12 मई 2010

दिल जलता है की प्रेम कथा

ओम १९४७-४८ में सोशलिस्ट पार्टी में आचार्य नरेंद्र देव, डा लोहिया और जयप्रकाश जी के साथ जुटे. १९५२ से १९५५ तक लखनऊ में सोशलिस्ट सप्ताहिक "संघर्ष" के सम्पादक के रूप में काम किया.

लाहोर में पुराने सोशलिस्ट चौधरी सुलतान अहमदी के यहां ठहरा करते थे, जिनका परिवार सम्पन्न था. उनकी लड़की खालिदा चौधरी थी, उससे ओम की दोस्ती हो गयी. यह दोस्ती काफ़ी गहरी थी. जयप्रकाश और पुरषोत्तम दुग्गल के अनुसार लड़की बड़ी सुन्दर और जहीन थी. उस लड़की ने पार्टी में काम करना शुरु किया और अपने पिता को बताया कि वह शादी करना चाहती है. लेकिन सुलतान चौधरी बहुत नाराज हुए और मुन्शी से कह कर लाहोर से पार्टी के किसी काम के ओम को दिल्ली भेजा. वह लड़की भी कुछ सामान ले कर स्टेशन पहुँची लेकिन सुलतान चौधरी के लोगों ने उसे भारत आने नहीं दिया कि हिन्दु के साथ शादी नहीं हो सकती, लाहोर में दंगा हो जायेगा. तभी हिंदुस्तान और पाकिस्तान का बटवारा हुआ. उस लड़की बहुत खोज की गयी लेकिन कुछ पता नहीं चला कि क्या हुआ.

कहानी खत्म हुई लेकिन उनका दिल टूट गया. "दिल जलता है तो जलने दो" गाने पर जेल में ओम का नाम उनके मित्रों नें दीपक रखा दिया. बाद में स्वयं उन्होंने इस बात का समर्थन किया था. यह घटना सोशलिस्ट पार्टी के बाड़ा हिन्दू राव में कश्यव भार्गव उर्फ कश्पी ने बतायी थी. उस समय मेरा परिचय केवल नाम से ही था.

उनकी एक कहानी सरिता में छपी थी शाहजहाँ के बेटी जहाँआरा या आलमआरा के प्रेम प्रसंग पर. वह मैंने पार्टी आफ़िस में ही पढ़ी थी, जे स्वामीनाथन से ले कर. यह मार्च १९४८ की बात है. सभी के आग्रह पर उन्होंने "दिल जलता है" गाया था जो मैंने सुना था.

(जब जेल में थे)छोटी सी जेल की कोठरी में जो बाहर से बन्द की जाती थी, दिसम्बर जनवरी में दस बारह लोगों को बन्द किया गया था. वहीं सब लोग बैठ कर सोते थे और दरवाज़े के पास अन्दर ही एक गड्ढ़े को टायलट का इस्तमाल करते थे. वहीं खाना खाते थे, ओढ़ने के लिए कुछ भी नहीं था, ठंड से बचने के लिए, बस एक दूसरे के शरीर की गर्मी महसूस करते थे. पूछताछ के समय कपड़े उतार कर बर्फ़ पर लिटा कर यातना दी जाती थी.

एक घटना और याद आयी. १९४९ की जनवरी की बात थी. मेरे साथ एक लड़की कमला अरोड़ा भी पार्टी आफ़िस में किसान पंचायत के दफ्तर में अंग्रेज़ी टाईपिंग का कार्य करती थी. कश्पी भी साथ था. अरुणा असिफ़ अली का कभी कभी किसी मीटिंग में आना होता था. अक्सर वह स्वामी (जे स्वामीनाथन) को घर पर ही बुलाती थी. एक दिन कुछ काम कराने के लिए स्वामी मुझे भी साथ ले गये. वहाँ बिहार के पुराने सोशलिस्ट रामनन्दन मिश्र, से भेंट हुई. शायद वह उस समय आल इंडिया किसान पंचायत के अध्यक्ष थे. वहीं सोशलिस्ट पार्टी की बात करते करते अरुणा ने दीपक जी की उस समय की बातें बतायीं जब वह अंडरग्राँऊड थे कि कैसे वह उन्हें एक जगह से दूसरी जगह ले जाते थे और पटवर्धन या लोहिया से सम्पर्क करवाते थे. मेरी उत्सुकता बढ़ी. क्योंकि उन दिनों, जब की बात अरुणा कर रही थीं, उस समय वह मेरे चाचा के यहाँ रह रही थीं. उसी के कारण फ़िर ओम को एयरफ़ोर्स से निकाल दिया गया. अब मेरे वह चाचा जीवित नहीं रहे लेकिन बहुत ही बीमार थे कलकत्ता में.

स्मृति का सब क्रम बिगड़ता जा रहा है, कभी सोचा नहीं था कि पिछले तेईस सालों में तुम्हारे बारे में कभी लिखना पड़ेगा. लेकिन अब सोचती हूँ कि जल्दी ही काम शुरु करना पड़ेगा. किशन जी के साथ कुछ दिन बैठना पड़ेगा. उनका स्वास्थ्य भी बहुत अच्छा नहीं है. आने से पूर्व टेलीफ़ोन पर बातचीत की थी तो काफ़ी परेशान थे वाणी के स्वास्थ्य को ले कर.

१९४९ में जब लोहिया नेपाल आंदोलन के संदर्भ में जेल से छूटे तो औखला में एक पार्टी दी गयी. मैं भी वहाँ थी. और मेरे शाथ एक युगोस्लाव लड़की मलाडा कलाबावा भी थी जो लोहिया के यहां ही रह रही थी, बारहखम्बा में पदमसिंह के यहां. आयु उसकी उस समय २२ या २४ की होगी. लड़की बहुत ही अच्छी थी. लोहिया की दोस्त थी. हम दोनो नहर के किनारे बैठे बात कर रहे थे. वह हिंदी जानती थी.

तभी एक टोकरी में पांच छः आम लिए लोहिया हमारे पास आ कर बैठ गये कि अरे तुम लोग यहां बैठी हो और सब आम खत्म हो गये हैं. इतने स्नेह से वह दे रहे थे. इतने स्नेह से दे रहे थे कि मेरी आँखों में पानी भर आया. तो बोले, पीठ थपथपा कर, जल्दी से खालो. मुझे आम अधिक अच्छा नहीं लगता था फ़िर भी मैंने हाथ में लिया. तभी कश्पी, सूरज और दीपक तीनो आ गये कि यह तो बहुत ज्यादती है कि तुम दोनो सब आम खाओगी और हम देखते रहेंगे. मैंने मलाडा से कहा कि तुम ले लो और बाकी उन्हें दे दो और अपने हाथ वाला आम भी उन्हें दे दिया. मलाडा ने मेरी शिकायत लोहिया से की तो वह बहुत नाराज़ हुए कि मैंने तुम्हें बाँटने को नहीं दिये थे. मैंने माफ़ी माँग ली तो खिलखिला कर हँस पड़े. साथ ही कहा कि बहादुर तो तुम हो लेकिन समझदार नहीं हो.

- कमला की डायरी से, दिल्ली १९९८

2 टिप्‍पणियां:

  1. आगे के पन्ने का भी इंतजार है...

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  2. सरलता और उदारता से युक्‍त व्‍यक्तित्‍व

    नमन्

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