30 जुलाई 2011

अपना परिचय

ओम प्रकाश दीपकः

जन्मः २७ जनवरी १९२७, इलाहाबाद

लम्बी ख़ानाबदोशी के बाद अक्टूबर नवम्बर १९६१ से दिल्ली में. पिछले बीस पच्चीस सालों में प्रूफ़रीडरी से ले कर संपादगी तक की - संपादकी के बाद प्रूफ़रीडरी, इस क्रम से भी. अगस्त १९४२ में पन्द्रह साल की उम्र में पहली गिरफ़्तारी के कुछ दिनों बाद से ही समाजवादी आन्दोलन से सम्बद्ध रहा हूँ. ज़िन्दगी में राम मनोहर लोहिया से जितना सीखा उतना किसी और से नहीं. लिखना बहुत अनियमित रहा. दिल्ली आने के बाद से ज़रूर बहुत कुछ नियमित लिख रहा हूँ. अनुवाद किए, स्वतन्त्र पत्रकारिता भी की, सड़कें भी नापीं. आजकल "जन" का संपादन कर रहा हूँ.

१९४९ में उस लड़की से भेंट हुई थी जिसने दो साल बाद पत्नी के रूप में मेरी ज़िन्दगी में हिस्सा बँटाने का जोखिम भरा सफ़र शुरु किया. अभी तो सफ़र चल ही रहा है. एक बेटा है, दो बेटियाँ.

इस परिचय को उनके हाथ की लिखायी में पढ़िये.

(ओम प्रकाश दीपक ने यह अपना परिचय एक आलेख संग्रह के लिए तैयार किया था.)

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29 जुलाई 2011

छिटपुट

हैदराबाद, 5 फरवरी 1957

आज कमला का एक पत्र और आया है. पैसे मिल गये थे. हाल तकरीबन अच्छा ही है. लिखा है कि दिल्ली जा रही हूँ. अगर टैक्स देना पड़ा तो माता जी को अपने पैसों में से ही देना पड़ेगा. डेढ़ सौ कर्ज़ भी लिया माता जी ने और सब इधर उधर में ही निकल गया. मई में गुड्डे का मुंडन करना होगा. पता नहीं मानवी के पैसे उसके लिए मिलेंगे या नहीं.

पत्र में कमला ने मेरी उस डायरी का भी ज़िक्र किया है जो मैंने लखनऊ में लिखा था. तब से अब बहुत कुछ बदल गया है. जीवन में वह तनाव नहीं है, न अच्छा, न बुरा. जो जीवन की अनिवार्य आवश्यकताएँ हैं, उसकी क़दर शायद मैंने अधिक सीख ली है और उससे अधिक की मांग करना कमला ने बन्द कर दिया है. हम दोनो में कुछ दिमागी प्रौढ़ता भी आ गयी है. सम्बन्धों की बात क्या करूँ? चमक कम है, स्थायित्व ज़्यादा है. चमक भी शायद इसलिए कम है कि कि फुर्सत ही नहीं है. मैं अलग फँसा हूँ और मुझसे भी ज़्यादा वह फँसी हुई है, घर के झँझटों में. चमक कहाँ से आये. लेकिन इस एक साल के अन्दर अगर उसका स्वास्थ्य ठीक हो जाये और पैसों का दिन रात का रोना ख़तन हो तो चमक भी फ़िर आ जायेगी, यह निश्चित ही है.

और कोई विषेश बात नहीं है. इंदुमति की पुस्तिका पहले तैयार करनी है. उसके बाद रिपोर्ट. साप्ताहिकी का काम सो संभवतः कल खंतम हो जायेगा.

बड़ी बहन जी और कशपी को ख़त लिखे थे, आज भेज भी दिये हैं.

