड़ना या तालाब के उस पार पत्थर फैंकना, आसपास का कोई भी लड़का इनमें छोटे का मुकाबला नहीं कर सकता था. सत्रह साल की उम्र में, जब दुनिया के साथ ज़ोर आज़माने के लिए मैंने घर और शहर छोड़ा, तो वह एक मुसलमान युवक रफ़ीक खाँ का नौकर मुसाहब बन गया था. रफ़ीक का बाप काफ़ी सम्पत्ति छोड़ गया था, और रफ़ीक का एक ही काम था, पास पड़ोस की तमाम नौजवान लड़कियों से इश्क लड़ाना. छोटे मुहल्ले के सभी घरों में आता जाता था (कहारिन का लड़का था) और इसलिए इन प्रेम प्रसंगो के लिए उससे अच्छा दूत कोई और नहीं मिल सकता था. रफ़ीक 1947 में पाकिस्तान चला गया. और छोटे?

छोटे कहीं बर्तन माँजता होगा, इसकी कल्पना मैं नहीं कर सकता. लेकिन फ़िर करता क्या होगा? चोरी करता होगा, यह भी मैं नहीं सोच सकता. जेबें काटता हो, यह मुमकिन है, क्योंकि उसके लिए कौशल की ज़रूरत होती है, और शिकार को बेवकूफ़ बनाने का एहसास भी होता है. यह भी संभव है कि रात बिरात किसी अकेले आदमी की साइकल घड़ी आदि छीन लेने वाले किसी गिरोह में शामिल हो गया हो. तब वह शराब नहीं पीता था, लेकिन अब मुमकिन है कि भट्ठी लगा कर शराब बेचता भी हो, पीता भी हो.

हिन्दुस्तान में छोटेलाल जैसे लोगों के सामने विकल्प दो होते हैं - अपने मन को मार कर बड़े घरों के बर्तन माँजे, या फ़िर अपराध करें, असामाजिक या समाज विरोधी बनें, क्योंकि उनकी क्षमता के उपयोग का समाज में कोई मार्ग नहीं है. अमरीकी नीग्रो के पास एक तीसरा विकल्प भी है, आत्म सम्मान की रक्षा करते हुए जीना. लेकिन हिन्दुस्तान के शूद्र के पास ऐसा कोई विकल्प नहीं है - उसने हजारों साल पहले ही समाज में अपनी हीन स्थिति को स्वीकार कर लिया था.

Graphics identities by S. Deepak, 2011

गाड़ीवान टोला में मेरे मकान के पिछवाड़े खुली जगह में एक नीम का पेड़ था, और पेड़ के नीचे एक घरौंदा था - पाँच-छः फुट चौड़ा, पाँच-छः फुट लम्बा. उस घरौंदे में एक परिवार रहता था. मैं जब बहुत छोटा था तो उस परिवार में छः सदस्य थे. "टेकइया" (मैं अनुमान से ही कह सकता हूँ कि उसका नाम टेक चंद होगा) और "गिलहरी" दोनो अन्धे थे. गेल्हर का काका बदलू वहीं बूढ़ा हो कर मरा था, और उसे बाजे-गाजे के साथ ले गए थे. बहुत पहले गेल्हर के भाई भावज भी वहीं रहते थे, पास की खुली ज़मीन पर. भावज का नाम तो खैर मालूम भी क्या होता, भाई का नाम भी मैं भूल गया हूँ. तीस साल तक मैंने उस अन्धे दम्पत्ति को उस घरौंदे में रहते देखा. वक्त ने तीनो के ही चेहरों और शरीर पर जो छाप डाली, उसके अलावा तीस साल तक कोई फर्क नहीं पड़ा. गिलहरी के बच्चे होते रहे, मरते रहे. केवल एक लड़की ही जीवित रही - बड़ी बड़ी रसीली आँखों वाली ललिता. एक बार बचपन में उसकी भावज को एक साफ़ रंगीन साड़ी पहने देखा (जो शायद उसे किसी बड़े घर से मिली थी) मैं उसे पहचान नहीं सका था. उसके कुछ दिन बाद ही उस खुली जगह में उसे साँप डस गया. उसके मर जाने पर उसका पति भी कहीं चला गया. ललिता का ब्याह हो गया और अन्धे पति पत्नि अकेले रह गये.

टेकचंद बहुत ही कम बोलता था, बहुत ही कम. गेल्हर उतनी ही वाचाल थी. औरों को नहीं जानता, मुझे वह चाल से ही पहचान लेती थी. मेरे आश्चर्य प्रकट करने पर हँस कर कहती, "हे ल्यो! का मैं आँधर हौं कि न पहिचानिहौं!" यह उसका प्रिय मज़ाक था. कभी कहीं खुशी का मौका होता तो मगन हो कर गाती, "लायो महाराजा हमें छल करके." यह उसका प्रिय गीत था. कन्ट्रोल को कन्टोर और इन्सपेक्टर को निसपिट्टर कहती थी. सावन के महीने में उसकी नीम पर झूला पड़ता और आसपड़ोस की औरतें इक्ट्ठी हो कर झूलती और सावन गाती. मुझे ऐसा याद पड़ता है कि मैंने उसे हमेशा काली धोती पहने हुए ही देखा. अब सोचता हूँ कि शायद जहाँ से भी उसे धोती मिलती होगी, उसे वह काले रंग का ही लेती होगी, साबुन सज्जी की बचत.

कोई अतीत नहीं, कोई भविष्य नहीं, कोई वर्तमान भी नहीं. मन के अन्दर के न जाने किस कोने से वह अपनी हँसी का बहाव निकालती थी, अब अपने साथ वैसा छल कर पाती होगी क्या?

इतना भी मुझे याद पड़ता है कि उसकी भावज जब जिन्दा थी, तो कभी कभी घर आ कर रोती थी - उसका पति दिन भर जो कमाता था, शाम को ताड़ी पी लेता था, ऊपर कर्ज कर लेता था. रात को घर (!) आकर पीटता था, पैसे छीन लेता था.

और अब भी माँ के पास अक्सर औरतें आती हैं, हरिजन औरतें, शूद्र औरतें, और सबका एक ही किस्सा है, सबका एक ही दुश्मन है - दारू. अपनी सारी ज़िन्दगी में दो ही हरिजन डाक्टरों से मेरी भेंट हुई है. एक होम्योपैथी करते हैं, दूसरे के पास भी कोई डिगरी नहीं है, पुराने किसी नियम अन्तर्गत डाक्टरी करने का, या कम से कम दवाईयाँ बेचने का लायसैंस उन्हें मिला हुआ है. उकी दुकान पर औषधि निर्माताओं की प्रचार सामग्री प्रचुर मात्रा में देखी जा सकती है - रंग बिरंगे फोल्डर, कार्ड, सोख्ते, लेकिन सिर दर्द की भी दवा नहीं मिलती. मरीज आते हैं, डाक्टर को दिखाये बिना ही अन्दर चले जाते हैं, दवा पी कर बाहर आते हैं, पैसे देते हैं और चले जाते हैं. एक बार कुछ परेशान से दिखे, इलाके में नया मजिस्टर आया था, जिसके बारे में प्रसिद्ध था कि वह बड़ा सख्त है. लेकिन दूसरे दिन उनका चेहरा फ़िर खिला हुआ था, थानेदार की मार्फत सारा मामला तय हो गया था.

डाक्टर साहब इलाके के हरिजनों के नेता है, पिछली बार चुनाव भी लड़े थे, काफ़ी वोट मिले थे, लेकिन हार गये, क्योंकि कांग्रेस का उम्मीदवार उनसे पड़ा और ज़्यादा दबदबे वाला चौधरी था. डाक्टर साहब को द्विजों से कोई लगाव नहीं है, वे हरिजनों के पूर्ण हितैषी हैं, लेकिन बस ज़िन्दगी ही ऐसी है.

अमरीकी नीग्रो को शकल से पहचाना जा सकता है. लेकिन इसमें नीग्रो की मुक्ति भी निहित है - उसे "गोरा" बनने की चेष्टा करने का लोभ नहीं होता. वह अपने पुरखों की गुलामी को स्वीकार कर सकता है, अपनी वर्तमान स्थिति के तथ्य को भी स्वीकार कर सकता है, और गोरों से कह सकता है कि हमें अपने को नहीं सुधारना, तुम्हें अपने को शिक्षित करना है, तुम्हें नैतिक बनना है! सवाल यह नहीं है कि तुम हमें स्वीकार करो, सवाल यह है कि हम नीग्रो लोग तुम्हें स्वीकार करें.

