17 जुलाई 2010

मेरी कहानी

मेरा जन्म फ़िरोज़पुर में हुआ. मुझसे पहले एक भाई था. हमारा गाँव पँजाब में जिला जेहलम, तहसील पिँडदादर खान, डाकखाना पिननवाल और कस्बा इरायाला में था. गाँव का नाम था दीवानपुर. चार मकान ज़मींदारों के थे, चार हिदुओं के. गाँव में स्कूल, अस्पताल आदि कुछ नहीं था. हिंदू मकानो में दो हवेली नुमा पुराने घर और दो नये पक्के बनाये गये थे, बाकी के घर कच्चे, मिट्टे के बने थे. पानी के लिए घर के अंदर हैंडपम्प लगा था, काम वालों के लिए बाहर बगीचे में कूँआ था. मुसलमानों के कूँए अलग थे. चारों घरों में खेती बाड़ी करने वाले लोग ही रहते थे. खेतों में फ़ल, सब्ज़ियाँ, गेँहू, चना, मूँगफ़ली, आदि उपजाया जाता था.

मेरे पिता के परदादा ठाकुरदास राजा रणजीत सिंह के दीवान थे. उनके बेटे थे भोलानाथ, कृपाराम और मूल चंद. मेरे दादा कृपाराम थे.

तब प्राईमरी स्कूल पिननवाल में था और बच्चे घोड़े पर बैठ कर वहाँ जाते. मुझे माँ के घर चकवाल तहसील में भेजा दिया गया था, वहीं करयाला कस्बे में मैं आर्यसमाज के प्राईमरी स्कूल में गयी. इसके बाद, एक छोटी बहन और दो भाईयों के साथ मुझे पढ़ायी के लिए शिमला छठी कक्षा में भेजा गया. तब छोटा भाई कृष्ण और दो छोटी बहनें गाँव में ही थीं. उस समय मेरे पिता ने डिफेन्स मिनिस्टरी में काम करना शुरु किया था. दूसरा महायुद्ध तभी स्माप्त हुआ था. तब अँग्रेज़ो का ज़माना था, गर्मियों में सभी कार्यालय शिमला में काम करते थे और सर्दियों में दिल्ली में. पिता जी ग्रेजुएट थे और हाकी के खिलाड़ी थे. ध्यानचंद उनके मित्र थे, हाकी की ट्रेनिंग साथ ही ली थी. शेख अब्दुल्ला लाहोर गवर्मैंट कालेज में उनसे एक वर्ष सीनियर थे और शेख अबदुल्ला की पत्नी का भाई उनके साथ पढ़ता था और गहरा मित्र था. जब तक शेख अब्दुल्ला रहे यह दोस्ती चली. वहाँ के अन्य राजा परिवारों से अच्छे सम्बंध थे.

मेरी दादी डिगियाँ के सिख परिवार की बेटी थी. पिंजनवाल के राजा सरदार खान मेरी दादी को बहन मानते थे. लियाकत अली भी पिता जी के अच्छे मित्र थे. रफ़ी अहमद किदवई से भी पारिवारिक मित्रता थी.

जब भारत स्वतंत्र हुआ तो पिता जी ने अपना ट्राँसफर लाहोर करवा लिया कि हमारा सब कुछ, ज़मीन, मित्र सब पाकिस्तान में ही है. आजादी मिली, बटवारा हुआ और लियाकत अली कुछ न कर पाये, हमें वहाँ से खाली हाथ तीन कपड़ों में भागना पड़ा. पिता जी की नौकरी जाती रही, बाद में मिली पर अफसर के रूप में नहीं, क्लर्क के रूप में. माडलबस्ती शीदीपुरा में एक मुसलमान के खाली घर में शरण मिली, घर आधा जला हुआ था. मैं मृदुला बहन के शान्ती दल में काम करने लगी, घूम घूम कर मुसलमान लड़कियों को खोजते और उन्हें बचा कर उनके परिवारों में भेजते. तब गाँधी जी, अरुणा आसिफ़ अली, सुभद्रा जोशी आदि से भी भेंट हुई. कमला देवी चट्टोपाध्याय से रिफ्यूज़ी सेंटर में मिली.

पहले मुझे तीन महीने सोशलिस्ट पार्टी के केंद्रीय दफ्तर में बाड़ा हिंदुराव में हिंदी टाईपिंग का काम मिला, वहाँ जे स्वामीनाथन, सूरजप्रकाश, कश्यप भारगव और दीपक से मिली. चमनलाल भी मित्र थे जिन्होंने फैज़रोड पर एक मुसलमान के खाली घर में स्कूल खोला तो मैं, कश्पी, दीपक और विमला जो बाद में चमन की पत्नी बनी, वहाँ स्कूल में काम करते और मेरे तीन भाई और एक बहन वहाँ पढ़ने लगे. मुझे 40 रुपये तन्ख्वाह मिलती जिसमें से 20 रुपये उनकी फ़ीस में दे देती. छः मास वहाँ काम किया.