हैदराबाद, 7 फरवरी 1957

कमला का एक पत्र कल दिल्ली से आया. ठीक ही है सब जवाब भी कल रात को भेज दिया था. बद्री आज दफ्तर आये थे, लेकिन मैंने कोई बात नहीं की, तबियत भी नहीं है कि करूँ. फ़िर किसी समय भेंट हुई तो जितेन्द्र सिंह, लक्ष्मीकांत और लक्ष्मीनारायण लाल वगैरह की शिकायत पहुँचा दूँगा. देखूँ क्या कहते हैं. भारती को चिट्ठी लिखनी चाहिये. याद रहा तो लिखूँगा.

रमा को आज लोकनाथ ने टेलीफ़ोन किया था. उसके पहले एक टेलीफोन रीवा से आया था. विधानसभा में निशान "पंजा" दे दिया है और रमा को "पेड़". लोकनाथ आज दिल्ली जा रहा है. यह जो सिलसिला चुनाव कमिश्नर ने निकाला है यह तो पार्टी पद्धिति के ही विरुद्ध है. देखें क्या होता है.

इन्दिरा गाँधी ने प्र.सो.पा. पर जो आरोप लगाया था, वह वापस ले लिया है, नेहरू के कहने पर. कुछ टीका करना व्यर्थ है. सिहोरा की रिपोर्ट लिखनी आज शुरु की है.

भविष्य का सिलसिला कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि क्या होगा. गोस्वामी ने आज कुछ काम देने को कहा है, पचीस तीस रुपये का. चलो यही सही.

इन्दुमति को भी एक पत्र आज भेजा है. पुस्तिका के बारे में. उसमें भी डाक्टर साहब से डाँट खानी पड़ेगी शायद.

और क्या लिखूँ, दिमाग खाली सा ही है. वह कहानी जो अंग्रेजी में लिखनी शुरु की है, पूरी करनी है. कल से कुछ चिट्ठी पत्री भी शुरु करनी है.

हैदराबाद, 8 फरवरी 1957

आज सुबह कृष्ण कुमार का पत्र आया है. गोपी ने उसे पैसे नहीं दिये और वह चुनाव नहीं लड़ सका. उसे उत्तर भी आज भेज दिया है, देखें क्या जवाब देता है.

सोच रहा हूँ कि किन्हीं विदेशी पत्रिकाओं के लिये अगर कुछ लिखूँ तो काफ़ी पैसा मिले. सुरेन्द्र से भी इस पर बात की है. वह खुद कुछ लिखने की सोच रहा है. कल अगर USIS की लायब्रेरी से जा कर कुछ पते ले आऊँ तो परसों एक लेख लिख डालूँ और एक आध को भेज दूँ. अगर एक भी छप जाये तो काफ़ी पैसे मिल जायें. Books Abroad के लिए Asian Writers Conference पर भी कुछ लिख कर भेज सकता हूँ. या Harper's Magazine भी कुछ काम की हो.

(ओम की डायरी से)

09 जुलाई 2011

ओम की डायरी

हैदराबाद, 3 फरवरी 1957

कई सालों के बाद फ़िर जर्नल लिखना शुरु कर रहा हूँ. इस बीच में कितना कुछ हो चुका है. पार्टी टूटी, नयी पार्टी बनी. "संघर्ष" तो मैंने शायद पिछली डायरी लिखने के समय ही छोड़ दिया था, लखनऊ भी छूटा. इलाहाबाद जाते ही मकान भी बिक गया, फ़िर गोपा मर गई. दस महीने लीडर प्रेस में प्रूफ़ पढ़ने के बाद उसे भी छोड़ा, छः महीने "आदमी" निकालने की चेष्टा करता रहा, फ़िर जुलाई छप्पन से यहाँ हैदराबाद में हूँ. पिछली बातों पर नज़र क्या डालूँ, नये साल से ही शुरु करना अच्छा होगा. मन में तो न जाने क्या क्या है. सब लिख भी नहीं सकूँगा.