लेकिन हिन्दुस्तानी शूद्र के साथ ऐसा नहीं है. गोरे लोग समाज में नीग्रो को जो स्थान देना चाहते हें या देते हैं, उसे वह स्वीकार नहीं करता. पिछले दिनों मुझे यह जान कर निजि क्षति का अनुभव हुआ कि अमरीकी नीग्रो लेखिका लोरायन हैंन्सबरी की कैंसर से मृत्यु हो गयी. कई वर्ष पहले मैंने उनका एक वाक्य पढ़ा था, जिसे मैं पहले भी एकाध बार उद्धृत कर चुका हूँ, और यहाँ फ़िर करना चाहता हूँ: "यह सच है कि साहित्य मात्र का उद्देश्य मानव जाति में समाहित होना है, लेकिन इससे पहले ज़रूरी है कि दुनिया के दबे हुए लोग अपने को पहचानें."

यह पहचान ही ऐसा काम है, जो भारतीय शूद्र के लिए लगभग असंभव जैसा कठिन है. हज़ारों साल पहले ही उसने द्विजों द्वारा समाज में अपने लिए निर्धारित स्थान को स्वीकार कर लिया था. भरी दोपहरिया में मेरी जमादारनी प्यासी रह गई, लेकिन उसने अपने हाथ से मेरे गिलास में पानी ले कर पीना स्वीकार नहीं किया. वह अब भी जमादारनी है, जिसका काम है पाख़ाने साफ़ करना, और कूड़ा उठाना. अस्पृश्यता निवारण़ कानून! उसको विरासत में यह ज़िम्मेदारी मिली है कि दूसरों की गन्दगी साफ़ करे. उसके बाद यही काम उसके बेटे बेटियों बहुओं को मिलेगा और उसके बाद उनके बेटे बेटियों बहुओं को. इस सिलसिले के चलते हुए क्या अस्पृश्यता निवारण कानून जैसे हज़ार कानूनों का भी कोई मतलब हो सकता है?

लेकिन सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि हिन्दुस्तान का शूद्र सिर उठा कर यह नहीं कह सकता कि हाँ मैं शूद्र हूँ, और तुमसे किसी तरह भी कम नहीं हूँ, किसी तरह छोटा नहीं हूँ. वह अपनी स्थिति को बदलना भी चाहता है तो द्विज बनने की चेष्टा करता है. द्विज वह बन नहीं सकता, इसलिए अन्ततः आत्म सम्मान भी प्राप्त नहीं कर सकता. मन ही मन उसके अन्दर जलन और हीन भावना बनी रहती है, बढ़ती जाती है. मुझे एक मित्र ने बताया जो शूद्र हैं, और साम्यवादी नहीं हैं कि चीनी आक्रमण के समय बहुसंख्यक शूद्र मन ही मन खुश हुए थे कि चलो अच्छा है द्विजों की सत्ता समाप्त होगी. लेकिन, इस बात के अलावा कि आज के चीनी आक्रमण और दो सदी पहले के अंग्रेज़ी आक्रमण में कोई विषेश अंतर नहीं है, और अगर दुर्भाग्यवश हिन्दुस्तान फ़िर कभी गुलाम हुआ, तो नये शासक द्विजों के माध्यम से ही शासन करेंगे, यह तथ्य उससे भी बड़ा है कि शूद्रों में देश द्रोह की भी क्षमता नहीं है, देश द्रोह भी द्विज ही करते हैं. हिन्दुस्तान का शूद्र तो बिल्कुल ही झुलस गया है, स्वतंत्र रूप से कोई भी काम करने की क्षमता उसमें नहीं है.

इन्हीं मित्र ने पिछले दिनों एक खंड काव्य लिखा. कोई ऐसी असाधारण रचना नहीं फिर भी ऐसी रचनाएँ द्विज लेखक लिखते रहते हैं, और वे छपती रहती हैं. लेकिन मेरे इन मित्र की कविता कहीं नहीं छप रही.

मेरी नज़र में इससे भी बड़ा एक सवाल और है. कविता के कुछ अंश उन्होंने मुझे सुनाये. मैंने जब सीधा सवाल किया कि आप का जो प्रत्यक्ष अनुभव है, जो कुछ आप ने भोगा है, उसे ले कर आप ने कभी कुछ लिखा है, तो उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया. नहीं लिखा, क्योंकि शूद्र होने का जो अर्थ है, उसे शारिरिक तौर पर स्वीकार और नैतिक स्तर पर अस्वीकार करने के बजाय, वे मूलतः उसे नैतिक स्तर पर स्वीकार और शारीरिक स्तर पर अस्वीकार करने की चेष्टा करते हैं.

जले हुए, झुलसे हुए लोग, बिगड़ती हुई नस्ल. लेकिन दिल्ली में युगोस्लाविया के एक भूतपूर्व राजदूत ने, जो कला मर्मज्ञ भी हैं, कहा कि हिन्दुस्तान में उन्हें किसान मजदूर औरतें दिखायी ही नहीं दीं, हर हिन्दुस्तानी औरत की चाल रानियों जैसी होती है. आग में झुलसे हुए लोग, तपा हुआ सोना. मुश्किल यह है कि आदमी तो असंख्य धातुओं का बना है. जब वह स्वयं अपनी शुद्धि करता है, तब भी अक्सर बात बिगड़ जाती है. जब वह शुद्ध किया जाता है, तो हर हालत में अनिवार्य ही, इसका एक ही परिणाम होता है, आदमी का झुलस जाना. संस्कारों में हमेशा ही एक पीड़ा निहित होती है. और पीड़ा सहने की सामर्थ्य आ जाए तो मनुष्य को ऐसी भंगिमा प्रदान करती है जो बड़ी ही गरिमामयी प्रतीत होती है. लेकिन निरपेक्षता और जड़ता का अन्तर बहुधा बड़ा बारीक होता है. निरपेक्ष बनते बनते हिन्दुस्तानी आदमी जड़ हो गया है, ब्रह्मचारी तो नहीं बन सका, नपुंसक बन गया. हज़ारों साल के संस्कारों ने हिन्दुस्तानी औरत को गज़ब की चाल ढाल प्रदान की है, किसी हद तक हिन्दुस्तानी मर्द को भी. लेकिन अन्दर से मर्द औरत दोनों झुलसे हुए हैं, और यह झुलसे हुए मन बिल्कुल सड़ गये हैं.

अतीत और वर्तमान पर नज़र डालता हूँ तो एक गहरी उदासी मन में घर कर जाती है. भविष्य की ओर देखने का साहस एकत्र करने में मन एक बार काँप जाता है. हिन्दुस्तान में जिजिवषा का अर्थ बदल गया है - किसी भी तरह शरीर से चिपके रहो. शरीर रोगी हो, कोढ़ी हो, ज़न्दगी रोगी कोढ़ी हो, खुशी की एक किरण भी न हो, फ़िर भी शरीर से चिपके रहो. बचना फ़िर भी नहीं होता. हर साल लाखों आदमी हैजे से मरते हैं, चेचक से मरते हैं, निरन्तर भूखे या अधपेटे रह कर तिल तिल मरते हैं. लेकिन हैजा और चेचक और भूख को उन्होंने स्वीकार कर लिया है. चेचक निकली है, शारदा माता आयी है. पानी नहीं बरसा, यज्ञ करो. इन्हें ख़तम करने की कोशिश में खतरा है, मौत का खतरा है. हिन्दुस्तानी आदमी पीठ पर छुरा खाता है, पीठ पर छुरा मारता है, छाती पर नहीं. और कहीं कोई संकल्प नहीं है, निष्ठा नहीं है, निर्णय नहीं है. लेकिन उदासी के इस बहुत गहरे दलदल में फँसे हुए भी हार नहीं मानी जा सकती. हार मान लेने पर तो एक ही मार्ग शेष रहता है - आत्महत्या. किन्तु हार न मानने का मतलब होता है जि़न्दगी को एक स्थायी जोखिम में डाल देना. तमाम झूठे सहारों को छोड़ देना, तोड़ देना, चाहे वह इतिहास और परम्परा के हों, चाहे धर्म और नैतिकता के हों, चाहे आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा के हों. हार न मानने का मतलब है जीवन की तमाम असुरक्षाओं को स्वीकार करना, और इन असुरक्षाओं से लड़ते हुए जीवन के अंकुर को उगाना और पोसना. बहुत मुश्किल है, बहुत ही मुश्किल है, क्योंकि हर तरफ़ सुरक्षा का आश्वासन है कि हमारी शरण में आओ. जाति की सुरक्षा, धर्म की सुरक्षा, सामाजिक संगठन की सुरक्षा, राज्य की सुरक्षा, अंधविश्वासों की सुरक्षा. न जाने कितने, कैसे कैसे अंधविश्वास हैं. हमारी शरण में आओ! सुरक्षा नहीं है. कहीं किसी में नहीं है. लेकिन दिल के बहलाने को जन्नत का ख्याल तो अच्छा है ही. और जीवन के साथ जीवन की असुरक्षाओं को स्वीकार करने की तकलीफ़ से आदमी बच जाता है.

