07 जनवरी 2011

बेगम अखतर और फ़ैज़

शक दुविधा में बंटे मानसिक द्वंद की जो स्थिति है उसे भोगना कितना कष्टकर है. न जाने कब स्वयं को जानने पहचानने का समय मिलेगा. कहीं फ़ैज़ की गज़ल की आवाज़ आ रही हैः
न गुल खिले हें न उनसे मिले
न मय पी है, याद आ रहे हैं आज
एक बार लखनऊ में बेगम अखतर के घर पर फ़ैज़ गा रहे थे, "अज़ीब रंग से अब की बहार गुज़री है, गुलो में रंग भरे वादे नौ बहार चले, चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले", जिसकी याद अचानक आ गयी. लोहिया साथ थे, थोड़ी टेढ़ी मुद्रा में पूछने लगे, "कुछ समझ में आया तुम्हें कि फ़ैज़ क्या कह रहे हैं?" आसपास के लोग मुस्कराये और खिलखिला कर हँस पड़े. बात 1952 के शुरु की है. शायद बहुत दिनों के बाद फ़ैज़ बेगम अखतर से मिले थे. और आज न फ़ैज़ हैं न बेगम अखतर. लोहिया जब लखनऊ में रहते थे तो इस तरह के आयोजन अक्सर होते रहते है, रसिक तो थे ही. और इस तरह के आयोजनों में बहुत प्रसन्न, किसी का हाथ पकड़े इधर से उधर चक्कर लगाते रहते थे. स्त्री हो या पुरुष, कोई अंतर नहीं पड़ता था, केवल साथ होना चाहिये था.

इसी तरह 1960 की हैदराबाद की बात याद आयी. बिमला, जो किसी राजा की बेटी थीं, ठीक से याद नहीं, के यहाँ डागर बँधुओं को सुनने गये थे और राजा दुबे के घर में मैं ठहरी थी. गुड्डा और पिंकी छोटे थे, उन्हें सुला कर बारह बजे और साथ के परिवार को ध्यान रखने के लिए कहा था. इस बीच गुड्डे की नींद खुल गयी, उसने पिंकी को भी जगा दिया, उसे कहा कि दोनो खिड़की पर रोते हैं, ज़ोर से रोना. पिंकी को नींद आयी थी लेकिन गुड्डे ने उसे जबरदस्ती उठाये रखा कि और ज़ोर से रोओ ताकि पड़ोस वाले आ जायें. जब हम लोग चार बजे वापस लौटे तो बदरी विशाल पित्ती साथ थे, दोनो के रोने की कहानी सुन कर बहुत हँसे और दूसरे दिन पिंकी के लिए गुड़िया और गुड्डे के लिए केरमबोर्ड ले कर आये, और रात की कहानी पिंकी से बार बार सुनते रहे और ज़ोर से रोने की कहानी सबको सुनाते रहे.

लोहिया के साथ यह अमूल्य क्षण ही आज धरौहर हैं. वह हमेशा ही मानते रहे और शिकायत भी करते रहे कि तुम्हारी वजह से तुम्हारा पति काम नहीं कर पाता और आधा समय तुम्हें पत्र लिखता रहता है, तुम इसके साथ क्यों नहीं रहती? मैंने कहा कि नौकरी छोड़ कर दो बच्चों के साथ इनके साथ रहूँ तो गृहस्थी कैसे चलेगी, आप केवल एलाऊन्स देते हैं उससे घर कैसे चलेगा? बोले मैं सोच रहा था कि तुम्हारा उत्तर यही होगा, मैं जल्दी ही दिल्ली में ही ओमप्रकाश, वह तुम्हें इसी नाम से पुकारते थे, के लिए कोई काम निकालता हूँ. इससे समय और डाकखर्च बचेगा, रोज़ ही रात बारह बजे तक बैठा तुम्हें प्रेमपत्र लिखता रहता है और खिलखिला कर हँसने लगे.

दूसरे दिन ही मुझे दिल्ली लौटना था सो लौट आयी. लोहिया ने किया वादा निभाया और तुम्हें जन का कार्यभार संभालने के लिए कहा. हैदराबाद में जिये पल बहुत बहुमूल्य थे. शाम को देर तक हुसैन सागर के किनारे बैठना, हिमायत नगर जहाँ ठहरे थे हुसैन सागर से बिल्कुल नज़दीक था. गुड्डा पिंकी भी खुश रहते थे, समय कितनी जल्दी बीत जाता है केवल यादे रह जाती हैं.

इधर तुम्हारे लेखन सामग्री की प्रकाशन व्यवस्था में लगी हूँ. अभी तो कुछ सहेजा है, कुछ सहेज रही हूँ. जब तुम थे, तुम क्या करते हो, क्या लिखते हो, यह जानने का समय ही नहीं मिलता था. और आज जब तुम्हारा लेखन सहेज रही हूँ और पढ़ रही हूँ तो स्वयं को संभाल नहीं पा रही हूँ. तुम्हारा मूल्याकन करने की स्थिति पच्चीस वर्ष के बाद भी नहीं कर पाती, तुम्हारे लेखन और विचारों को समझने में अपने को असमर्थ पाती हूँ. जाने पुराना लिखा सब कुछ मिलेगा भी या नहीं. बहुत देर हो गयी है. पहले अपने बच्चों की व्यवस्था और अब उनके बच्चों की देखभाल में ही समय भागता रहा.

26 अप्रैल 2000, कमला की डायरी