06 फ़रवरी 2011

उलझने

1 मई 2000 दिल्ली

ज़िन्दगी में कुछ इस तरह उलझी रही कि उस समय सुख की कद्र नहीं कर पायी और आज बार बार अतीत को याद करके लगता है कि मेरे पास कुछ ऐसा था जिसे मैं संभाल कर नहीं रख पायी. उस हीरे की कीमत लगा नहीं पाई थी. ज़िन्दगी के अन्य झमेलों में उलझी कहीं और ही भटकती रही. वह सब अब आयु के साथ इस पड़ाव में बहुत याद आ रहा है. इधर बहुत दिनों से तुम्हे देखा भी नहीं.

फ़रीदा ख़ानुम्म की गज़ल "आज जाने की ज़िद न करो, यू ही पहलू में बैठे रहो, जान जाती है जब उठ के जाते हो तुम" की पंक्तियाँ दिमाग में घूमती हैं. फ़ैज़ को भी इधर बहुत दिनो से नहीं सुना. शायद वह कैसेट गुड्डे के पास है.

12 जून 2001 दिल्ली

इधर समय कुछ ऐसे गया कि कुछ पता ही नहीं चला. पिछले वर्ष मई 2000 में लिखा था, उसके बाद तुम्हारी लेखन सामग्री इकट्ठी करने में जुट गयी. पिंकी के पास से फरवरी 2000 में दिल्ली लौट आयी थी. चार वर्ष पूर्व कोहाट की ज़मीन बेच कर अलकनंदा में घर खरीदा था, स्वयं वहां रह नहीं पायी, लेकिन सामान सब वहीं रखा है. अधिक समय पिंकी के वास विदेश में निकल जाता है. यहाँ आ कर विनी के घर रह जाती हूँ. घर पास ही है, बीच बीच में जाती रहती हूँ.

इधर एक इच्छा हो रही है कि अब कुछ समय कहीं अलग से शान्त और सुनसान जगह पर व्यतीत करूँ. पिछले कई वर्षों में शरीर और मन दोनो से थक गयी हूँ. अड़सठ वर्ष की होने को आयी हूँ. मानसिक उथलपथल से छुटकारा नहीं मिल रहा है. अकेले परेशानियां सुलझाते सुलझाते थक गयी हूँ मैं, तुम सब मेरे भरोसे छोड़ कर लम्बी नींद सो गये.

1 सितंबर 2001, दिल्ली

तुम्हारा उपन्यास "कुछ ज़िंदगियाँ बेमतब" छप कर आ गया है. नन्द किशोर आचार्य ने भूमिका बहुत अच्छी लिखी है, छपाई भी अच्छी हुई है.

कभी कभी सोचती हूँ कि आदमी सम्पत्ति से नहीं स्वतंत्रता से सम्राट होता है. मेरे पास मैं हूँ और इससे बड़ी कोई सम्पदा नहीं है. मैं सोच नहीं पाती कि मेरे पास क्या नहीं है जो किसी सम्राट के पास है. सौंदर्य देखने के लिए आँखें हैं, हृदय है और प्रार्थना में प्रवेश करने की क्षमता है. पर फ़िर भी तुम्हारी कमी अखरती है.

शादी एक दूसरे के लिए सुविधानुसार एक साथ जीने के लिए की थी और एक दूसरे का ख्याल, एक दूसरे की ज़रुरत को समझा. कभी शिकायत का अवसर नहीं दिया. कई बार तर्क वितर्क हुए लेकिन उस स्थिति में अच्छी तरह समझौता किया. शिकायतें थीं लेकिन कभी की नहीं तुमसे. तुम भी ज़रुरत के समय मेरे साथ रहे. साथ रहने व निर्णय एक दूसरे की इज़्ज़त के साथ एक दूसरे के लिए किया. सो अभी भी वैसा ही लगता है कि तुम्हारा एहसास तो हमेसा साथ रहेगा. तुमने तो बच्चों का कुछ देखा नहीं, मैं अच्छा बुरा सब देख रही हूँ तुम्हारे अंशों का.

(माँ की डायरी से)

1 टिप्पणी:

  1. बहुत प्यारी और अद्भुत संवेदनशील पोस्ट. अनछुए को छुआ जैसे शब्दों ने.......!

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