पचीस वर्ष की आयु में विधवा हो कर जिस स्त्री ने अपनी संकल्प शक्ति के सहारे ही खुद पढ़ा लिखा, और प्राथमिक पाठशाला में नौकरी करके बच्चों को पाला पढ़ाया, उसी का लड़का जब जीवन के परिचित दायरे से बाहर निकल गया, स्वीकृति मान्यताओं के दायरे से बाहर निकल गया, तो उसकी तर्क बुद्धि ने हार मान ली. अब वह नियमित रूप से मासिक "कल्याण" पढ़ती है, और जीवन के हर सवाल का उसके पास एक ही उत्तर है - जो कुछ करता है, ईश्वर करता है.

लेकिन मैं हार नहीं मान सकता. जिन कठघरों में हम जन्म लेते हैं और पलते हैं, उनसे बाहर निकलने की चेष्टा करने वाले, हार नहीं मान सकते. उनके सामने तो एक ही मार्ग है - इन कठघरों को तोड़ना, ताकि इनसे बाहर निकल कर जीवन की समस्याओं का, जीवन की असुरक्षाओं का सचमुच सामना कर सकें, उन पर विजय पाने का वास्तविक प्रयास कर सकें.

यह लड़ाई जितनी बाहरी शक्तियों से हैं, उतनी ही अपने अन्दर खुद अपने आप से भी है - अपने संस्कारों से, न जाने कितनी ऐसी बातों से, जिन्हें हम मान कर चलते हैं, जिन्हें कसौटी पर कसने का ख्याल नहीं आता, लेकिन जो अन्धविश्वासों पर आधारित हैं, केवल अंधविश्वासों पर, ऐसे अन्धविश्वासों पर, जिन्हें सामाजिक मान्यता मिली हुई है. और यह लड़ाई हर वक्त है, हर जगह है, विचारों भावनाओं में, निजि और सार्वजनिक आचरण में, संगठित और सस्वतः स्फूर्त व्यवहार में, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सम्बन्धों में.

हार हो या जीत, यह लड़ाई तो करनी ही है. हर हालत में लगातार करनी है, क्योंकि यह तो जीवन की स्वीकृति का अनिवार्य परिणाम है. हारना मृत्यु नहीं है, हार मानना मृत्यु है. और इसलिए लड़ना ही है, जो भी हो, लड़ना ही है.

पुनश्चयः पाँच अगस्त और तेईस सितम्बर के बीच युद्ध स्थल में हुई घटनाओं में क्या ऐसा कोई संकेत है जिससे इस लेख में कुछ जोड़ना या घटाना वाँछनीय हो? इस अविधि के कुछ ही पहले यह लेख लिखा गया था, और उसके बाद भी ऐसा कुछ नहीं हो रहा है जो इस लेख की स्थापनाओं को किसी तरह प्रभावित करता हो. लेकिन उस अविधि में, विषेशतः 6 सितम्बर और 23 सितम्बर के बीच के अठारह दिनों में ऐसा लगता था कि इस बूढ़े देश के शरीर में एक बार बिजली दौड़ गई है. हो सकता है दिल्ली में रहने के कारण मुझे विषेशतः ऐसा लगता है, क्योंकि दिल्ली राजधानी होने के अतिरिक्त पंजाब से लगी हुई है, और वस्तुतः सारे देश के लिए यह बात सच न हो, या उतनी सच न हो. ऐसा भी नहीं कि जो कुछ हुआ वह सब अच्छा ही था - बहुत कुछ बुरा भी था. लेकिन इतना भी क्या कम था कि चाहे यह एक प्रकार का गृह युद्ध ही था (दो राज्य होने पर भी राष्ट्र तो एक ही है), फ़िर भी यह लड़ाई साम्प्रदायिक नहीं थी, वरना राष्ट्रीयता और साम्प्रदायिकता के बीच का पुराना विरोध एक नये रूप में फ़िर से उभरा था. दूसरे, यह लड़ाई, पीठ में छुरा भोंकने की नहीं, बराबर या लगभग बराबर के हथियारों से आमने सामने लड़ने की थी. तीसरे स्वतंत्र भारत की पल्टन, अपने ही नौजवान अफसरों के नेतृत्व में पहली बार अच्छी तरह लड़ी. जीत हार का उतना महत्व नहीं, क्योंकि कुल अठारह दिन ही लड़ाई चली, और जीता हारा गया कुल रकबा लगभग उतना ही है जितना दिल्ली नगर निगम का अधिकार क्षेत्र. महत्व की बात है कि सेना अच्छी तरह लड़ी.

इस अंतिम बात को, विषेशतः जीत को बहुत अधिक महत्व दिया जा रहा है, जबकि वास्तविक महत्व इस युद्ध के राजनीतिक कारणों का है - राष्ट्रीयता और साम्प्रदायिकता का संघर्ष. और यह संघर्ष उन तमाम संघर्षों से जुड़ा हुआ है, जिनकी गवाही मैंने इस लेख में देनी चाही है.

क्या इस युद्ध से संकेत मितला है कि लोकवादी, असाम्प्रदायिक, और सामाजिक एकता पर आधारित राष्ट्रीयता की पुनः प्रतीष्ठा पर ही देश का भविष्य निर्भर है? निश्चय ही हाँ. क्या इससे यह भी संकेत मिलता है कि इस कार्य के लिए आवश्यक शक्ति, चेतना और संकल्प देश में मौजूद हैं? इस प्रश्न का उत्तर देना कुछ कठिन है, क्योंकि इतिहास के दिशा संकेतों पर भरोसा करना खतरनाक होता है, अगर उन्हें बल देने वाले संगठित और निरन्तर सक्रिय प्रयास साथ में न हों. फ़िर भी, समस्या अंततः सीधे आत्मरक्षा की है, अपने अस्तित्व को बनाये रखने की है, और जब जान खतरे में हो, तो दुर्बल से दुर्बल प्राणी भी एक बार बहादुर बन जाता है.

भरोसा तो आखिरकार कसी बात का नहीं, सिवाय इसके कि जिन्हें एहसास है, उन्हें हर हालत में लड़ना ही होगा, चाहे लड़ाई बंदूक की हो, चाहे मन की.

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30 जुलाई 2011

अपना परिचय

ओम प्रकाश दीपकः

जन्मः २७ जनवरी १९२७, इलाहाबाद

लम्बी ख़ानाबदोशी के बाद अक्टूबर नवम्बर १९६१ से दिल्ली में. पिछले बीस पच्चीस सालों में प्रूफ़रीडरी से ले कर संपादगी तक की - संपादकी के बाद प्रूफ़रीडरी, इस क्रम से भी. अगस्त १९४२ में पन्द्रह साल की उम्र में पहली गिरफ़्तारी के कुछ दिनों बाद से ही समाजवादी आन्दोलन से सम्बद्ध रहा हूँ. ज़िन्दगी में राम मनोहर लोहिया से जितना सीखा उतना किसी और से नहीं. लिखना बहुत अनियमित रहा. दिल्ली आने के बाद से ज़रूर बहुत कुछ नियमित लिख रहा हूँ. अनुवाद किए, स्वतन्त्र पत्रकारिता भी की, सड़कें भी नापीं. आजकल "जन" का संपादन कर रहा हूँ.

१९४९ में उस लड़की से भेंट हुई थी जिसने दो साल बाद पत्नी के रूप में मेरी ज़िन्दगी में हिस्सा बँटाने का जोखिम भरा सफ़र शुरु किया. अभी तो सफ़र चल ही रहा है. एक बेटा है, दो बेटियाँ.

इस परिचय को उनके हाथ की लिखायी में पढ़िये.

(ओम प्रकाश दीपक ने यह अपना परिचय एक आलेख संग्रह के लिए तैयार किया था.)

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29 जुलाई 2011

छिटपुट

हैदराबाद, 5 फरवरी 1957

आज कमला का एक पत्र और आया है. पैसे मिल गये थे. हाल तकरीबन अच्छा ही है. लिखा है कि दिल्ली जा रही हूँ. अगर टैक्स देना पड़ा तो माता जी को अपने पैसों में से ही देना पड़ेगा. डेढ़ सौ कर्ज़ भी लिया माता जी ने और सब इधर उधर में ही निकल गया. मई में गुड्डे का मुंडन करना होगा. पता नहीं मानवी के पैसे उसके लिए मिलेंगे या नहीं.

पत्र में कमला ने मेरी उस डायरी का भी ज़िक्र किया है जो मैंने लखनऊ में लिखा था. तब से अब बहुत कुछ बदल गया है. जीवन में वह तनाव नहीं है, न अच्छा, न बुरा. जो जीवन की अनिवार्य आवश्यकताएँ हैं, उसकी क़दर शायद मैंने अधिक सीख ली है और उससे अधिक की मांग करना कमला ने बन्द कर दिया है. हम दोनो में कुछ दिमागी प्रौढ़ता भी आ गयी है. सम्बन्धों की बात क्या करूँ? चमक कम है, स्थायित्व ज़्यादा है. चमक भी शायद इसलिए कम है कि कि फुर्सत ही नहीं है. मैं अलग फँसा हूँ और मुझसे भी ज़्यादा वह फँसी हुई है, घर के झँझटों में. चमक कहाँ से आये. लेकिन इस एक साल के अन्दर अगर उसका स्वास्थ्य ठीक हो जाये और पैसों का दिन रात का रोना ख़तन हो तो चमक भी फ़िर आ जायेगी, यह निश्चित ही है.

