15 अक्तूबर 2010

किताबें और यादें

आज सुबह करीब पांच बजे बहुत गहरी नींद में थी अचानक सपने में छोटी दीदी जीजा दिखाई दिये. कुछ बात नहीं हुई. केवल देखा कि बाथरूम में बहुत गन्दगी और पानी भरा हुआ है और जीजा वहां से निकल दीदी के पास जा रहे हैं और आसपास तरह तरह की आवाज़ें आ रहीं हैं. सम्भवतः जानकी देवी कालेज ही रहा होगा. पहली बार दोनो को साथ देखा है. दिन भर उनके साथ बिताये पल मेरे आसपास घूमते रहे. सपने क्यों मनुष्य को वास्तविकता ही लगते हैं. वास्तविकता क्या है कौन जाने इस तरह के सपनो में.

आजकल अनिया हुसैन का अंग्रेजी उपन्यास "सन लाईट ओन ए ब्रोकन कोलम" पढ़ रही हूँ. पढ़ते पढ़ते याद आयीं मिसेज़ शफ़ी किदवई, (रफ़ी किदवई नेहरु के पहले कैबिनेट में मंत्री रहे थे). वहीं किश्वर आपा की बेटी के साथ अनिया हुसैन से भी बात हुई थी और उसी परिवार से उनका सम्बंध था कुछ. लखनऊ के तालुकदार घराने से थी और किदवई परिवार से भी. सुंदर, सुसंस्कृत, शिक्षित, पत्रकारिता करती थी, लिखा भी सब लखनऊ की नज़ाकत और सास्कृतिक पारिवारिक पृष्ठभूमि पर. पुनः अनिया हुसैन से भेंट हुई तालुकदार रिज़वी भाई की बेटी की शादी के वक्त. लोहिया भी साथ थे तब. पता नहीं अब हैं या नहीं होंगी, शायद 82 या 83 साल की होंगी. इनकी बड़ी बेटी शमा की शादी हबीबउल्ला के साथ हुई थी शायद. अब तो बहुत वर्षों से कोई सम्पर्क ही नहीं रहा. अनिया बाद में लंदन रेडियो में कार्यरत थी, और समाचारपत्रों में भी फ्रीलांसिंग करती रही. उनकी शादी चचेरे भाई से हुई थी और वह विदेशसेवा में कार्यरत थे.

अब तो केवल श्रीमति शफ़ी अहमद ही याद है. शफ़ी अहमद को हिंदू मुस्लिम दंगों में मसूरी में मारा दिया था. आपा से परिचय हुआ था जामा मिलिया द्वारा संचालित बाड़ा हिंदूराव वाले स्कूल में. मैंने परीक्षा के फार्म भरे थे पर परीक्षा नहीं दे पायी. तीन माह तक स्कूल में काम करके सोशल सर्विस का सार्टिफिकेट ले सकते थे, मैंने नहीं लिया था. तभी आपा से भेंट हुई तो मैं उसके बाद मृदुला बहन के शान्ति दल में कार्य करने लगी. दंगों में पीड़ित लोगों की और जो मुसलमान बच गये थे उनके विषय में जानकारी इक्टठी की, जो लड़कियाँ गांव में छूट गयीं थी उनका निकाल कर कैम्प में रखना और अगर चाहें तो उन्हें पाकिस्तान भेजना आदि कार्य थे. इसमें मृदुला बहन की अहम भूमिका रही. सुभद्रा जोशी, सिकंदर बख्त, लीला बहन, विद्या कुतुब आदि अनेक लोग साथ काम कर रहे थे, और शाम को लौट कर पूरी रिपोर्ट हरिजन कोलोनी में गाँधी जी को देनी होती थी, प्रार्थना सभा से पहले फ़िर सब लोग प्रार्थना सभा में रहते थे.

विक्रम सेठ का उपन्यास "ए सूटेब बोअय" (A suitable boy) की पृष्ठभूमि भी 1950 और 51 की है. कथानक चार परिवारों का है. मेहरा, कपूर, खान और चैटर्जी. सेठ स्वयं मेहरा परिवार से सम्बंधित है. राजनीतिक जोड़तोड़ साथ साथ चलती है. नेहरु का नाम कांग्रेस में था, गाँधी का नहीं. ज़मींदारी उन्मूलन शुरु हो गया था. रफ़ी अहमद किदवई का ज़माना और नेहरु से अलगाव, कृपलानी के एम पी पी, अर्थात राजनीतिक जोड़तोड़ के साथ मुस्लिम धार्मिक उन्माद और प्रेम प्रसंग, युनिवर्सिटी की राजनीति के बहुपरिचित चर्चा, सब कहानी 1350 पन्नों में है. कहानी संतुलित और रोचक है. मेरी अंग्रेज़ी ठीक नहीं है, बहुत समय लगा पूरा पढ़ने में. भारी पुस्तक के कारण भी बहुत समय लगा, अगर दो भागों में होती तो बेहतर होता. उस समय की राजनीतिक सामाजिक स्थिति का वर्णन, भाषा शैली सीधी सादी, पर लेखक ने कहीं भी कहानी को अटपटा नहीं होने दिया. साधारण परिवारों का सुंदर वर्णन है. प्रेम प्रसंग, दुख सुख और अन्य व्यव्हार यथापूर्व सुंदर और सधे हुए और प्राकृतिक हैं. बीच बीच में मुझे अपने परिवार की याद आती रही. इसी तरह की कहानी हमारे परिवार की भी है. पाकिस्तान बनने से पूर्व, पूर्व पंजाबी परिवारों की याद दिलाता है यह उपन्यास.

कलमा की डायरी से, 12 अप्रैल 1998, शैरोन बोस्टन अमेरिका
(आज माँ का जन्मदिन है, पहली बार उनके न होने के बाद.)