जब नेहरू की सरकार बनी तो लेजेस्लेटिव असेम्बली में संसद भवन में काम करना शुरु किया. तब सिद्धवा, दादा धर्माधिकारी, शाहनवाज़, पूर्णिमा बैनर्जी, मदनमोहन चतुर्वेदी आदि से पहचान हुई. मौलाना आज़ाद तब शिक्षा मंत्री थे, मसूद उनका पी.ए. था, मुझे उनके साथ काम मिलता. काम बहुत था और देर तक रुकना पड़ता था. मैं साईकल से आती जाती थी, रात को लौटती तो बिल्कुल सुनसान होता, रात के ग्यारह बारह भी बज जाते थे. वहाँ एक दक्षिण भारतीय अफसर था जिसने मुझे तंग करना शुरु कर दिया, उल्टी सीधी अटपट बातें करने लगा. तो मैं पंडित नेहरु के पास गयी जो मुझे मृदुला बहन के समय से जानते थे और मुझे बहादुर बेटी के नाम से पुकारते थे क्योंकि मैंने एक बार शान्ति दल में एक मुसलमान लड़की को भीड़ से बचाया था. तब मैं कभी भी तीन मूर्ती भवन के अंदर आ जा सकती थी.

मैंने पंडित जी को कहा कि मुझे असेम्बली से घर जाने में बहुत देर हो जाती है और अकेले घर जाने में डर लगता है. तो वह बोले तुम बहादुर लड़की हो, डर कैसा. मैंने कहा कि मुझे दरियागंज में नयी खुली टीचर्स इंस्टिट्यूट में भेज दीजिये, अभी तो ट्रेनिंग शुरु हुए दो महीने ही हुए हैं, मैं वह पूरा कर लूँगी. मौलाना आज़ाद के पी.ए. मसूद साहब मुझे फार्म दे गये, बस मैं संसद का काम छोड़ कर बेसिक टीचर्स ट्रैंनिग में चली गयी, जहाँ तीस रुपये महीने का वज़ीफ़ा मिलता था. एक साल बाद ट्रेनिंग पूरी हुई, मुझे दिल्ली के नवादा गाँव के स्कूल में नौकरी मिल गयी.

उसके बाद मैं शादी करके लखनऊ चली गयी जहाँ दीपक "संघर्ष" के लिए काम करते थे, मैंने मदर सिटी होम और म्यूनिसपल बोर्ड में काम किया. तभी पहले बेटी फ़िर बेटा हुआ. बेटी नहीं रही, उसे दिल की तकलीफ थी. "संघर्ष" का प्रकाशन बंद हुआ तो हम लोग इलाहाबाद चले आये जहाँ मैंने लैंड रिफोर्म के दफ्तर में काम किया और दीपक जी "लीडर" में काम कर रहे थे. जब दिल्ली में लोहिया के लोग पहुँचे और संसद ओफिस बना तो हम लोग दिल्ली चले आये. 1958 में दोबारा पंडित नेहरु से मिलने गयी तो उन्होंने पूछा कि क्या काम कर रही हो, मैंने बताया कि नौकरी नहीं मिली थी, तो उन्होंने मदन, अपने पी.ए. को बलाया और कहा कि मेरी बेटी को नौकरी दिलाओ, पहले दिल्ली प्रशासन में काम कर चुकी है, वहीं काम दिलाओ. पी.ए. ने दिल्ली प्रशासन के डायरेक्टर माथुर को टेलीफोन किया और मुझे नगर निगम के स्कूल में नौकरी मिल गयी.

तभी से दिल्ली में रही, दीपक जी भागते रहे, हैदराबाद चले गये. जब तक लोहिया रहे, उनके साथ ही रहे.

1998 दिल्ली, तारीख नहीं लिखी - माँ की डायरी से

1 टिप्पणी:

  1. आप नेहरु जी से सीधे मिली थी, रोमांचकारी..., आपकी भाषा और लेखन में ताजगी और जीवन्तता शायद इसीलिए है. जो लोहिया और नेहरु के सानिध्य में रहा हो, वह सबकुछ हो सकता है...लेकिन बेईमान हरगिज नहीं. विश्वास है हम आपका लिखा पढ़कर समाजवादी(वाद से नफरत है मुझे) भले न हों, समाज के लिए खतरनाक तो नहीं ही होंगे.

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