और कोई विषेश बात नहीं है. इंदुमति की पुस्तिका पहले तैयार करनी है. उसके बाद रिपोर्ट. साप्ताहिकी का काम सो संभवतः कल खंतम हो जायेगा.

बड़ी बहन जी और कशपी को ख़त लिखे थे, आज भेज भी दिये हैं.

हैदराबाद, 7 फरवरी 1957

कमला का एक पत्र कल दिल्ली से आया. ठीक ही है सब जवाब भी कल रात को भेज दिया था. बद्री आज दफ्तर आये थे, लेकिन मैंने कोई बात नहीं की, तबियत भी नहीं है कि करूँ. फ़िर किसी समय भेंट हुई तो जितेन्द्र सिंह, लक्ष्मीकांत और लक्ष्मीनारायण लाल वगैरह की शिकायत पहुँचा दूँगा. देखूँ क्या कहते हैं. भारती को चिट्ठी लिखनी चाहिये. याद रहा तो लिखूँगा.

रमा को आज लोकनाथ ने टेलीफ़ोन किया था. उसके पहले एक टेलीफोन रीवा से आया था. विधानसभा में निशान "पंजा" दे दिया है और रमा को "पेड़". लोकनाथ आज दिल्ली जा रहा है. यह जो सिलसिला चुनाव कमिश्नर ने निकाला है यह तो पार्टी पद्धिति के ही विरुद्ध है. देखें क्या होता है.

इन्दिरा गाँधी ने प्र.सो.पा. पर जो आरोप लगाया था, वह वापस ले लिया है, नेहरू के कहने पर. कुछ टीका करना व्यर्थ है. सिहोरा की रिपोर्ट लिखनी आज शुरु की है.

भविष्य का सिलसिला कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि क्या होगा. गोस्वामी ने आज कुछ काम देने को कहा है, पचीस तीस रुपये का. चलो यही सही.

इन्दुमति को भी एक पत्र आज भेजा है. पुस्तिका के बारे में. उसमें भी डाक्टर साहब से डाँट खानी पड़ेगी शायद.

और क्या लिखूँ, दिमाग खाली सा ही है. वह कहानी जो अंग्रेजी में लिखनी शुरु की है, पूरी करनी है. कल से कुछ चिट्ठी पत्री भी शुरु करनी है.

हैदराबाद, 8 फरवरी 1957

आज सुबह कृष्ण कुमार का पत्र आया है. गोपी ने उसे पैसे नहीं दिये और वह चुनाव नहीं लड़ सका. उसे उत्तर भी आज भेज दिया है, देखें क्या जवाब देता है.

सोच रहा हूँ कि किन्हीं विदेशी पत्रिकाओं के लिये अगर कुछ लिखूँ तो काफ़ी पैसा मिले. सुरेन्द्र से भी इस पर बात की है. वह खुद कुछ लिखने की सोच रहा है. कल अगर USIS की लायब्रेरी से जा कर कुछ पते ले आऊँ तो परसों एक लेख लिख डालूँ और एक आध को भेज दूँ. अगर एक भी छप जाये तो काफ़ी पैसे मिल जायें. Books Abroad के लिए Asian Writers Conference पर भी कुछ लिख कर भेज सकता हूँ. या Harper's Magazine भी कुछ काम की हो.

(ओम की डायरी से)

09 जुलाई 2011

ओम की डायरी

हैदराबाद, 3 फरवरी 1957

कई सालों के बाद फ़िर जर्नल लिखना शुरु कर रहा हूँ. इस बीच में कितना कुछ हो चुका है. पार्टी टूटी, नयी पार्टी बनी. "संघर्ष" तो मैंने शायद पिछली डायरी लिखने के समय ही छोड़ दिया था, लखनऊ भी छूटा. इलाहाबाद जाते ही मकान भी बिक गया, फ़िर गोपा मर गई. दस महीने लीडर प्रेस में प्रूफ़ पढ़ने के बाद उसे भी छोड़ा, छः महीने "आदमी" निकालने की चेष्टा करता रहा, फ़िर जुलाई छप्पन से यहाँ हैदराबाद में हूँ. पिछली बातों पर नज़र क्या डालूँ, नये साल से ही शुरु करना अच्छा होगा. मन में तो न जाने क्या क्या है. सब लिख भी नहीं सकूँगा.

सम्मेलन में जाने से पहले नव हिन्द वालों के लिए एक किताब लिखी, और मिले कुल डेढ़ सौ रुपये जबकि रायल्टी का हिसाब होता तो छः सौ बनते. कुछ अनुमान इसी से लग जाता है कि यह दुनिया क्या है, किस वातावरण में हूँ. मेरे जैसों की जगह कहाँ है, कुछ यही समझ में नहीं आता. यहाँ भी काम नहीं चलता. सब मिला कर पिछले सात महीनों में सात सौ रुपये पार्टी के और पांच सौ रुपये ऊपर से, कुल बारह सौ रुपये मिले हैं जिसमें से आठ सौ रुपये तो कमला को भेजे, 400 खुद खर्च किये और दो सौ का कर्ज़ है. मतलब हुआ कि दो सौ रुपये से कम में काम नहीं चल सकता. लेकिन दो सौ रुपये आयें कहाँ से? दफ्तर से सौ मिलते हैं, विपिन के आने पर बात करूँगा, तब शायद डेढ़ सौ कर दें. लेकिन 50 रुपये महीने की तो फ़िर भी कमी रहेगी ही. मार्च तक तो छोड़ कर जाना भी मुमकिन नहीं. समस्या यह है कि मार्च तक भी काम कैसे चलेगा. और छोड़ कर जाऊँगा भी कहाँ? सोच रहा हूँ कि कुछ विदेशी पत्रिकाओं के लिए कुछ लिखा करूँ. लेकिन एक तो कोई सिलसिला नहीं. दूसरे, अगर कोई छापे भी तो सम्पर्क बनाते कुछ समय लगेगा. ख़ैर कोशिश तो करूँगा ही, देखो क्या होता है.

इस बार इलाहाबाद की यात्रा सुखद से अधिक दुखद रही. जो हाल है घर का, उसने मन पर विचित्र सा बोझ छोड़ दिया है. माता जी अब थक गयीं हैं, उन्हें अब आराम की ज़रूरत है. लेकिन अगर वे काम छोड़ दें, तो वह आमदनी भी बन्द हो जाये. कमला सुबह छः बजे से ले कर रात तक जुटी रहती है, फ़िर भी उसे न मानसिक शान्ती है, न शारीरिक सुख सुविधा. गुड्डा बेचारा अलग परेशान रहता है. मुनियाँ से उसे कोई ईर्ष्या नहीं होती, लेकिन वह प्यार का, ध्यान का भूखा रहता है. दूसरी ओर माता जी और कमला के भावनात्माक तनाव के बीच, उसकी दुर्दशा हो जाती है. हिन्दुस्तान के ज़्यादातर घरों की हालत कहीं बुरी है, इससे कैसे संतोष मिले. उन्हें तो चेतना नहीं है. शारीरिक दुख वे उठाते हैं, लेकिन मन में उसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती. अपने साथ तो शरीर का दुख गौण और मन का दुख प्रधान है. भौतिक जीवन में भी सफ़ाई से रहना हमने सीखा है, इस कारण और भी कष्ट होते हैं. सफ़ाई से रहने के लिए पैसा चाहिये.

उस दिन गुड्डे को मैंने पीटा, वह मुझे बहुत दिन तक नहीं भूलेगा. गलती हमारी थी, उसे ले कर जाना ही नहीं चाहिये था. उसके वे शब्द, "मारो नहीं" न जाने कब तक मेरे कानों में गूँजते रहेंगे. कैसी क्रूरता है जीवन में. कैसी विडम्बना है. उसे बुखार में छोड़ कर आया था. न जाने कैसा है अब. कमला ने अभी तक पत्र नहीं भेजा.

(ओम प्रकाश दीपक की डायरी से)

02 जुलाई 2011

तस्वीरें

आज पहले समाजवादी पार्टी के अखिल भारतीय सम्मेलन से जुड़ी करीब पचास साल पहले की दो तस्वीरें प्रस्तुत हैं.

Badge, All India Socialist party assembly, 1959

Badge, All India Socialist party assembly, 1962

एक तीसरी तस्वीर है एक व्यक्ति की जिसे मैं नहीं पहचान पाया. क्या आप में से कोई बता सकता है कि यह कौन हैं?