सम्मेलन में जाने से पहले नव हिन्द वालों के लिए एक किताब लिखी, और मिले कुल डेढ़ सौ रुपये जबकि रायल्टी का हिसाब होता तो छः सौ बनते. कुछ अनुमान इसी से लग जाता है कि यह दुनिया क्या है, किस वातावरण में हूँ. मेरे जैसों की जगह कहाँ है, कुछ यही समझ में नहीं आता. यहाँ भी काम नहीं चलता. सब मिला कर पिछले सात महीनों में सात सौ रुपये पार्टी के और पांच सौ रुपये ऊपर से, कुल बारह सौ रुपये मिले हैं जिसमें से आठ सौ रुपये तो कमला को भेजे, 400 खुद खर्च किये और दो सौ का कर्ज़ है. मतलब हुआ कि दो सौ रुपये से कम में काम नहीं चल सकता. लेकिन दो सौ रुपये आयें कहाँ से? दफ्तर से सौ मिलते हैं, विपिन के आने पर बात करूँगा, तब शायद डेढ़ सौ कर दें. लेकिन 50 रुपये महीने की तो फ़िर भी कमी रहेगी ही. मार्च तक तो छोड़ कर जाना भी मुमकिन नहीं. समस्या यह है कि मार्च तक भी काम कैसे चलेगा. और छोड़ कर जाऊँगा भी कहाँ? सोच रहा हूँ कि कुछ विदेशी पत्रिकाओं के लिए कुछ लिखा करूँ. लेकिन एक तो कोई सिलसिला नहीं. दूसरे, अगर कोई छापे भी तो सम्पर्क बनाते कुछ समय लगेगा. ख़ैर कोशिश तो करूँगा ही, देखो क्या होता है.

इस बार इलाहाबाद की यात्रा सुखद से अधिक दुखद रही. जो हाल है घर का, उसने मन पर विचित्र सा बोझ छोड़ दिया है. माता जी अब थक गयीं हैं, उन्हें अब आराम की ज़रूरत है. लेकिन अगर वे काम छोड़ दें, तो वह आमदनी भी बन्द हो जाये. कमला सुबह छः बजे से ले कर रात तक जुटी रहती है, फ़िर भी उसे न मानसिक शान्ती है, न शारीरिक सुख सुविधा. गुड्डा बेचारा अलग परेशान रहता है. मुनियाँ से उसे कोई ईर्ष्या नहीं होती, लेकिन वह प्यार का, ध्यान का भूखा रहता है. दूसरी ओर माता जी और कमला के भावनात्माक तनाव के बीच, उसकी दुर्दशा हो जाती है. हिन्दुस्तान के ज़्यादातर घरों की हालत कहीं बुरी है, इससे कैसे संतोष मिले. उन्हें तो चेतना नहीं है. शारीरिक दुख वे उठाते हैं, लेकिन मन में उसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती. अपने साथ तो शरीर का दुख गौण और मन का दुख प्रधान है. भौतिक जीवन में भी सफ़ाई से रहना हमने सीखा है, इस कारण और भी कष्ट होते हैं. सफ़ाई से रहने के लिए पैसा चाहिये.

उस दिन गुड्डे को मैंने पीटा, वह मुझे बहुत दिन तक नहीं भूलेगा. गलती हमारी थी, उसे ले कर जाना ही नहीं चाहिये था. उसके वे शब्द, "मारो नहीं" न जाने कब तक मेरे कानों में गूँजते रहेंगे. कैसी क्रूरता है जीवन में. कैसी विडम्बना है. उसे बुखार में छोड़ कर आया था. न जाने कैसा है अब. कमला ने अभी तक पत्र नहीं भेजा.

(ओम प्रकाश दीपक की डायरी से)

02 जुलाई 2011

तस्वीरें

आज पहले समाजवादी पार्टी के अखिल भारतीय सम्मेलन से जुड़ी करीब पचास साल पहले की दो तस्वीरें प्रस्तुत हैं.

Badge, All India Socialist party assembly, 1959

Badge, All India Socialist party assembly, 1962

एक तीसरी तस्वीर है एक व्यक्ति की जिसे मैं नहीं पहचान पाया. क्या आप में से कोई बता सकता है कि यह कौन हैं?

Some person

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