Some person

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15 जून 2011

परंपरा और शूद्र नारी

परंपरा और शूद्र नारी
किशन पटनायक, सामयिक वार्ता, जून 1999

टिप्पणी - किशन पटनायक (1930 - 2004), समाजवादी धारा के प्रमुख चिंतक, लेखक और नेता थे. बचपन से मैंने उन्हें अपने पिता के मित्र के रूप में जाना था, और पिता के सभी मित्रों में से वे मेरे सबसे प्रिय थे. जब तक वह थे, आज यह स्वीकारते हुए शर्म आती है कि मैंने उनका लिखा कभी कुछ नहीं पढ़ा था, उनकी मृत्यु के बाद ही उनका लिखा पढ़ना शुरु किया. आज "ओम और कमला" पर उनका एक विचारोतेजक आलेख प्रस्तुत है जो सामयिक वार्ता पत्रिका में सन् 1999 में छपा था.

किशन की यह तस्वीर मैंने 2003 में खींची थी जब वह दिल्ली में एक गोष्ठी में बोलने आये थे, वही आखिरी बार थी जब मैंने उन्हें देखा था.

Kishen Patnaik, Indian socialist leader, image by S. Deepak

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पिछले एक दशक या अधिक समय से एक ऐसी जीवन दृष्टि समूची दुनिया पर हावी होती जा रही है कि प्रचलित मूल्यों में किसी प्रकार का बड़ा परिवर्तन जल्दी दिमाग को सूझता नहीं है. जब सत्ता और विचार दोनो एक ध्रवुवीय हो जाते हैं तब बुनियादी परिवर्तन की बात सामान्य मालूम होती है. लगता है, जो है वही रहेगा. सत्ता की पहल से ही कोई सुधार हो सकेगा.

जब तक स्थापित सत्ता और प्रचलित विचार को चुनौती देने वाला कोई दूसरा ध्रुव दिखायी नहीं पड़ता है, तब तक किसी बड़े बदलाव के पक्ष में भावनाएँ पैदा नहीं होती. बदलाव की कल्पना बिखरे हुए सोच और छिटपुट कर्म तक सीमित रहती है.

नारी आंदोलन इस जड़ता का शिकार है. इस भ्रम का शिकार नहीं होना चाहिये कि उदारीकरण जगतीकरण के युग में आर्थिक लक्ष्यों पर आधारित क्रांतीकारी आंदोलन का न होना तो स्वाभाविक है, लेकिन नारी आंदोलन तथा अन्य सामाजिक आंदोलन अधिक गतिशील होंगे, क्योंकि जगतीकरण आधुनिकता का वाहक है. असलियत यह है कि आधुनिकता का जो नया दौर आया है उसका नारी आंदोलन से कोई सकरात्मक संबंध नहीं हो सकता है.

नारी की स्वतंत्रता और नारी पुरुष के बीच सामाजिक समानता का कोई आक्रामक विचार दुनिया के किसी कोने में प्रभावी नहीं है. जिन दिनों जनतंत्र को अधिक प्रगतिशील बनाने के लिए वैचारिक सरगरमी थी, या पूंजीवाद, साम्राज्यवाद, तानाशाही और रंगभेद आदि के विरुद्ध संघर्ष और विचार दोनो स्तरों पर आंदोलनों की तीव्रता दुनिया के विभिन्न देशों में थी, उन्ही दिनों दबे हुए अन्य मानव समूहों के साथ साथ महिलाओं का आंदोलन भी सक्रिय हुआ था. स्वतंत्रता और समानता जैसे मूल्य मनुष्य मात्र के लिए ज़रूरी लगते थे, यह एक वैचारिक स्थिति थी. इसी से प्रेरित हो कर मजदूर आंदोलन भी संगठित हो जाता था और नारी आंदोलन भी. जब सम्रग वैचारिक परिप्रेक्ष्य के केन्द्र से समानता का मूल्य हट गया है तो नारी वर्ग में उसकी आकांक्षा कँहा से आयेगी? (प्राचीन भारत की समग्र विचार संपदा में स्वतंत्रता का मूल्य स्पष्ट नहीं होता है, लेकिन समत्व विचार के केन्द्र में था)

सत्तर अस्सी के दशकों में पश्चिम के नारी आंदोलन में एक ज्वार आया था जिसका प्रभाव विकासशील देशों में भी अनूभूत हुआ है. आंदोलन के प्रभावी दौर में भी यह परिभाषित नहीं हो सका कि नर नारी समानता का क्या मतलब है? नारी पुरुष की जो प्राकृतिक भिन्नताएँ हैं उसके साथ समानता का समन्वय कैसे हो सकेगा, और प्रचलित विषमतापूर्ण अर्थव्यवस्था में वह कितना संभव है? क्या हमारी साँस्कृतिक मान्यताएँ उसके अनुकूल हैं? इन प्रश्नों पर स्पष्ट विचार न होने के कारण उपर्युक्त आंदोलन का गहरा और व्यापक प्रभाव विकासशील देशों के समाजों पर नहीं हो पाया है.

Art work by Sunil Deepak on the theme women, castes, India

भारत में हाल के दिनों में संसद में आरक्षण के सवाल को ले कर नारी आंदोलन में तीव्रता आयी, लेकिन बहुत सारे सवाल जो पहले उठते थे, छिप गये हैं. पानी, ॡाखाना, चूल्हे आदि सवालों को मौजूदा नारी आंदोलन अपनाना नहीं चाहता है. कहा जाता है कि नारी आंदोलन का नेतृत्व शहरी मध्यवर्गीय है. ऐसा होना कोई गलत बात नहीं है. सवाल है कि क्या आंदोलन का लक्ष्य दूरगामी है और अधिकांश महिलाओं के जीवन से इसका संबंध है? पानी, पाखाना, चूल्हा, यह सब महिलाओं की समस्या नहीं, पूरे समाज की समस्या है. नारी पुरुष दोनों की समस्या तो है ही. लेकिन इन समस्याओं से महिलाओं की तकलीफ़ ज़्यादा बढ़ती है, इसीलिए इन्हें महिला आंदोलन का विषय बनना चाहिये. इन सवालों को उठा कर ही दबी कुचली महिलाओं की चेतना में समानता की आकांक्षापैदा की जा सकती है. मध्य वर्ग में पैदाइश के कारण नहीं, बल्कि सामान्य और देहाती महिलाओं के सवालों को न उठा पाने के कारण नारी नेतृत्व का चरित्र शहरी मध्यवर्गीय हो जाता है.

दहेज, और विज्ञापन में नारी का प्रदर्शन भी आंदोलन का महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं रह गया है, क्योंकि आधुनिक उदारवादी विचारधारा ने उपभोक्तावाद को संपूर्ण स्वीकृति दे दी है. दहेज का प्रचलन तेज नहीं होगा तो अधिकांश देहात में रंगीन टेलीविज़न और दोपहिए वाहनों की बिक्री बंद हो जायेगी. विज्ञापन में नारी के जिस ढंग के प्रदर्शन को अपसंस्कृति माना जाता था वह अभी देश के महानगरों में संभ्रांत समाजिकता की सूचक है, वही आधुनिक जीवन शैली है. इंडिया टुडे, आउटलुक आदि पत्रिकाओं का एक विषेश काम है जीवन शैली और जीवनदर्शन के ऐसे विचारों को प्रसारित करना जो उदारीकरण की अर्थव्यवस्था के पोषक हैं. लगभग समूचा शिक्षित वर्ग इन विचारों का अनुमोदन कर रहा है. पानी पाखाना जैसी सुविधाएँ सबके लिए हों, ऐसी बातें इस विचारधारा में निहित नहीं हैं. इसलिए इस वक्त की प्रमुख और एकमात्र विचारधारा शंघर्ष किये बगैर कोई महिला आंदोलन बहुजन महिलाओं का सवाल नहीं उठा सकता है. उदारवादी विचार का समर्थक नारी संगठन सिर्फ महिलाओं पर होने वाले स्थानीय अन्याय अत्याचार के विरुद्ध आवाज़ उठा सकता है, या विदेशी अनुदान देने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा सुझाये गये कार्यक्रमों को चला सकता है.

ऐसी हालत में आधुनिकता बनाम परंपरा की बहस से जल्दी कोई निष्कर्ष निकलने वाला नहीं है. आधुनिकता ने नारी और पुरुष को समान माना है, लेकिन आधुनिक संस्कृति और अर्थव्यवस्था इसके अनुरूप नहीं हैं. पश्चिम के विकसित देशों के समाज में नारी का स्थान दोयम दर्जे से बेहतर नहीं है. कुछ देशों में आर्थिक रूप से असहाय तबका न होने के कारण यह जल्दी दीखता नहीं है. अत्यंत धनी देशों में असहाय और बेरोज़गार नागरिकों को मिलने वाली सरकारी सहायता अगर हटा दी जाये तो नारी की स्थिति बदतर हो जायेगी. गरीब राष्ट्र इस प्रकार की सहायता नहीं दे सकते हैं. इस बात का खंडन कोई नहीं करता है कि उदारीकरण से महिलाओं की बेरोज़गारी बहुत अधिक बढ़ जायेगी. न सिर्फ रोज़गार का दायरा संकुचित होगा, ब्लकि बेरोज़गार औरतों का स्थान परिवार में भी नहीं होगा. उदारवादी विचार में इस संकट का कोई समाधान नहीं है. कुछ अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ जिस प्रकार का सुझाव दे रही हैं वह विकासशील देशों की नारी को गुलाम बनाने की दिशा में है.

तर्क के लिए कहा जा सकता है कि परंपरावादी विचार इससे बेहतर था. नारी पुरुष की विषमता को प्राकृतिक या दैवी नियम मान कर उसके अनुरूप जो संस्थाएँ बनायी गयी थीं उनमें सुरक्षा और संतुलन पर ध्यान दिया जाता था. पारंपरिक समाज में जब यह संतुलन नष्ट हो जाता था, तब समाज की पतनशीळ अवस्था आ जाती थी. सारे संगठित धार्मिक समाज नारी को दोयम दर्जा देते हैं. असमानता के सिद्धांत को मान लेने के बाद कई जटिलताएँ खत्म हो जाती हैं. सुरक्षा समाज का दायित्व हो जाती हैं. समाज पर विपत्ति आने से नारी को अधिक कष्ट होगा, कारण वह नारी है.

असमानता के दर्शन को मानने वाला समाज का विकास जब स्थिर ढंग से होता है तब नारी व्यक्तित्व के कुछ गुणों का खास विकास होता है. ये गुण बहुत सभ्य और सुंदर लगते हैं. इन गुणों को तीन विभागों में एकत्रित किया जा सकता हैः मातृत्व भाव के गुण, भोटे पैमाने के कार्य में कुशलता और रूप सज्जा. इन गुणों का विकसित होना पारंपरिक समाज की उपलब्धी मानी जाती है. इन में से कुछ गुण कुछ खास प्रकार के सामाजिक आर्थिक घेरे में रहने का परिणाम है, और कुछ गुण संभवतः नारी प्रकृति का पूर्ण विकास हैं. इस पर कोई विस्तृत समाज शास्त्रीय बहस नहीं हुई है कि इन आकर्षक गुणों में से किन गुणों को जान बूझ कर शिक्षा के माध्यम से आगे बढ़ाना चाहिये. सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि असमानता के दर्शन को बगैर माने नारी के इस आकर्षक व्यक्तित्व को काफ़ी हद तक बनाये रखने के लिए समानता की एक नयी संस्कृति और नयी आर्थिक व्यवस्था की ज़रूरत हो सकती है. कुछ पारांपरिक गुण ऐसे हैं जिनको समानता के किसी भी ढांते में छोड़ना ही होगा. गांधी और रविन्द्रनाथ के विचारों मे यह संदेश मिलता है कि नारी के पारंपरिक व्यक्तित्व का एक अंश नारी की महत्वपूर्ण विषेशता है. उसको बनाये रखने के लिए संस्कृति और अर्थ व्यवस्था की आधुनिक अवधारणाओं को बदलना होगा. इस विषय पर उनके बाद के समय में ज़्यादा चर्चा नहीं हुई है, समाजशास्त्र में तो बिल्कुल नहीं हुई है.

सामाजिक संरचना में जब सबसे निजी सम्पत्ति और हिंसा को संस्थागत रूप दे दिया गया है तब से नारी का दोयम दर्जा स्थापित हो गया है. उसके पहले की तस्वीर बहुत साफ़ नहीं होने पर भी इतना स्पष्ट है कि नारी नेतृत्व वाले बड़े मनुष्य समूह बड़ी संख्या में रहे हैं. जैसे जैसे निजि सम्पत्ति और हिंसा की व्यवस्था दृढ़तर होती गयी है नारी नेतृत्व वाले जन समूहों की संख्या घट कर अब शून्य में आ गयी है. इसका समाजशास्त्रीय निष्कर्ष निकलना चाहिये. आधुनिकता का जो नया दौर जो भारत जैसे विकासशील देशों में चल रहा है उसमें सम्पत्ति व्यवस्था का निजिकरण अधिक तीव्रता से हो रहा है. निजि सम्पत्ति प्राप्त करने की होड़ में कामयाब हुए बगैर कोई महिला सम्मानजनक अस्तित्व नहीं बचा सकती है.

इसी अर्थ में पारंपरिक समाज की औरत ज़्यादा सुरक्षित (या व्यवस्थित) थी. पारंपरिक समाज में निजि संपत्ति का पैमाना छोटा था और सार्वजनिक संपत्ति अधिक थी. कमजोर तबकों का भरण पौषण सामूहिक संपत्ति से भी हो जाता था. पूँजी के बिना भी कई प्रकार के धंधे चलाये जा सकते थे. कुछ प्रकार के धंधे विषेशकर परित्यक्तताओं और विधवाओं के लिए होते थे. पूँजीवादी उद्योगीकरण के पहले के अधिकांश समाजों की संरचना ऐसी थी कि असहायता तथा बेरोजगारी को रोका जाता था. भारत के कई क्षेत्रों में उत्पादन और वितरण की सामूहिक व्यवस्थाएँ थीं. ध्यान देने वाली बात यह है कि परंपरा का यह सामाजिक पहलू नहीं, आर्थिक पहलू है. भारत में जो परंपरावाद की इस समय मुख्य धारा है वह सामाजिक और धार्मिक परंपराओं पर ही ध्यान केन्द्रित करती है. पूँजीवादी अर्थ व्यवस्था या पूँजीवादी प्रौद्योगिकी पर उसने कभी कोई आपत्ति नहीं की.

सामाजिक परंपरा को ही लें तो परंपरा के कई कालखंड हैं. भारतीय परंपरा की मुख्यधारा का आग्रह उन सामाजिक परंपराओं के बारे में है जो ब्रिटिश पूर्व उत्तर भारत भारत में प्रचलित थीं. ब्रिटिश पूर्व काल में तथा ब्रिटिश राज के प्रारम्भिक काल में गंगा यमुना के क्षेत्र में नारी से संबधित जो द्विज परंपरा थी, उसको भारत की निकृष्ट परंपरा मानना चाहिये. सती, घूँघट, बाल विवाह आदि प्रथाओं का प्रकोप देश के अन्य क्षेत्रों में, विषेशकर गैरद्विज समूहों में नगण्य था. भारत का सामाजिक सास्कृतिक इतिहास नहीं लिखा गया है. जो तथ्य आ चुके हैं उनके आधार पर कहा जा सकता है कि उपर्युक्त काल में भारत की अर्थ व्यवस्था मजबूत थी, गाँव की शासन व्यवस्था अच्छी थी, लेकिन सामाजिक व्यवस्था अच्छी नहीं थी. राष्ट्रीय चरित्र पतनशील था. पतनशीलता का आरंभ शायद सातवीं या आठवीं सदी से हो रहा था.

असल में भारत का इतिहास इतना लम्बा है कि "भारतीय परंपरा" को अच्छा या बुरा कहने का कोई मतलब नहीं होता है. परंपराओं का उत्थान पतन हुआ है. हम किस परंपरा की बात कर रहे हैं? इस विषय पर आलोचनात्मक दृष्टि न रहने का परिणाम यह है कि अतीत की कुछ गलत परंपराओं पर पलने वाले निहित स्वार्थ समूह परंपरावाद को अपना गढ़ बना लेते हैं. उनका विरोध करने वाले आधुनिकों का एक प्रगतिशील खेमा बन जाता है. दोनो का सह अस्तित्व और संयुक्त राज लंबे समय तक बना रहता है. भारत और अरब देशों का उदाहरण हमारे सामने है.

ब्रिटिश पूर्व काल में भारतीय नारी दोहरे अनुशासन के कटघरे में थी, जातिप्रथा और नारी का दोयम दर्जा. नारी का दोयम दर्जा तो सारी दुनिया की बात है. लेकिन उसके अतिरिक्त जातिप्रथा की कट्टरता के चलते द्विज नारियों को विषेश रूप से शुद्ध रहना पड़ता था. व्यवहार में सती की घटना बहुत ज़्यादा न होने पर भी सती होना एक आदर्श था. परंपरावाद का एक बौद्धिक खेमा है जो उसके औचित्य को समझाने का तर्क प्रस्तुत करता है.

द्विज समाज के बाहर विधवा विवाह पर भी पाबंदियाँ नहीं थीं. द्विज समाज कुल भारतीय समाज का छोटा सा अंश था. लेकिन परंपरा की दृष्टि से जब हम "भारतीय नारी" की बात करते हैं, हमारे सामने द्विज (शास्त्र के हिसाब से उच्च जाति की) नारी की तस्वीर खड़ी हो जाती है. समाज की आम धारणा में द्विज नारी ही अधिक सभ्य और शास्त्र के द्वारा समर्थित थी. शूद्र नारी अधिक स्वच्छंद थी, उसके लिए यौन संबंधी नैतिक मानदंड स्वभाविकता के नज़दीक था. वह आर्थिक रूप से स्वावलंबी हो सकती थी, कारीगर बन सकती थी, सर्वसाधारण में हँस सकती थी और नाच सकती थी. व्यवहार में इतना भिन्न होने के बावजूद शूद्र नारी परंपरा को एक भिन्न परंपरा के रूप में चिन्हित नहीं किया जाता है. परंपरा की चर्चा में उसकी बात को छुपा दिया जाता है. यह समझ लिया जाता है कि धर्म शास्त्रों का प्रभाव शूद्र जातियों तक नहीं पहुँच पाता है, इसलिए उनका आचरण निकृष्ट हिंदू है. निकृष्ट हिंदू होने का भ्रम अधिकांश मंडलवादी तथा आधुनिकतावादी शूद्रों को भी है. जब भी उनके पास पैसा व प्रतिष्ठा आने लगते हैं, वे अपनी महिलाओं को द्विज नारी के साँचे में ढालने की कोशिश करते हैं.

यह शूद्र परंपरा आयी कहाँ से? एक अनुमान यह हो सकता है कि यह किसी बेहतर परंपरा का अवशेष है. जातिप्रथा की कट्टरता के पहले या उस कट्टरता के विरुद्ध जो प्रभावी धाराएँ थीं उनके अवशेष पर शूद्र परंपरा आधारित है. बौद्ध, लिंगायत, शक्तिपूजक जितनी सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराएँ थी, उनकी अपनी अपनी सामाजिक व्यवस्था विभिन्न क्षेत्रों में थी. बाद के समय में मनुवादी हिंदू धर्म आक्रामक हो कर पूरे भारतीय समाज को जाति प्रथा के कठोर ढाँचे में संगठिक करने की कोशिश करता है. समूचा भारत उस ढाँचे के अंदर नहीं संगठित हो सका, लेकिन बौद्धिक स्तर पर उसने विजय प्राप्त कर ली. गैर मनुवादी भारतीय शास्त्र, दर्शन और संस्थाओं को खत्म करने की कोशिश ब्रिटिश काल में भी जारी रही. भारत की सारी प्राचीन विद्या शुद्र नारी परंपरा का विरोध नहीं करती है. प्राचीन साहित्य का एक बड़ा हिस्सा है जिसमें वर्णित समाज का ज़्यादा सामंजस्य शूद्र नारी परंपरा से है. राधा, पार्वती, द्रौपदी, वाल्मीकि की सीता जैसी नायकाओं का व्यवहार शूद्र नारी व्यवहार से जुड़ता है और ब्रिटिश पूर्व काल की द्विज नारी से बिल्कुल मेल नहीं खाता. अगर हम ब्रिटिश पूर्व उत्तर भारत की द्विज परंपराओं को एक पतनशील समाज की विकृति मान ले तो भारतीय नारी का बेहतर स्वरूप सामने आ सकता है. विडंबना यह है कि प्रभावशाली परंपरावादी उसी को असली भारतीय नारी मानते हैं, जो एक विकृति है.

कुछ विद्वान समूह शास्त्रों और परंपराओं को बौद्धिक और गैर बौद्धिक इन दो हिस्सों में बाँटते हैं. रक्षणशीलताको बौद्धिक धारा के साथ जोड़ दिया जाता है. यह गलत है. शायद पश्चिम की अध्ययन पद्धति का यह एक प्रभाव है. परंपराओं और विचारों में बहुत घालमेल है. ऐ एक का त्तव दूसरे में चला गया है और उसमें पूरी तरह से मिल गया है. काल खंडो के आधार पर ही भारत सृजनशील और पतनशील समयों में चिन्हित किया जा सकता है. इसमें कहीं कहीं क्षेत्र की विषेशता होगी. भौगोलिक तौर पर जाति प्रथा का बहुत ज़्यादा फैलाव अँगरेज़ों की हकूमत में हुआ. फ़िर भी अनेक क्षेत्रों में जातिप्रथा का संगठन नहीं हो सका. वहाँ की परंपराएँ बची रह गयी हैं. परंपराओं का सही अध्ययन तब होगा जब विभिन्न कालों और विभिन्न क्षेत्रों की स्वस्थ परंपराओं को जोड़ कर भविष्य निर्माणकारी तत्वों को सूत्रबद्ध करने का प्रयास होगा.

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19 फ़रवरी 2011

एक खिड़की खुली छोड़ देना

आज तुम्हारे बेटे का जन्मदिन है, वह अड़तालिस का हो जायेगा. वह आज कल नादिया के साथ न्यागाराह फालस के पास किसी स्थान पर अपनी संस्था की मीटिंग के लिए आया हुआ है. सतरह जून को दोनो यहां हो कर जायेंगे. मिनी भी लास एजेल्स अंजोर के पास आयी हैं सो आज अंजोर के साथ शाम को यहां आयेंगी एक सप्ताह के लिए. अंजोर के बेटा हुआ है, वह दादी और मैं परदादी बन गयी हूँ. मुझे बहुत अच्छा लगा परदादी बन कर. देखो कितनी लम्बी ज़न्दगी मुझे मिली है. तुम्हारे परिवार में मैं ही हूँ तुम्हारी पीढ़ी में शेष बची. सुख और दुख दोनो ही देख रही हूँ. बच्चों का स्नेह बहुत ही मिला है मुझे.

पिछले वर्ष बम्बई में थी कुछ दिन. बेटे बहू ने बहुत या यूँ कहूँ भरपूर स्नेह दिया. शोभा और निधु ने कमी महसूस नहीं होने दी दीदी जीजा की. परन्तु उनसे जुड़ी छोटी छोटी घटनाँए चलचित्र जैसी घूमती रहीं दिमाग में. निधुजी का घर कोलाबा के बधवार पार्क में दसवीं या इससे भी उपर की मंज़िल में था. चारों ओर समुद्र का अथाह जल ही जल. वहीं से गोवा भी विनी ले गयी थी. होटल समुद्र के किनारे ही था, वही जल ही जल खिड़की से दिखायी देता था. इसी सब को याद करके न जाने क्यों आज मुझे लोर्का की एक पंक्ति याद आ गयी कि "जब मैं मरूँ तो बालकनी की एक खिड़की खुली छोड़ देना". देखो ना कहाँ से कहाँ मन भटक गया है. मुझे लगता है कि जब अधिक स्नेह मिलता है तो ऐसे विचार ही जीवन को कुछ दिशा देने लगते हैं.

यहां पिंकी इसी महीने में किराये का घर छोड़ कर अपने घर में जायेगी. बोस्टन का घर छोड़ कर इसी वाशिंगटन के एरिये में घर खरीदा है उसने. तेरह जुलाई को मैं लौट जाऊँगी. पंद्रह दिन नये घर में रहना हो जायेगा. उनतीस जून को नये घर में जायेगी. गुड्डा भी एक सप्ताह ही रहेगा. जब यहाँ आ रही थी तो इस बार इटली का वीज़ा ही नहीं मिला था. सो ठीक ही है यहीं नादिया से भी भेंट हो जायेगी. गुड्डा तो अपने काम से भारत आता जाता ही रहता है. मार्को को करीब तीन वर्ष पहले देखा था. लम्बा हो गया है या यह कहना चाहिये कि जवान हो गया है पोता.

और तो कोई विषेश बात नहीं है. अशोक जी के पत्र लगातार आते हैं. इस बार कलकत्ता भी जाने की सोच रही हूँ, दिनेश दा को देखने का मन हो रहा है. बीमार भी चल रहे हें वह. अशोक जी का उनसे सम्पर्क बना रहता है, तो उनका समाचार मिलता रहता है. कुछ तुम्हारी पत्रिका भी वहां से निकल रही है. शायद बालकृष्ण स्वयं तो नहीं रहे, लेकिन भाई हैं उनसे भी मिल कर शायद तुम्हारी कुछ चीज़ें मिलें. और तो सब प्रयास चल ही रहे हैं.

पता नहीं क्यों, घूमना भी अब अधिक अच्छा नहीं लगता. इलाहाबाद में कृष्णा शरण को देखे भी मुद्दत ही हो गयी है. कब जाना होगा, कौन जाने. इस बार जहाँ जहाँ रही हूँ तुम्हारे साथ उन जगहों को पुनः देखने का मन कर रहा है. जब तक हूँ सोचती हूँ कि अपने ऊपर लिखना शुरु करूँ चलचित्र की तरह, सबके साथ चलता रहता है रात दिन तुम्हारे साथ जिया जीवन. अधूरा ही सही.

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माँ की डायरी से, जून 2002 बेथेस्डा अमेरिका. पिछले साल, आज के दिन ही माँ की अस्थि विसर्जन के लिए गये थे.

06 फ़रवरी 2011

उलझने

1 मई 2000 दिल्ली

ज़िन्दगी में कुछ इस तरह उलझी रही कि उस समय सुख की कद्र नहीं कर पायी और आज बार बार अतीत को याद करके लगता है कि मेरे पास कुछ ऐसा था जिसे मैं संभाल कर नहीं रख पायी. उस हीरे की कीमत लगा नहीं पाई थी. ज़िन्दगी के अन्य झमेलों में उलझी कहीं और ही भटकती रही. वह सब अब आयु के साथ इस पड़ाव में बहुत याद आ रहा है. इधर बहुत दिनों से तुम्हे देखा भी नहीं.

फ़रीदा ख़ानुम्म की गज़ल "आज जाने की ज़िद न करो, यू ही पहलू में बैठे रहो, जान जाती है जब उठ के जाते हो तुम" की पंक्तियाँ दिमाग में घूमती हैं. फ़ैज़ को भी इधर बहुत दिनो से नहीं सुना. शायद वह कैसेट गुड्डे के पास है.

12 जून 2001 दिल्ली

इधर समय कुछ ऐसे गया कि कुछ पता ही नहीं चला. पिछले वर्ष मई 2000 में लिखा था, उसके बाद तुम्हारी लेखन सामग्री इकट्ठी करने में जुट गयी. पिंकी के पास से फरवरी 2000 में दिल्ली लौट आयी थी. चार वर्ष पूर्व कोहाट की ज़मीन बेच कर अलकनंदा में घर खरीदा था, स्वयं वहां रह नहीं पायी, लेकिन सामान सब वहीं रखा है. अधिक समय पिंकी के वास विदेश में निकल जाता है. यहाँ आ कर विनी के घर रह जाती हूँ. घर पास ही है, बीच बीच में जाती रहती हूँ.

इधर एक इच्छा हो रही है कि अब कुछ समय कहीं अलग से शान्त और सुनसान जगह पर व्यतीत करूँ. पिछले कई वर्षों में शरीर और मन दोनो से थक गयी हूँ. अड़सठ वर्ष की होने को आयी हूँ. मानसिक उथलपथल से छुटकारा नहीं मिल रहा है. अकेले परेशानियां सुलझाते सुलझाते थक गयी हूँ मैं, तुम सब मेरे भरोसे छोड़ कर लम्बी नींद सो गये.

1 सितंबर 2001, दिल्ली

तुम्हारा उपन्यास "कुछ ज़िंदगियाँ बेमतब" छप कर आ गया है. नन्द किशोर आचार्य ने भूमिका बहुत अच्छी लिखी है, छपाई भी अच्छी हुई है.

कभी कभी सोचती हूँ कि आदमी सम्पत्ति से नहीं स्वतंत्रता से सम्राट होता है. मेरे पास मैं हूँ और इससे बड़ी कोई सम्पदा नहीं है. मैं सोच नहीं पाती कि मेरे पास क्या नहीं है जो किसी सम्राट के पास है. सौंदर्य देखने के लिए आँखें हैं, हृदय है और प्रार्थना में प्रवेश करने की क्षमता है. पर फ़िर भी तुम्हारी कमी अखरती है.

शादी एक दूसरे के लिए सुविधानुसार एक साथ जीने के लिए की थी और एक दूसरे का ख्याल, एक दूसरे की ज़रुरत को समझा. कभी शिकायत का अवसर नहीं दिया. कई बार तर्क वितर्क हुए लेकिन उस स्थिति में अच्छी तरह समझौता किया. शिकायतें थीं लेकिन कभी की नहीं तुमसे. तुम भी ज़रुरत के समय मेरे साथ रहे. साथ रहने व निर्णय एक दूसरे की इज़्ज़त के साथ एक दूसरे के लिए किया. सो अभी भी वैसा ही लगता है कि तुम्हारा एहसास तो हमेसा साथ रहेगा. तुमने तो बच्चों का कुछ देखा नहीं, मैं अच्छा बुरा सब देख रही हूँ तुम्हारे अंशों का.

(माँ की डायरी से)

07 जनवरी 2011

बेगम अखतर और फ़ैज़

शक दुविधा में बंटे मानसिक द्वंद की जो स्थिति है उसे भोगना कितना कष्टकर है. न जाने कब स्वयं को जानने पहचानने का समय मिलेगा. कहीं फ़ैज़ की गज़ल की आवाज़ आ रही हैः
न गुल खिले हें न उनसे मिले
न मय पी है, याद आ रहे हैं आज
एक बार लखनऊ में बेगम अखतर के घर पर फ़ैज़ गा रहे थे, "अज़ीब रंग से अब की बहार गुज़री है, गुलो में रंग भरे वादे नौ बहार चले, चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले", जिसकी याद अचानक आ गयी. लोहिया साथ थे, थोड़ी टेढ़ी मुद्रा में पूछने लगे, "कुछ समझ में आया तुम्हें कि फ़ैज़ क्या कह रहे हैं?" आसपास के लोग मुस्कराये और खिलखिला कर हँस पड़े. बात 1952 के शुरु की है. शायद बहुत दिनों के बाद फ़ैज़ बेगम अखतर से मिले थे. और आज न फ़ैज़ हैं न बेगम अखतर. लोहिया जब लखनऊ में रहते थे तो इस तरह के आयोजन अक्सर होते रहते है, रसिक तो थे ही. और इस तरह के आयोजनों में बहुत प्रसन्न, किसी का हाथ पकड़े इधर से उधर चक्कर लगाते रहते थे. स्त्री हो या पुरुष, कोई अंतर नहीं पड़ता था, केवल साथ होना चाहिये था.

इसी तरह 1960 की हैदराबाद की बात याद आयी. बिमला, जो किसी राजा की बेटी थीं, ठीक से याद नहीं, के यहाँ डागर बँधुओं को सुनने गये थे और राजा दुबे के घर में मैं ठहरी थी. गुड्डा और पिंकी छोटे थे, उन्हें सुला कर बारह बजे और साथ के परिवार को ध्यान रखने के लिए कहा था. इस बीच गुड्डे की नींद खुल गयी, उसने पिंकी को भी जगा दिया, उसे कहा कि दोनो खिड़की पर रोते हैं, ज़ोर से रोना. पिंकी को नींद आयी थी लेकिन गुड्डे ने उसे जबरदस्ती उठाये रखा कि और ज़ोर से रोओ ताकि पड़ोस वाले आ जायें. जब हम लोग चार बजे वापस लौटे तो बदरी विशाल पित्ती साथ थे, दोनो के रोने की कहानी सुन कर बहुत हँसे और दूसरे दिन पिंकी के लिए गुड़िया और गुड्डे के लिए केरमबोर्ड ले कर आये, और रात की कहानी पिंकी से बार बार सुनते रहे और ज़ोर से रोने की कहानी सबको सुनाते रहे.

लोहिया के साथ यह अमूल्य क्षण ही आज धरौहर हैं. वह हमेशा ही मानते रहे और शिकायत भी करते रहे कि तुम्हारी वजह से तुम्हारा पति काम नहीं कर पाता और आधा समय तुम्हें पत्र लिखता रहता है, तुम इसके साथ क्यों नहीं रहती? मैंने कहा कि नौकरी छोड़ कर दो बच्चों के साथ इनके साथ रहूँ तो गृहस्थी कैसे चलेगी, आप केवल एलाऊन्स देते हैं उससे घर कैसे चलेगा? बोले मैं सोच रहा था कि तुम्हारा उत्तर यही होगा, मैं जल्दी ही दिल्ली में ही ओमप्रकाश, वह तुम्हें इसी नाम से पुकारते थे, के लिए कोई काम निकालता हूँ. इससे समय और डाकखर्च बचेगा, रोज़ ही रात बारह बजे तक बैठा तुम्हें प्रेमपत्र लिखता रहता है और खिलखिला कर हँसने लगे.

दूसरे दिन ही मुझे दिल्ली लौटना था सो लौट आयी. लोहिया ने किया वादा निभाया और तुम्हें जन का कार्यभार संभालने के लिए कहा. हैदराबाद में जिये पल बहुत बहुमूल्य थे. शाम को देर तक हुसैन सागर के किनारे बैठना, हिमायत नगर जहाँ ठहरे थे हुसैन सागर से बिल्कुल नज़दीक था. गुड्डा पिंकी भी खुश रहते थे, समय कितनी जल्दी बीत जाता है केवल यादे रह जाती हैं.

इधर तुम्हारे लेखन सामग्री की प्रकाशन व्यवस्था में लगी हूँ. अभी तो कुछ सहेजा है, कुछ सहेज रही हूँ. जब तुम थे, तुम क्या करते हो, क्या लिखते हो, यह जानने का समय ही नहीं मिलता था. और आज जब तुम्हारा लेखन सहेज रही हूँ और पढ़ रही हूँ तो स्वयं को संभाल नहीं पा रही हूँ. तुम्हारा मूल्याकन करने की स्थिति पच्चीस वर्ष के बाद भी नहीं कर पाती, तुम्हारे लेखन और विचारों को समझने में अपने को असमर्थ पाती हूँ. जाने पुराना लिखा सब कुछ मिलेगा भी या नहीं. बहुत देर हो गयी है. पहले अपने बच्चों की व्यवस्था और अब उनके बच्चों की देखभाल में ही समय भागता रहा.

26 अप्रैल 2000, कमला की डायरी